टाकेडा द्वारा विकसित जापानी वैक्सीन 'क्यूडेंगा' को भारत में मंजूरी मिली है, जिससे डेंगू के खिलाफ लड़ाई में नई उम्मीदें जगी हैं। यह वैक्सीन डेंगू के सभी प्रकारों के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रदान करती है।
भारत में हर वर्ष मानसून के साथ डेंगू का खतरा भी दस्तक देता है। अस्पतालों में बढ़ती मरीजों की संख्या, प्लेटलेट्स कम होने की चिंता और गंभीर मामलों में होने वाली मौतें वर्षों से देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती रही हैं। लेकिन अब डेंगू के खिलाफ लड़ाई में एक ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। जापान की दवा निर्माता कंपनी टाकेडा द्वारा विकसित डेंगू वैक्सीन 'क्यूडेंगा' को भारत में मंजूरी मिल चुकी है। यह भारत में स्वीकृत होने वाली पहली डेंगू वैक्सीन है, जिससे डेंगू की रोकथाम की दिशा में नई उम्मीद जगी है।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि डेंगू पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि भारत ने इसके खिलाफ एक महत्वपूर्ण हथियार हासिल कर लिया है। भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां डेंगू का बोझ अधिक है। बदलती जलवायु, अनियोजित शहरीकरण और मच्छरों के बढ़ते प्रजनन स्थलों ने इस बीमारी को और गंभीर बना दिया है।
डेंगू एक साधारण वायरल बुखार नहीं है। यह चार अलग-अलग प्रकार के वायरस-डीईएनवी-1, डीईएनवी-2, डीईएनवी-3 और डीईएनवी-4-के कारण होता है। किसी व्यक्ति को एक बार डेंगू हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि वह भविष्य में सुरक्षित हो गया। दूसरी बार किसी अन्य प्रकार के वायरस से संक्रमित होने पर गंभीर डेंगू का खतरा बढ़ सकता है। यही कारण है कि इसके खिलाफ प्रभावी वैक्सीन विकसित करना वैज्ञानिकों के लिए कठिन चुनौती रहा है।
क्यूडेंगा की विशेषता यह है कि इसे डेंगू के चारों प्रकार के वायरस के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है। इसके लिए यह जानना आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति को पहले डेंगू हुआ है या नहीं। पहले विकसित कुछ डेंगू वैक्सीनों में पूर्व संक्रमण की स्थिति महत्वपूर्ण थी, लेकिन क्यूडेंगा इस बाध्यता से मुक्त है। इससे इसके व्यापक उपयोग का रास्ता खुलता है।
भारत के औषधि महानियंत्रक द्वारा इस वैक्सीन को 4 से 60 वर्ष तक की आयु के लोगों के लिए मंजूरी प्रदान की गई है। इसे दो खुराकों में दिया जाएगा और दोनों खुराकों के बीच तीन महीने का अंतर होगा। यदि इसका टीकाकरण उचित योजना के साथ किया जाता है तो बड़ी आबादी को डेंगू के गंभीर प्रभावों से बचाने में मदद मिल सकती है। क्लिनिकल परीक्षणों के परिणाम भी उत्साहजनक रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वैक्सीन प्रयोगशाला द्वारा पुष्टि किए गए डेंगू संक्रमण के मामलों को लगभग 80 प्रतिशत तक कम करने में प्रभावी पाई गई है। गंभीर डेंगू के कारण अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता को लगभग 90 प्रतिशत तक कम करने की क्षमता भी देखी गई है। यदि वास्तविक जीवन में बड़े पैमाने पर यही परिणाम सामने आते हैं तो मानसून के दौरान अस्पतालों पर पड़ने वाला दबाव काफी कम हो सकता है।
हालांकि, अत्यधिक उत्साह में यह भूलना उचित नहीं होगा कि यह कोई जादुई समाधान नहीं है। डेंगू से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका अभी भी मच्छरों के प्रजनन को रोकना है। वैक्सीन संक्रमण और गंभीर बीमारी के जोखिम को कम कर सकती है, लेकिन मच्छरों से बचाव और उनके प्रजनन स्थलों को समाप्त करने की आवश्यकता बनी रहेगी।
भारत में डेंगू नियंत्रण की बड़ी समस्या यह रही है कि बीमारी फैलने के बाद इलाज पर अधिक ध्यान दिया जाता है। नगर निकायों की ओर से समय पर फॉगिंग, जलभराव की रोकथाम और स्वच्छता जैसे उपाय कई स्थानों पर पर्याप्त प्रभावी नहीं रहे हैं। वैक्सीन के आगमन के साथ इन व्यवस्थाओं को मजबूत करना भी जरूरी होगा। एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह वैक्सीन भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा बनेगी। वर्तमान में इसके निजी अस्पतालों के माध्यम से उपलब्ध होने की संभावना अधिक है और बाजार में आने की उम्मीद वर्ष 2027 के पहले छह महीनों में जताई गई है। यदि इसकी कीमत अधिक रही तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक इसकी पहुंच सीमित हो सकती है। इसलिए सरकार को इसकी लागत और सार्वजनिक उपयोग के मॉडल पर गंभीरता से विचार करना होगा।
डेंगू अब केवल महानगरों की समस्या नहीं रह गया है। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक इसका विस्तार हो चुका है। ऐसे में भविष्य में यदि राज्यों के स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाए जाते हैं तो लाखों लोगों को गंभीर डेंगू से बचाया जा सकता है। कोविड-19 के दौरान भारत ने बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाने की अपनी क्षमता भी साबित की है। फिर भी घरों के आसपास पानी जमा न होने देना, मच्छरदानी और मच्छररोधी साधनों का उपयोग करना, पूरी बाजू के कपड़े पहनना तथा शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सकीय परामर्श लेना पहले की तरह आवश्यक रहेगा। किसी भी वैक्सीन का उद्देश्य बीमारी के खतरे को कम करना है, उसे शत-प्रतिशत समाप्त करना नहीं।
क्यूडेंगा का भारत में आगमन चिकित्सा विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि है। दशकों से डेंगू के खिलाफ प्रभावी वैक्सीन की प्रतीक्षा की जा रही थी। यदि सरकार, चिकित्सा समुदाय और आम जनता मिलकर इसका सही उपयोग सुनिश्चित करें तो आने वाले वर्षों में डेंगू के कारण होने वाली गंभीर बीमारियों और मौतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
डेंगू के खिलाफ लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है, लेकिन पहली बार जीत की दिशा में एक ठोस अवसर सामने आया है। जापानी वैक्सीन ने वह संभावना उपलब्ध कराई है, जिसका इंतजार वर्षों से था। अब आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान द्वारा दिए गए इस अवसर को जनहित में प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

एड. जयदेव राठी
(लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)