आपातकाल के दौरान जेल में बंद श्री कृष्णकुमार अष्ठाना ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की। उनका जीवन और संघर्ष आज भी लोकतंत्र और समाजसेवा के लिए प्रेरणा बना हुआ है।
इंदौर। आपातकाल का वह स्याह और बर्बर कालखंड आज भी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास पर एक अमिट दाग की तरह अंकित है। जब-जब लोकतंत्र पर संकट की चर्चा होती है, तब-तब वे 21 महीने स्मृतियों में जीवंत हो उठते हैं, जब नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति का अधिकार और संवैधानिक मर्यादाएं सत्ता के कठोर शिकंजे में कैद थी। उस दौर में हजारों राष्ट्रनिष्ठ कार्यकर्ताओं ने जेल की सलाखों के पीछे रहकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प निभाया। ऐसे ही संघर्षशील व्यक्तित्व थे वरिष्ठ स्वयंसेवक, पत्रकार और संपादक श्री कृष्णकुमार अष्ठाना, जिनका जीवन राष्ट्रसेवा, संगठन और त्याग का पर्याय बन गया।
आपातकाल लगते ही इंदौर के रामबाग स्थित 'स्वदेश' कार्यालय की तीसरी मंजिल से पुलिस ने श्री अष्ठानाजी को हिरासत में लिया और बाद में पूरे स्वदेश स्टाफ को भी जेल भेज दिया। उस समय वे अपनी माताजी भगवतीदेवी अष्ठाना तथा पत्नी उर्मिलेश अष्ठाना के साथ रहते थे। संघर्ष उनके संस्कारों में था। उनकी माताजी स्वयं सत्याग्रह के दौरान तिहाड़ जेल में रह चुकी थीं। अष्ठानाजी के जेल जाने के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी पत्नी उर्मिलेशजी के कंधों पर आ गई। आर्थिक अभावों के बीच उन्होंने शिशु मंदिर में अध्यापन कर परिवार का भरण-पोषण किया और ग्वालियर में बीएमएस की पढ़ाई कर रहे देवर डॉ. अशोक अष्ठाना को भी नियमित आर्थिक सहायता भेजती रहीं।
आपातकाल की क्रूरता का यह भी चेहरा था कि केवल विचार नहीं, रक्त संबंध भी अपराध मान लिए गए थे। अष्ठानाजी के छोटे भाई डॉ. अशोक अष्ठाना को केवल इसलिए पांच-छह माह तक ग्वालियर जेल में रखा गया कि वे कृष्णकुमार अष्ठाना के भाई थे। उस समय भाई-भाई, पिता-पुत्र और काका-भतीजे तक को एक साथ जेलों में बंद कर दिया जाता था, ताकि बाहर रहकर कोई भी लोकतंत्र के पक्ष में आवाज न उठा सके। संघर्ष के बीच उर्मिलेशजी का साहस भी कम प्रेरणादायी नहीं था। एक दिन स्कूल जाते समय इमली बाजार क्षेत्र में सड़क के गड्ढे में पैर फिसलने से उनका पैर फ्रैक्चर हो गया। प्लास्टर चढ़ा, किंतु उन्होंने विद्यालय जाना नहीं छोड़ा। वे प्रत्येक माह दो बार जेल जाकर अष्ठानाजी से मिलती थीं। अनेक आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों के बावजूद परिवार ने कभी उन्हें माफीनामा लिखकर रिहाई लेने के लिए प्रेरित नहीं किया। यही परिवार का त्याग और अष्ठानाजी का अदम्य आत्मबल था।
इंदौर जिला जेल में उस समय इंदौर सहित रतलाम, देवास, खंडवा, खरगोन और बुरहानपुर सहित अनेक जिलों के मीसाबंदी निरुद्ध थे। जैसे जैसे संख्या बढ़ी, जेल की व्यवस्थाएं चुनौती बनने लगीं। तब श्री कृष्णकुमार अष्ठाना के नेतृत्व में एक 'व्यवस्था समिति' का गठन किया गया, जिसमें प्रत्येक बैरक से दो-दो मीसाबंदियों को प्रतिनिधि बनाया गया। यह समिति जेल प्रशासन से समन्वय स्थापित कर भोजन, आवास, समाचार पत्र, चिकित्सकीय सुविधा और परिजनों से मुलाकात जैसी व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करती थी।
प्रारंभ में सभी मीसाबंदियों को 'सी' क्लास का बंदी मानकर न्यूनतम सुविधाएं दी जा रही थीं। समिति ने जेल मैन्युअल का अध्ययन कर नियमों के अनुरूप 'ए' और 'बी' श्रेणी का वर्गीकरण कराने की मांग उठाई। इसके परिणामस्वरूप बंदियों को समान गुणवत्ता का भोजन मिलने लगा, बीमार बंदियों के लिए दूध और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाने लगीं तथा समस्त व्यवस्थाएं पारदर्शी ढंग से संचालित होने लगीं। प्रतिदिन समिति के सदस्य सूची के अनुसार सामग्री का वितरण सुनिश्चित करते थे। अष्ठानाजी के कुशल नेतृत्व का ही परिणाम था कि किसी बैरक से शिकायत नहीं आती थी। यहां तक कि केंद्रीय जेल से स्थानांतरित होकर आए मीसाबंदी भी इस अनुशासित व्यवस्था को आपातकाल समाप्त होने के बाद श्री अष्ठानाजी को इंदौर महानगर देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे।
आपातकाल समाप्त होने के बाद श्री अष्ठानाजी को इंदौर महानगर देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे। कार्यवाह का दायित्व मिला। आगे चलकर वे 'स्वदेश' के प्रबंध संपादक, प्रेस क्लब के अध्यक्ष, रोटरी क्लब के मानद सदस्य तथा दयानंद शिक्षण समिति के अध्यक्ष बने। उन्होंने मालवा प्रांत के प्रांत संघचालक के रूप में संगठन विस्तार, नए कार्यकर्ताओं के निर्माण और विविध अनुषांगिक संस्थाओं के सशक्तीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कुशल संपादन में बाल पत्रिका 'देवपुत्र' ने विश्व की सर्वाधिक प्रसार संख्या वाली बाल पत्रिका होने का गौरव प्राप्त किया। लेखन, व्याख्यान और संगठन क्षमता ने उन्हें एक आदर्श लेखक, विचारक और स्वयंसेवक के रूप में प्रतिष्ठित किया।
30 दिसंबर 2022 को इंदौर में आयोजित उनके 'सहस्थ चंद्र दर्शन' समारोह में उन्होंने अपने जीवन का मूल मंत्र साझा करते हुए कहा था कि उन्होंने स्वर्गीय एकनाथ रानडे से आजीवन संघ कार्य करने का जो वचन दिया था, उसे निभाने में उन्हें अपार आनंद मिला। जीवन की अंतिम बेला (14 जनवरी 2025) में भी उनका मन संगठन और राष्ट्रकार्य में ही रमा रहा। मकर संक्रांति के दिन उन्होंने सरसंघचालक से मिलने की इच्छा व्यक्त की और जब उनसे पूछा गया कि क्या वे अपनी जीवन यात्रा से संतुष्ट हैं, तो उनका शांत उत्तर था- 'मैं पूर्णतः संतुष्ट हूं।' श्री कृष्णकुमार अष्ठाना का जीवन इस सत्य का सशक्त प्रमाण है कि जेल की सलाखें विचारों को कैद नहीं कर सकतीं। उनका संघर्ष, परिवार का त्याग और राष्ट्रनिष्ठा का उनका तप आज भी लोकतंत्र, संगठन और समाजसेवा के पथ पर चलने वाली पीढ़ियों के लिए एक अखंड प्रेरणाज्योति बना हुआ है।