डाइवर्सिटी अर्थात विविधता, विविधता अर्थात सभी का सम्मान, जो अलग है उनका भी सम्मान और आदर। और यह होना भी चाहिए। भारत तो है ही विविधताओं का देश और भारत में यह विविधता आज की नहीं है और न ही विविधता की अवधारणा कोई नई है। यह अवधारणा तो बहुत पुरानी है और न जाने कब से है। रामायण से लेकर महाभारत में भी विविध पहचानों का सम्मान है।
मगर अब क्या ऐसा हुआ है कि विविधता को ऊपर से थोप दिया है। भारत में तो बाहर से आए विदेशियों का भी आदर किया गया, फिर चाहे उन्होनें हिन्दू संस्कृति को कितनी भी हानि क्यों नहीं पहुंचाई हो। उसे विचारों और दर्शन की विविधता मानकर स्वीकार कर लिया गया।
मगर इन दिनों जो विविधता की परिभाषा है, वह कहीं न कहीं हिन्दू द्वेष को जन्म दे रही है। वह ऐसा माहौल पैदा कर रही है जिससे हिंदुओं के प्रति घृणा को बढ़ावा मिलता है। जहां विदेशों में डाइवर्सिटी का अर्थ पूरी तरह से श्वेत और हिन्दू विरोध हो गया है, तो वहीं भारत में भी स्थिति भिन्न नहीं है। भारत जैसे विविधता का सम्मान करने वाले देश में, और विशेषकर हिंदुओं के सर्व स्वीकार्यता वाली भावना वाले वातावरण में वह कौन सा वर्ग है, जो कॉर्पोरेट में
हिन्दू विरोधी वातावरण पैदा कर रहा है?
यह प्रश्न इसलिए उभर कर आ रहा है क्योंकि भारत के कोरपोर्टेस में लगातार ही हिन्दू विरोधी माहौल बनता जा रहा है। टीसीएस के बाद अब विप्रो से भी ऐसे ही समाचार आए हैं, जिनमें हिन्दू लड़कियों के साथ गलत व्यवहार किया गया।
कॉर्पोरेट जिहाद के आरोप फिर से लगाए गए हैं। मगर यह बात केवल इतनी ही नहीं है। विविधता के नाम पर ऐसे विज्ञापन बने जिन्होनें हिन्दू धर्म को नीचा दिखाया, फिर चाहे वह तनिष्क का चर्चित विज्ञापन हो या फिर कन्यामान, वाला! सर्फ इक्सेल का होली वाला विज्ञापन हो जिसमें एक बच्ची एक मुस्लिम बच्चे को बचाती हुई नमाज के लिए लेकर जाती है या फिर दीपावली पर सीएट टायर का आमिर खान का विज्ञापन कि सड़कें चलने के लिए पटाखों के लिए नहीं!
जबकि डाइवर्सिटी के नाम पर दूसरे पर्वों के लिए सकारात्मक विमर्श तैयार किया गया। जो अभी टीसीएस या विप्रो में सामने आया है, उसकी नींव तो कई सालों से रखी ही जा रही थी, जिसमें कॉर्पोरेट ड्रेसेस में से हिन्दू धार्मिक प्रतीक चिह्न गायब कर दिए गए, मगर हिजाब आदि जारी रखे गए।
न केवल जारी रखे गए, बल्कि कई कॉर्पोरेट्स में डाइवर्सिटी के नाम पर हिजाब को प्रोत्साहित करने वाले दिन अर्थात वर्ल्ड हिजाब डे को भी मनाया जाता है। हालांकि कोई संगठित कॉर्पोरेट ईवेंट नहीं होता है, मगर कई मल्टीनेशनल कंपनी इसे अब स्वीकार करने लगी हैं।
जबकि हमने हाल ही में लेंसकार्ट और कुछ अन्य कंपनियों के ड्रेस कोड में देखा था कि कैसे सिंदूर आदि को लगाने से मना किया गया था। तो इससे क्या समझा जाए कि यूनिफ़ॉर्मिटी के नाम पर हिन्दू प्रतीकों को मिटाकर एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहां पर हिन्दू प्रतीक ही नहीं होंगे?..
जो भी हो रहा है, उसे कॉर्पोरेट जिहाद नहीं बल्कि और कुछ कहा जाना चाहिए, क्योंकि कथित डाइवर्सिटी नीतियां ही हिंदुओं के प्रति द्वेष में कहीं न कहीं भूमिका निभा रही हैं।