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माँ का साहस: आपातकाल की कहानी

आपातकाल की आपबीती: जेल में रहा बेटा, माँ का साहस बना परिवार का संबल

1975 के आपातकाल में, बाबूलाल ताम्रकार की गिरफ्तारी के बाद, उनकी माँ तुलसादेवी ने परिवार और व्यापार की जिम्मेदारी संभाली।


आपातकाल की आपबीती जेल में रहा बेटा माँ का साहस बना परिवार का संबल

भोपाल। वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा के साथ ही शासन-प्रशासन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ से जुड़े कार्यकर्ताओं के विरुद्ध व्यापक धरपकड़ आरंभ कर दी। अनेक लोग आंदोलनों के कारण गिरफ्तार हुए, तो अनेक निर्दोष केवल संदेह के आधार पर मीसा के अंतर्गत जेल भेज दिए गए। इस दमनचक्र ने न केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं को, बल्कि उनके परिवारों को भी गहरे संकट में डाल दिया।

विदिशा नगर पालिका के तत्कालीन पार्षद एवं बर्तन व्यवसायी बाबूलाल ताम्रकार उस समय मात्र 29 वर्ष के थे। वे अपने वृद्ध पिता रामप्रसाद ताम्रकार के साथ पारिवारिक व्यवसाय का संचालन करते थे। परिवार में माता-पिता, पत्नी और छोटा भाई थे। आपातकाल लागू होते ही प्रशासन उन्हें गिरफ्तार करने के लिए सक्रिय हो गया। लगभग एक सप्ताह तक भूमिगत रहने के बाद जनसंघ के वरिष्ठ नेता प्यारेलाल खंडेलवाल के मार्गदर्शन में उन्होंने साथियों सहित विदिशा रेलवे स्टेशन पर सरकार के विरोध में प्रदर्शन किया और स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी। 

युवा पुत्र और परिवार के मुखिया के जेल चले जाने से घर की आर्थिक रीढ़ टूटने लगी। वृद्ध पिता मोतियाबिंद से पीड़ित थे और दुकान संभालने की स्थिति में नहीं थे। ऐसे कठिन समय में माँ तुलसादेवी ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। उन्होंने स्वयं बर्तन की दुकान की जिम्मेदारी संभाली और पूरे परिवार के भरण-पोषण का दायित्व अपने कंधों पर उठा लिया। उनका यह त्याग उस युग की असंख्य माताओं के मौन संघर्ष का प्रतीक बन गया।बाबूलाल ताम्रकार बताते हैं कि उस समय विदिशा नगर पालिका में जनसंघ का बहुमत था और अध्यक्ष नर्सिंगदास गोयल भी जनसंघ के थे। आपातकाल के दौरान कई जनसंघ पार्षद जेल में बंद थे। इसका लाभ उठाकर कांग्रेस ने अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

अध्यक्ष को बचाने के लिए सभी बंदी पार्षदों को अस्थायी पैरोल मिली। उनके लौटते ही अविश्वास प्रस्ताव विफल हो गया। किंतु कुछ ही समय बाद पुनः वारंट जारी कर सभी को फिर जेल भेज दिया गया। इस प्रकार बाबूलाल ताम्रकार लगभग तेरह माह तक मीसाबंदी रहे। वे स्मरण करते हैं कि भोपाल जेल में स्थानाभाव होने पर अनेक मीसाबंदियों को विदिशा जेल भेजा गया, जहाँ मात्र चार कमरों में 307 बंदियों को रखा गया था। राजनीतिक बंदियों को भी गंभीर अपराधियों के साथ रखा गया। जब राशन वितरण में अनियमितताओं के विरोध में मीसाबंदियों ने आवाज उठाई, तब अन्य बंदियों ने भी उनका साथ दिया। बाद में कुछ बंदियों को बेगमगंज और सागर की जेलों में स्थानांतरित किया गया।

बाबूलाल ताम्रकार का सार्वजनिक जीवन आपातकाल के बाद भी निरंतर सक्रिय रहा। वे जनसंघ और जनता पार्टी में विभिन्न संगठनात्मक दायित्व निभाते रहे, नगर पालिका के पार्षद बने तथा वर्ष 2006 से 2014 तक जिला सहकारी बैंक, विदिशा के अध्यक्ष रहे। उनका जीवन इस सत्य का साक्षी है कि इतिहास केवल जेल जाने वालों के संघर्ष से नहीं, बल्कि उन माताओं के अदम्य साहस से भी निर्मित होता है, जिन्होंने परिवार को टूटने नहीं दिया।

आपातकाल केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर लगा पहरा नहीं था, बल्कि उसने हजारों परिवारों की आजीविका, आत्मसम्मान और भविष्य को भी कठोर परीक्षा में डाल दिया। ऐसे ही विषम समय में विदिशा के युवा जनसंघ नेता बाबूलाल ताम्रकार के जेल जाने के बाद उनकी वृद्ध माता तुलसादेवी ने जिस धैर्य, त्याग और आत्मबल के साथ परिवार और व्यापार की बागडोर संभाली, वह उस दौर के मौन संघर्षों का प्रेरक अध्याय बन गया।

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