नेताजी की पुण्यतिथि पर उनकी मृत्यु से जुड़े रहस्यमयी घटनाक्रम को याद किया जा रहा है। उनकी मौत विमान दुर्घटना में होने की मान्यता है, पर विवाद अभी भी बरकरार है।
भारतीय समाज व राष्ट्र के जीवन में नवीन प्राणों का संचार करने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज पुण्यतिथि है। आज देश उन्हें नमन-वंदन कर रहा है। नेताजी का जीवन जितना अधिक रोमांचकारी रहा है, उतना ही अधिक रहस्यमयी भी। उन्होंने अपनी देशभक्ति से देश की आत्मा को चैतन्यता से भरकर ब्रिटिश सत्ता को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। पर विडंबना है कि उस महान देशभक्त की मृत्यु से जुड़ी गुत्थियां अभी तक पूरी तरह सुलझी नहीं हैं।
प्रचलित मान्यता के अनुसार नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को ताईवान के निकट एक विमान दुर्घटना में हुई थी। एक ब्रिटिश वेबसाइट ने दावा किया था कि इस दुर्घटना के बाद ताइपे में उनके अंतिम संस्कार के लिए अनुमति पत्र जारी किया गया और उनके शव के साथ जापानी सेना का एक अधिकारी भी मौजूद था। रिपोर्ट के मुताबिक, नेताजी का अंतिम संस्कार 22 अगस्त 1945 को किया गया। यह भी कहा गया कि अंतिम संस्कार से जुड़े साक्ष्य ताईवान की पुलिस ने ब्रिटिश अधिकारियों को भेजे थे और बाद में ये दस्तावेज भारत सरकार तक पहुंचे।
नेताजी के अति विश्वासपात्र हबीबुररहमान भी उनके साथ विमान में सवार थे। उन्होंने शाहनवाज समिति के सामने गवाही दी थी कि नेताजी विमान दुर्घटना में मारे गए और उनके सामने ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। इसके बावजूद नेताजी की मृत्यु को लेकर संदेह खत्म नहीं हुआ। देश का एक बड़ा वर्ग मानता रहा है कि नेताजी विमान दुर्घटना से बच निकले थे और बाद में रूस चले गए।
सुब्रमण्यम स्वामी ने भी दावा किया था कि 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद एक सोवियत स्कॉलर ने उन्हें बताया कि नेताजी ताईवान गए ही नहीं थे। वे साएगोन से सीधे मंचूरिया पहुंचे, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद स्टालिन ने उन्हें साइबेरिया की यकृत्स्क जेल भेज दिया, जहां 1953 में उनकी मौत हुई। स्वामी के अनुसार, स्टालिन नेताजी से इसलिए नाराज था, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उनके संबंध हिटलर और धुरी राष्ट्रों से रहे थे। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इसे प्रमाणित तथ्य के बजाय एक दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
नेताजी की मृत्यु को लेकर उठे सवालों में रिंकोजी मंदिर में रखी उनकी कथित अस्थियां भी महत्वपूर्ण हैं। स्वामी का दावा था कि जापान की ओर से उन्हें अस्थियां भारत ले जाने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन शर्त थी कि उनका डीएनए परीक्षण नहीं कराया जाएगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी के कार्यकाल में नेताजी से जुड़ी एक पूरी फाइल नष्ट कर दी गई। इन दावों की पुष्टि के लिए ठोस स्वतंत्र साक्ष्य जरूरी हैं।
नेताजी की मौत पर ‘इंडियाज बिगेस्ट कवर-अप’ के लेखक अनुज धर ने भी कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से नेताजी की मौत से जुड़े दस्तावेज मांगे थे, लेकिन यह कहते हुए उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया कि इससे विदेशी ताकतों के साथ भारत के संबंध प्रभावित हो सकते हैं। नेताजी के प्रपौत्र और ‘हिज मैजेस्टिज अपोनेंट’ के लेखक सौगत बोस इस तर्क को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने अपने शोध के आधार पर दावा किया कि विंस्टन चर्चिल ने 1942 में नेताजी की हत्या के आदेश दिए थे। नेताजी के परिवार की कथित निगरानी भी इस रहस्य को और गहरा करती है। सौगत बोस के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में इंटेलिजेंस ब्यूरो उनके परिवार के सदस्यों और नेताजी की पत्नी एमिली की चिट्ठियों पर नजर रखता था। अनुज धर का दावा है कि उनके पास ऐसे दस्तावेज हैं, जिनसे पता चलता है कि नेहरू ने आईबी को नेताजी के परिवार की गतिविधियों की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए थे। यदि ये दावे सही हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्वतंत्र भारत में नेताजी के परिवार की निगरानी की आवश्यकता क्यों महसूस की गई।
स्वतंत्रता के बाद नेताजी की मृत्यु की जांच के लिए सरकार ने 1956 और 1977 में आयोग गठित किए। दोनों आयोगों ने निष्कर्ष दिया कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में हुई थी। लेकिन बाद में इन जांचों की प्रक्रिया पर सवाल उठे। 1999 में जस्टिस मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग गठित किया गया। 2005 में ताईवान की सरकार ने आयोग को बताया कि 1945 में उसकी भूमि पर ऐसी कोई विमान दुर्घटना दर्ज नहीं हुई थी। इसके बाद मुखर्जी आयोग ने निष्कर्ष दिया कि नेताजी की मृत्यु उस कथित विमान दुर्घटना में होने का कोई निर्णायक प्रमाण नहीं है। हालांकि, भारत सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया।
यहीं से रहस्य और गहरा जाता है। एक ओर विमान दुर्घटना और अंतिम संस्कार के साक्ष्यों का दावा किया जाता है, दूसरी ओर ताईवान की ओर से ऐसी किसी दुर्घटना का रिकॉर्ड न होने की बात सामने आती है। आखिर इन दोनों दावों में सही क्या है? क्या जांच के दौरान सभी संबंधित दस्तावेजों और गवाहियों की पर्याप्त पड़ताल हुई थी? यही वे प्रश्न हैं, जिनके उत्तर आज भी स्पष्ट नहीं हैं।
नेताजी के जीवित रहने की संभावना को बल देने वाली एक और कहानी फैजाबाद के गुमनामी बाबा से जुड़ी है। जस्टिस मुखर्जी आयोग ने भी उनके बारे में जांच की थी। गुमनामी बाबा की कद-काठी, चश्मा लगाने की आदत और जन्मतिथि जैसी कुछ बातें नेताजी से मिलती थीं। उनका निधन 18 सितंबर 1985 को हुआ। उनके बारे में यह दावा भी किया गया कि वे ही सुभाष चंद्र बोस थे। हालांकि, इस दावे को प्रमाणित करने वाला निर्णायक वैज्ञानिक साक्ष्य सामने नहीं आया।
इसलिए नेताजी की मृत्यु का रहस्य केवल भावनाओं या आशंकाओं का विषय नहीं है। यह इतिहास से जुड़े उन सवालों का विषय है, जिनका उत्तर दस्तावेजों, वैज्ञानिक परीक्षण और प्रमाणित साक्ष्यों के आधार पर ही मिल सकता है। नेताजी जैसे महान राष्ट्रभक्त की अंतिम यात्रा वास्तव में कैसे समाप्त हुई, यह जानने का अधिकार देश को है। सवाल आज भी वही है—एक महान देशभक्त की रहस्यमयी मौत से अभी तक पूरी तरह परदा क्यों नहीं हटा?

अरविंद जयतिलक
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)