ईरान में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों का जिस प्रकार हनन हो रहा है, वह किसी से भी छिपा हुआ नहीं है। ऐसा नहीं है कि उन लड़कियों और बच्चों की कहानियाँ सामने न हों, जो ईरान की सरकार के हाथों अत्याचार का सामना कर रही हैं। रोज ही लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार के मामले सामने आ रहे हैं, लड़कियों के अनिवार्य हिजाब को लेकर जो मामले सामने आए हैं, उनसे भी दुनिया दहल गई थी।
मगर क्या यह कल्पना की जा सकती है कि यूएन की एक कॉमिति, जो महिलाओं, बच्चों और मानवाधिकारों पर नीति निर्धारण करने में सहायता करेगी और साथ ही निशस्त्रीकरण और आतंकवाद को रोकने के लिए नीतियों में सहायता करेगी, उसका प्रमुख और किसी को नहीं बल्कि उस ईरान को बनाया जाए, जिसके यहाँ उसकी अपनी ही महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं?
क्या इसे ऐसा नहीं कहेंगे कि कसाई को ही जानवरों का रक्षक बना दिया गया हो?
ईरान को Committee for Programme and Coordination का वाइस चेयर बनाया गया है। यह यूएन की महत्वपूर्ण बॉडी है, जो यूएन के कार्यक्रमों, बजट, नीति और कोऑर्डनैशन की समीक्षा करती है। यह कमिटी women’s rights, human rights, disarmament (निशस्त्रीकरण), terrorism prevention जैसी संवेदनशील नीतियों को प्रभावित करती है।
क्यों मचा है हंगामा?
प्रश्न उठता है कि हंगामा क्यों मचा हुआ है? यह हंगामा इसलिए मचा है क्योंकि ईरान का अपना रिकार्ड इन तीनों ही चीजों अर्थात महिलाओं, बच्चों, और मानवाधिकारों को लेकर क्या है और कैसा है, यह किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में सरकार विरोधी विरोध प्रदर्शन के दौरान हजारों मौतें सरकार के इशारे पर हुई थीं और विरोध प्रदर्शन करने वाली महिलाओं के साथ बलात्कार, यौन शोषण आदि के लगातार मामले सामने आ रहे थे और आ रहे हैं। यहाँ तक कि ईरान की अपनी परमाणु हथियार की महत्वाकांक्षा है, जिसे उसने किसी से छिपाया भी नहीं है।
महसा अमीनी से लेकर हाल ही में एक नर्स की हत्या तक, हजारों महिलाएं ईरान की सरकार के हाथों मौत के घाट उतारी जा चुकी हैं। इसी ईरान में मोरलिटी पुलिस लगातार इस बात को सुनिश्चित करने के लिए चक्कर लगाती रहती है कि कहीं कोई लड़की सड़क पर बिना हिजाब के न दिख जाए। हिजाब किस तरह से पहना है, वह भी महत्वपूर्ण है।
क्या ऐसा देश लैंगिक समानता के किसी भी सिद्धांत को समझ पाएगा? और मानवाधिकारों की भी बात ईरान के मामले में करना फिजूल है क्योंकि असंख्य बेगुनाह लोगों को उनके परिवारों से दूर इसी सरकार ने किया है और साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों पर भी आंतरिक दुश्मन होने के आरोप लगाकर न जाने क्या-क्या नहीं किया है।
पत्रकार, वकील, कलाकार, और विद्यार्थी, ऐसा कोई भी नहीं होगा, जिसे ईरान की सरकार ने जेल न भेजा हो और कारण क्या? कारण रहा आजादी को लेकर सरकार की आलोचना, मूलभूत अधिकारों को लेकर सरकार की आलोचना। कई आरोप आए कि लोगों को हिरासत में लेकर मनमाने आरोपों पर जबरन हस्ताक्षर करवाए।
क्या ऐसा देश जो अपने नागरिकों के साथ यह करता है, वह मानवाधिकारों को लेकर कुछ सकारात्मक कह पाएगा?
केवल अमेरिका ने विरोध किया
Economic and Social Council में ईरान का नाम आम सहमति के साथ नामांकित किया गया। इस नामांकन का केवल अमेरिका ने विरोध किया और कहा कि ईरान इस भूमिका के लिए उचित नहीं है, मगर शेष पश्चिमी लोकतंत्र जैसे कि फ्रांस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि चुप रहे।
सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि कातिल को ही कानून बनाने की जिम्मेदारी जैसा कदम यूएन कैसे उठा सकता है?