नेपाल में विनाशकारी घटनाओं के बाद भारत पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका। हिमालय की चोटियाँ और बढ़ते जलस्तर से उपजी चिंताएँ।
हिमालय की चोटियों पर बर्फ सदियों से जमा होती रही है। नदियां उन्हीं चोटियों से उतरकर सभ्यताओं को जीवन देती रही हैं। लेकिन इस बार उसी हिमालय ने ऐसी भयावह तस्वीर सामने रखी है, जिसमें पानी के साथ केवल मलबा नहीं बहा, बल्कि हजारों परिवारों के सपने, घर और अपने भी बह गए। 26 अगस्त की सुबह नेपाल-तिब्बत सीमा के पास शुरू हुई विनाशकारी घटनाओं की श्रृंखला अब बड़े मानवीय संकट में बदल चुकी है। 30 अगस्त की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में 734 और चीन के तिब्बत क्षेत्र में 16 लोगों की मौत हो चुकी है। दोनों क्षेत्रों में 3,044 लोग अब भी लापता हैं। नेपाल में अकेले 2,498 लोगों के लापता होने की सूचना है। 90 हजार से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। मलबे में दबे लोगों की तलाश, बचाव कार्य और नष्ट हो चुके रास्तों को फिर खोलने का काम जारी है। लेकिन इस त्रासदी को केवल 'कुदरत का कहर' कहकर आगे बढ़ जाना शायद इस हादसे से सबसे बड़ा अन्याय होगा।
पहाड़ टूटा तो पानी नहीं, मौत की दीवार उतरी- प्रारंभिक वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार, करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर और उसके नीचे की चट्टान का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आया। बर्फ, चट्टान और मलबे का यह हिमस्खलन नदी घाटी में पहुंचा और उसने पानी के प्रवाह को अस्थायी रूप से रोक दिया। इसके बाद बना अवरोध टूटा तो पानी और मलबे ने मिलकर ऐसी बाढ़ का रूप ले लिया, जिसने नीचे की बस्तियों को संभलने तक का अवसर नहीं दिया।
यही इस आपदा की सबसे भयावह विशेषता थी। यह ऐसी बाढ़ नहीं थी, जिसके आने की तैयारी के लिए घंटों का समय मिला हो। ऊंचे हिमालय में ऐसी घटनाओं में खतरे और तबाही के बीच का अंतर कई बार कुछ ही मिनटों का होता है। ऊपर से नीचे आते मलबे और पानी ने रास्ते में मौजूद हर कमजोर चीज को अपने साथ बहाया। सड़कें गईं, पुल गए, घर गए, बिजली परियोजनाएं प्रभावित हुईं और नदी किनारे मौजूद बस्तियों में रहने वालों को संभलने तक का समय नहीं मिला।
ग्लेशियर टूटा, मगर सवाल बहुत बड़े हैं-यहां एक फर्क समझना जरूरी है। इस आपदा का तत्काल कारण मानवीय निर्माण को बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। उपलब्ध विश्लेषण ग्लेशियर, चट्टान के ढहने और उसके बाद बनी विनाशकारी जल-मलबा धारा की ओर इशारा करते हैं। लेकिन इससे इंसान की जिम्मेदारी का सवाल खत्म नहीं होता। बल्कि सवाल और गंभीर हो जाता है-जब हमें मालूम है कि हिमालय तेजी से बदल रहा है, तब हमने उसके जोखिम वाले इलाकों में अपनी बस्तियां, सड़कें, परियोजनाएं और पर्यटन गतिविधियां कितनी समझदारी से बढ़ाई हैं?
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों का पीछे हटना और पर्माफ्रॉस्ट यानी जमी हुई मिट्टी और चट्टानों का कमजोर होना पर्वतीय ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। इस घटना में भी ग्लेशियर के लंबे समय से पीछे हटने और ऊंचाई पर असामान्य गर्मी की भूमिका की जांच की जा रही है। हालांकि, इस खास घटना में जलवायु परिवर्तन की सटीक भूमिका तय करने में समय लगेगा।यानी प्रकृति का ट्रिगर प्राकृतिक हो सकता है, लेकिन तबाही का पैमाना इस बात से तय होता है कि इंसान उस खतरे के सामने कितना तैयार और कितना असुरक्षित खड़ा है।
विकास जरूरी है, लेकिन पहाड़ की कीमत पर नहीं-हिमालयी देशों के सामने विकास की अपनी मजबूरियां हैं। सड़क चाहिए, बिजली चाहिए, पर्यटन चाहिए, रोजगार चाहिए। नेपाल जैसे देश के लिए जलविद्युत और पर्यटन अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर पहाड़ी ढलान निर्माण योग्य है? क्या हर नदी किनारा बस्ती के लिए सुरक्षित है? क्या हर सड़क के लिए पहाड़ काटा जा सकता है? क्या हर जलविद्युत परियोजना के लिए नदी की प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ उचित है?सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पर्यावरणीय चेतावनियों को विकास-विरोधी सोच कहकर खारिज करना अब भी उचित है?
वैज्ञानिकों ने यह भी रेखांकित किया है कि बाढ़ के मैदानों में बने घर और निर्माण नुकसान के प्रति बेहद संवेदनशील थे। बढ़ते पर्यटन और व्यापार के कारण अब ऐसे क्षेत्रों में पहले की तुलना में कहीं अधिक लोग मौजूद रहते हैं। इसलिए समस्या केवल पहाड़ के टूटने की नहीं है। समस्या यह भी है कि पहाड़ के टूटने के रास्ते में इंसान कहां खड़ा है।
एक आपदा खत्म नहीं हुई, दूसरी का डर सामने-नेपाल इस समय केवल बीती तबाही से नहीं जूझ रहा। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, भोटेकोशी नदी का जलस्तर फिर बढ़ रहा है और प्रभावित इलाकों में लोगों को सतर्क रहने को कहा गया है। चीन की ओर से भी बढ़े हुए जलप्रवाह की सूचना नेपाल को दी गई है। यानी जिन परिवारों ने अभी मलबे से अपने घरों के अवशेष निकाले भी नहीं हैं, उनके सामने फिर पानी का खतरा खड़ा है।
यह स्थिति बताती है कि हिमालयी आपदाएं अब एकल घटना नहीं रह गई हैं। एक ग्लेशियर टूटता है। मलबा नदी रोकता है। अस्थायी झील बनती है। झील टूटती है। बाढ़ नीचे जाती है। ढलान कटती है। नए भूस्खलन का खतरा पैदा होता है। और फिर वही पानी किसी दूसरे इलाके के लिए खतरा बन जाता है। एक आपदा दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है। यही संभावित 'कास्केडिंग हैजर्ड' यानी एक के बाद एक पैदा होने वाले खतरों की गंभीरता है।
हिमालय की त्रासदी का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं है-भोटेकोशी और त्रिशूली जैसी नदियों का जलतंत्र आगे चलकर भारत में नारायणी-गंडक प्रणाली से जुड़ता है। इसलिए नेपाल में अचानक बढ़े जलप्रवाह का असर भारत के सीमावर्ती और निचले इलाकों पर भी पड़ सकता है। बिहार में नेपाल और बिहार में जारी बारिश के बीच कई नदियों के बढ़ते जलस्तर को लेकर सतर्कता बढ़ाई गई है।
यह हिमालय का सबसे बड़ा सच है-राजनीतिक सीमाएं पहाड़ों को बांट सकती हैं, नदियों को नहीं। नेपाल में ग्लेशियर टूटे तो उसकी चिंता भारत को भी करनी होगी। उत्तराखंड में पहाड़ दरके तो उसका सबक हिमाचल को भी लेना होगा। हिमालय के एक हिस्से में जलवायु बदलती है तो उसका असर पूरे पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।
क्या हम आपदा से पहले जागेंगे?हर बड़ी त्रासदी के बाद एक ही कहानी दोहराई जाती है। मुआवजे की घोषणा। राहत पैकेज। हेलीकॉप्टर। जांच समिति। कुछ दिन तक बहस। फिर सब शांत। और उसके बाद उसी पहाड़ पर अगली परियोजना की नींव।नेपाल की त्रासदी हमें इस चक्र को तोड़ने का अवसर दे रही है। ग्लेशियरों की निगरानी बढ़ानी होगी। संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और संभावित भूस्खलन क्षेत्रों की लगातार उपग्रह और जमीनी निगरानी जरूरी है। शुरुआती चेतावनी प्रणाली को नदी घाटियों तक पहुंचाना होगा। बाढ़ के प्राकृतिक मैदानों में निर्माण पर कठोरता से विचार करना होगा।
पहाड़ी परियोजनाओं के लिए केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि वहन क्षमता और संचयी पर्यावरणीय जोखिम भी निर्णय का आधार होना चाहिए। और सबसे जरूरी, स्थानीय लोगों को केवल आपदा के बाद राहत पाने वाला समुदाय नहीं, बल्कि आपदा से पहले चेतावनी पाने वाला सबसे महत्वपूर्ण साझेदार बनाना होगा।
नेपाल की त्रासदी का खतरा भी सीमाहीन-प्रकृति बदला नहीं लेती। वह सिर्फ अपना संतुलन वापस मांगती है। हमने पहाड़ों को काटा तो उसने दरार दिखाई। हमने नदियों के किनारे निर्माण किया तो उसने अपना रास्ता याद दिलाया। हमने ग्लेशियरों को केवल दूर की बर्फ समझा तो उसने पिघलते हिमालय का खतरा हमारे दरवाजे तक पहुंचा दिया।
नेपाल में मारे गए लोग केवल आंकड़ा नहीं हैं। 3,000 से अधिक लापता लोग केवल एक संख्या नहीं हैं। वे किसी के पिता हैं, किसी की मां हैं, किसी के बच्चे हैं, किसी के घर की उम्मीद हैं। और इसीलिए यह सवाल नेपाल से बहुत आगे जाता है-क्या विकास का अर्थ पहाड़ को जीतना है या उसके साथ जीना सीखना?
सड़कें बनेंगी। सुरंगें बनेंगी। बिजली बनेगी। पर्यटन बढ़ेगा। शहर फैलेंगे। लेकिन अगर विकास की इस दौड़ में हमने हिमालय की सहनशक्ति को ही खत्म कर दिया तो एक दिन हमारी उपलब्धियों का हिसाब भी वही पहाड़ करेगा, जिसकी छाती पर हमने विकास की इबारत लिखी है।नेपाल का सैलाब सिर्फ तबाही की कहानी नहीं है। यह हिमालय की वह चेतावनी है, जिसे अगर अब भी नहीं पढ़ा गया तो अगली आपदा का सवाल 'कहां?' नहीं होगा-सवाल होगा, 'कितनी बड़ी?'
प्रकृति को हराने की नहीं, समझने की जरूरत है। क्योंकि हिमालय झुक सकता है, लेकिन उसकी उपेक्षा का हिसाब जरूर चुकता होता है।

सुरेश गांधी
(लेखक स्तंभकार हैं)