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Madhya Pradesh Role in Freedom Struggle

भारत की आजादी में मध्य भारत का योगदान, रानी-महारानियों से लेकर कलम के सिपाहियों ने जगाई अलख

मध्यभारत ने आजादी की लड़ाई में 1857 की क्रांति से भारत छोड़ो आंदोलन और भोपाल विलय तक अहम भूमिका निभाई।


भारत की आजादी में मध्य भारत का योगदान रानी-महारानियों से लेकर कलम के सिपाहियों ने जगाई अलख

Middle India Role In Freedom Movement |

अगस्त महीने की 15 तारीख आते ही हमारे सामने सबसे पहले दिल्ली का लाल किला, तिरंगा और आजादी का जश्न दिखाई देता है। लेकिन भारत की आजादी की यह कहानी सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं थी। देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। किसी ने हथियार उठाए, किसी ने सत्याग्रह किया, किसी ने जेल काटी और किसी ने देश के लिए अपनी जान तक दे दी। इस पूरी लड़ाई में उस इलाके की भी अहम भूमिका रही, जिसे आज हम मध्यप्रदेश के नाम से जानते हैं। 1857 से लेकर 1947 तक करीब 90 साल के इस सफर में मध्यभारत की धरती ने विद्रोह भी देखा, आंदोलन भी देखा और बलिदान भी।

तो इस लेख में जानिए आखिर भारत की आजादी की इस लंबी कहानी में मध्यप्रदेश का योगदान क्या था?

1857 से शुरू हुई मध्यभारत की क्रांति

कहानी शुरू होती है साल 1857 से। देश के कई हिस्सों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह भड़क चुका था और इसकी आग मध्यभारत तक भी पहुंच गई। महाकोशल और बुंदेलखंड के इलाकों में अंग्रेजों के खिलाफ लोगों ने मोर्चा खोलना शुरू कर दिया। सागर, दमोह और जबलपुर जैसे इलाकों में भी विद्रोह की आवाज उठी। यानी 1857 की क्रांति सिर्फ उत्तर भारत के कुछ इलाकों की कहानी नहीं थी, मध्यभारत भी इस बड़े विद्रोह का हिस्सा बन चुका था। इसी दौरान रामगढ़ की रानी अवंतीबाई लोधी का नाम सामने आया।

रानी अवंतीबाई से रानी लक्ष्मीबाई तक, वीरांगनाओं का अदम्य साहस

मध्यभारत में रानी अवंतीबाई अंग्रेजों के खिलाफ उठी एक और तलवार थीं। साहस की प्रतिमूर्ति रानी अवंतीबाई लोधी ने 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ नेतृत्व किया। उन्होंने अपने साथियों और सैनिकों को संगठित किया और अंग्रेजी शासन को सीधी चुनौती दी। इसी दौर में मध्यभारत के एक और हिस्से में इतिहास की सबसे चर्चित वीरांगनाओं में से एक अंग्रेजों के सामने खड़ी थीं—रानी लक्ष्मीबाई। 1857 की क्रांति के सबसे बड़े चेहरों में रानी लक्ष्मीबाई का नाम था। झांसी से शुरू हुआ उनका संघर्ष आगे बढ़ते-बढ़ते ग्वालियर तक पहुंचा। तात्या टोपे भी इस संघर्ष में उनके साथ थे।

1858 में ग्वालियर का इलाका अंग्रेजों और क्रांतिकारियों के बीच संघर्ष का बड़ा केंद्र बना। फिर आया 18 जून 1858। ग्वालियर के पास लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था। तात्या टोपे ने भी लड़ाई जारी रखी। आखिरकार अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और अप्रैल 1859 में शिवपुरी में फांसी दे दी। 1857 का विद्रोह दबा दिया गया था, लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की भावना को दबाया नहीं जा सका।

वैचारिक क्रांति, साहित्य और शुरुआती सत्याग्रह

1857 के बाद अंग्रेजी शासन और मजबूत हुआ, लेकिन देश में आजादी की इच्छा खत्म नहीं हुई। धीरे-धीरे राजनीतिक जागरूकता बढ़ने लगी। 1906 में जबलपुर में कांग्रेस प्रांतीय समिति की स्थापना हुई। अब आजादी की लड़ाई सिर्फ हथियारों से नहीं लड़ी जा रही थी। लोग बैठकों में शामिल हो रहे थे और राजनीतिक संगठन बन रहे थे। इस लड़ाई में मैदान में लड़ने वाले योद्धाओं के साथ-साथ कलम ने भी बड़ी भूमिका निभाई। साहित्य ने लोगों के अंदर देशभक्ति की भावना जगाई। मध्यप्रदेश से जुड़े साहित्यकारों में माखनलाल चतुर्वेदी और सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम खास तौर पर लिया जाता है।

माखनलाल चतुर्वेदी की ‘पुष्प की अभिलाषा’ जैसी रचनाओं ने देश के लिए त्याग और बलिदान की भावना को मजबूत किया। यानी अब आजादी की लड़ाई तलवार से निकलकर कलम तक पहुंच चुकी थी। साल 1916 में सिवनी और जबलपुर में होम रूल लीग की शाखाएं स्थापित हुईं। फिर आया साल 1923—जबलपुर का झंडा सत्याग्रह। लोगों के लिए तिरंगा सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि देश की आजादी और सम्मान का प्रतीक बन चुका था। सत्याग्रहियों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कराया। प्रशासन ने रोकने की कोशिश की, लेकिन लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ।

जंगल सत्याग्रह से भारत छोड़ो आंदोलन तक

अब आजादी की लड़ाई एक और नए मोड़ पर पहुंच चुकी थी। साल 1930 में जंगल सत्याग्रह हुआ। महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। जहां देश में नमक कानून तोड़ा जा रहा था, वहीं मध्य प्रांत में सिवनी और बैतूल जैसे इलाकों में आदिवासियों और स्थानीय लोगों ने अंग्रेजों के वन कानूनों को चुनौती दी। सिवनी के गांज ताल और बैतूल के घोड़ाडोंगरी में जंगल सत्याग्रह हुए। यानी राष्ट्रीय आंदोलन की आवाज अब शहरों से निकलकर जंगलों और गांवों तक पहुंच चुकी थी।

लेकिन इसी दौर में मध्यभारत ने एक बेहद दर्दनाक घटना चरणपादुका गोलीकांड भी देखी। 14 जनवरी 1931 को छतरपुर के चरणपादुका में शांतिपूर्ण सभा कर रहे लोगों पर अंग्रेजों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं। इस घटना को "मध्यप्रदेश का जलियांवाला बाग" कहा जाता है। इसके बाद साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आया। गांधीजी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' के आह्वान की गूंज ग्वालियर, उज्जैन, भोपाल, इंदौर और जबलपुर सहित पूरे मध्यभारत में सुनाई दी। हड़तालें हुईं, जुलूस निकले और बड़ी संख्या में लोग जेल गए। अब आजादी की मांग सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि हर आम इंसान की मांग बन चुकी थी।

1947 में आजादी, फिर सामने आई रियासतों के एकीकरण की चुनौती

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया। लेकिन आजाद भारत के सामने एक बड़ी चुनौती रियासतों का एकीकरण थी। मध्यभारत में ग्वालियर, इंदौर, भोपाल और रीवा जैसी बड़ी रियासतें थीं। इसी बीच भोपाल की कहानी सामने आती है।

1947 में भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान भोपाल को स्वतंत्र रखना चाहते थे। हालांकि उन्होंने 14 अगस्त 1947 को Instrument of Accession पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन यह पूर्ण विलय नहीं था। भोपाल की जनता ने भारत में पूर्ण विलय की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया। इसमें बाद में भारत के राष्ट्रपति बने डॉ. शंकर दयाल शर्मा भी शामिल रहे और उन्हें जेल जाना पड़ा।

सरदार पटेल और वी.पी. मेनन की कूटनीतिक कोशिशों और जनता के दबाव के आगे आखिरकार नवाब को पूर्ण विलय के लिए झुकना पड़ा। दूसरी तरफ, इंदौर के महाराजा यशवंतराव होलकर और ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया ने भी भारत के साथ विलय स्वीकार किया। आगे चलकर 'मध्य भारत' और 'विंध्य प्रदेश' जैसी प्रशासनिक इकाइयां बनीं। 26 जनवरी 1950 को भारत गणतंत्र बना और 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन के बाद मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल राज्य और तत्कालीन मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों को मिलाकर वह राज्य बनाया गया, जिसे आज हम मध्यप्रदेश कहते हैं। तब छत्तीसगढ़ भी अविभाजित मध्यप्रदेश का ही हिस्सा था।

आजादी की कहानी में मध्यप्रदेश की माटी का योगदान

तो जब इस 15 अगस्त को हम तिरंगा फहराएं, तो सिर्फ 15 अगस्त 1947 को याद मत कीजिए। उससे पहले के उन लोगों को भी याद कीजिए, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई। ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई और 1857 के क्रांतिकारियों को याद कीजिए। चरणपादुका के उन शहीदों को याद कीजिए, जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपनी जान गंवाई। सिवनी और बैतूल के जंगल सत्याग्रहियों को याद कीजिए और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे साहित्यकारों की लेखनी को याद कीजिए। 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में जेल जाने वाले वीरों को याद कीजिए और आजादी के बाद देश को एक सूत्र में पिरोने वाले जन-नेताओं को याद कीजिए।

क्योंकि आजादी सिर्फ अंग्रेजों के चले जाने का नाम नहीं थी। भारत को एकजुट रखना भी उतना ही बड़ा काम था। 1857 के संग्राम से लेकर 1949 के भोपाल विलय तक, मध्यप्रदेश की इस मिट्टी ने इतिहास के हर पन्ने पर अपना खून और पसीना सींचा है।

इसलिए इस 15 अगस्त पर जब तिरंगा लहराए, तो याद रखिए इस तिरंगे की शान में मध्यप्रदेश की माटी का भी एक अहम हिस्सा है।

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