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इस्लामिक नियमों पर चलेगा केरल

देश के कथित रूप से सबसे साक्षर प्रांत में “इस्लामिक जिम!” आखिर क्यों?

सोनाली मिश्रा


देश के कथित रूप से सबसे साक्षर प्रांत में “इस्लामिक जिम” आखिर क्यों

केरल का नाम जब भी लिया जाता है तो उसे सबसे साक्षर प्रांत कहा जाता है और ऐसा ही कह-कहकर देश के अन्य प्रांतों को नीचा दिखाया जाता है। मगर केरल में इस्लामिक कट्टरता तेजी से बढ़ रही है और केरल ही ऐसा प्रांत है, जहां से लव जिहाद जैसे शब्द की शुरुआत हुई थी। 

मगर अब जो केरल को लेकर सामने आया है, वह कथित साक्षर प्रांत की कथित पढ़ाई की कलई खोलता है। केरल में कॉंग्रेस और मुस्लिम लीग की सरकार आने के बाद कट्टरता बढ़ने की आशंका लोगों को थी ही। मगर यह इतनी जल्दी होगा, यह किसी ने कल्पना नहीं की होगी। कहते हैं कि जब सत्ता का चरित्र बदलता है तो उसके स्वाभाविक गुण वाले लोग जल्दी ही सामने आने लगते हैं। ऐसा ही केरल के एक जिम के मामले को लेकर दिखा, जब केरल के पलक्कड जिले में एक जिम मालिक ने अपने जिम के लिए इस्लामिक नियम बना दिए। 

वहाँ पर लोग आएंगे तो उन्हें इस्लामिक नियमों का पालन करना होगा। आम तौर पर जिम में गाने चलते हैं और मॉडर्न वर्कआउट आउटफिट और महिला और पुरुष एक साथ ही वर्कआउट करते हैं। मगर अब केरल के इस जिम में मालिक का कहना है कि ऐसा नहीं होगा। उसका मानना है कि वह यह चाहता है कि लोग फिटनेस से जुड़ें और वे खासतौर पर वे लोग, जो मजहबी कारणों से जिम नहीं आ सकते हैं। जो अपने इस्लामिक तौर तरीकों, जैसे कि गाना न सुनना, महिलाओं के साथ वर्क आउट न करना, जैसे नियमों के चलते सेहत नहीं बना पाते हैं। इस जिम में कई नए नियम बना दिए गए हैं, जैसे कि जिम में तेज संगीत नहीं चलेगा। 

पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग अलग समय निर्धारित है। पुरुषों को पुरुष और महिलाओं को महिला ट्रेनर ही सिखाते हैं। महिलाओं के लिए हिजाब जरूरी है। और हाँ, जिम सभी धर्मों के लोगों के लिए खुला है।  मगर एक सेक्युलर देश और सबसे शिक्षित प्रांत में एक जिम इस्लामिक रवायतों से चलेगा और गैर मुस्लिमों को भी जिम में मुस्लिमों के कानून के अनुसार चलना पड़ेगा?

यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर शायद कॉंग्रेस के पास भी नहीं होगा और इस बात का उत्तर भी कि आखिर एक सेक्युलर देश में कैसे कॉंग्रेस के आने के बाद लोगों की हिम्मत हो जाती है कि वह मजहब के आधार पर जिम जैसी जगहों को चला सकें? क्या सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह से मजहबी लिबासों की स्वीकार्यता से इनके प्रति आकर्षण पैदा नही होगा? और सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि अगर जिम वाला यह कहता कि वह हिन्दू नियमों के अनुसार जिम का संचालन कर रहा है तो कॉंग्रेस और लीग का रवैया क्या होता? 
क्या कॉंग्रेस की सरकार आते ही लोगों को लगता है कि शरिया लागू हो गया है या फिर शरिया स्वीकार्य हो गया है देश में?

आखिर लोगों की हिम्मत कैसे हो जाती है कि वह एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में सार्वजनिक स्थलों को लेकर एक मजहबी आधार पर नियम बना दें? और उसके बाद यह भी दावा किया जाए कि वह प्रांत सबसे शिक्षित प्रांत है? यह एक विद्रूपता से बढ़कर कुछ नहीं है!

सोनाली मिश्रा

 

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