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Global Energy Crisis Deepens Amid War Tensions

युद्धोन्माद से गहराता वैश्विक ऊर्जा संकट

मध्य-पूर्व युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से भारत समेत कई देशों पर असर। महंगाई, आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर खतरा बढ़ा।


युद्धोन्माद से गहराता वैश्विक ऊर्जा संकट

राज कुमार सिंह

कहा जाता है कि जब रोम जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था। वैसा ही दृश्य हाल में अमेरिका में दिखा, जब मध्य पूर्व की जंग की आग में झुलसती दुनिया से बेपरवाह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप निवेशकों को संबोधित करने के बाद अपनी बालकनी में डांस कर रहे थे। समझौता वार्ता जारी होने के दावों के बीच भी ट्रंप द्वारा ईरान को धमकाना जारी है, तो इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जंग भी कमजोर तो हरगिज नहीं पड़ी। बदलते बयानों और दावों के पीछे का खेल तो ट्रंप ही बेहतर जानते होंगे, पर युद्ध जिस तरह और अधिक आक्रामक हो रहा है, वह वैश्विक स्थिरता और शांति, खासकर ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनौतियों के और दुष्कर होने का ही संकेत है।

उन चुनौतियों की तुलना अप्रत्याशित महामारी कोविड से करते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने बयान में देशवासियों से एकजुट होकर हालात का मुकाबला करने की बात कही। प्रधानमंत्री ने ‘टीम इंडिया’ की भावना से चुनौतियों का सामना करने की जरूरत बताई है। परस्पर कटुता की राजनीति के बीच भी वैसा हो पाए तो सुखद आश्चर्य होगा।भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों, खासकर तेल और गैस के लिए आयात पर ही ज्यादा निर्भर है। इसलिए संकट विकराल होना ही है। अब केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की जैसी संवेदनशीलता दिखाई है, वैसी इजराइल-अमेरिका और ईरान युद्ध शुरू होने के सप्ताहभर में ही घरेलू सिलेंडर 55 रुपए और कमर्शियल सिलेंडर 115 रुपए महंगा करते समय नहीं दिखी।

पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों पर भीड़ अफवाह-जनित आशंकाओं का भी परिणाम मान लें, तो रसोई गैस बुकिंग की अंतराल अवधि बढ़ाने, कमर्शियल गैस की आपूर्ति कम करने और हवाई किराए की अधिकतम सीमा हटाने जैसे सरकार के कई फैसले यही बता रहे हैं कि भारत ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ा है।निजी तेल कंपनी नियारा एनर्जी ने तो दाम बढ़ा भी दिए हैं। अनुभव बताता है कि सरकारी तेल कंपनियां भी मूल्य वृद्धि के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न होने का ही इंतजार कर रही हैं। एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के दावे राहत देते हैं, पर सवाल अनुत्तरित है कि उत्पादन बढ़ाने की क्षमता थी तो उसके लिए संकटकाल की प्रतीक्षा क्यों?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के बावजूद वहां से भारत के जहाजों का निकलना तथा ऊर्जा आपूर्ति स्रोतों का विस्तार राहतकारी है, लेकिन खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए कि इससे हम संभावित वैश्विक ऊर्जा संकट से बच जाएंगे।विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था वाले देश द्वारा कमजोर अर्थव्यवस्था वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका से तुलना कर अपनी पीठ थपथपाने से सकारात्मक संकेत नहीं जाता। हमें आत्ममुग्धता से उबरकर चुनौतियों से निपटने की तैयारियां करनी चाहिए।तेल और गैस आपूर्ति का संकट बहुआयामी है, जिसका असर छोटे उद्योगों से लेकर खाद्य सुरक्षा तक पर पड़ सकता है। मझोले और छोटे उद्योग बंद होने तथा परिणामस्वरूप प्रवासी श्रमिकों के पलायन की खबरें आने भी लगी हैं।

इससे नागरिकों का जीवनयापन तो दुश्वार हो ही जाएगा, हमारी अर्थव्यवस्था और विकास दर पर भी बेहद नकारात्मक असर पड़ेगा। आसन्न ऊर्जा संकट से अछूता तो कोई देश नहीं रह पाएगा, पर विकासशील देशों पर असर ज्यादा होगा।अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करने वाले भारत के लिए संकट की गंभीरता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए। आपूर्ति स्रोतों के विस्तार के जरिये जरूरत के मुताबिक आयात सुनिश्चित भी कर लें, तो सवाल है क्या डेढ़ गुनी या दो गुनी कीमत पर पेट्रोल-डीजल या रसोई गैस खरीदने की क्रय शक्ति हमारे नागरिकों में है?

डॉलर के मुकाबले हर रोज गिरता रुपया मुश्किलें बढ़ाएगा ही। ईरान और रूस से ही हमें डॉलर में भुगतान बिना कच्चे तेल के आयात की सुविधा मिलती रही है।ट्रंप के हर रोज बदलते बयानों और दावों के बावजूद मध्य पूर्व में जारी युद्ध से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें डेढ़ से दो गुनी वृद्धि के बीच झूल रही हैं। इस मूल्य वृद्धि का असर कई देशों में दिखने भी लगा है।पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि का महंगाई पर चौतरफा असर होता है। कोविड काल से ही 80 करोड़ लोगों को जीवनयापन के लिए पांच किलो खाद्यान्न मुफ्त देने वाला, बेरोजगारी और महंगाई का शिकार भारत यह मार कैसे झेल पाएगा?इस आसन्न संकट के लिए इजराइल, अमेरिका और ईरान के अलावा शायद ही कोई और जिम्मेदार हो, लेकिन इसके प्रभाव से कोई देश बच नहीं पाएगा।

इसीलिए जानकार इस संकट की तुलना 1973 और 1979 के ऐतिहासिक ऊर्जा संकट से कर रहे हैं। उन दोनों अभूतपूर्व ऊर्जा संकट के बीज भी मध्य पूर्व में ही बोए गए थे।छह अक्टूबर 1973 को मिस्र और सीरिया ने इजराइल पर हमला किया, जिसके बाद अमेरिका ने इजराइल को सैन्य सहायता दी। अरब-इजराइल युद्ध में इजराइली सेना को पुनः आपूर्ति करने तथा युद्धोत्तर शांति वार्ता में लाभ प्राप्त करने की अमेरिकी कवायद के प्रतिशोधस्वरूप पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ‘ओपेक’ के सदस्य अरब देशों ने अमेरिका के विरुद्ध प्रतिबंध लगा दिए।अक्टूबर 1973 से जनवरी 1974 तक चले उस तेल संकट के दौरान कच्चे तेल की कीमतें तीन से चार गुना तक बढ़ गई थीं, जिसका परिणाम ईंधन की कमी और आर्थिक मंदी के रूप में सामने आया था।

पश्चिमी देश सबसे ज्यादा प्रभावित हुए और उन्होंने ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की खोज पर ध्यान केंद्रित किया। दूसरा वैश्विक ऊर्जा संकट ईरान में इस्लामिक क्रांति के चलते 1979 में उत्पन्न हुआ था।ईरानी क्रांति के चलते तेल उत्पादन में कमी आई। हालांकि उसके कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति में मात्र चार प्रतिशत की ही कमी आई, लेकिन बाजार ने सालभर में कच्चे तेल की कीमतों में दोगुनी वृद्धि कर दी।1980 में ईरान-इराक युद्ध के चलते दोनों देशों के तेल उत्पादन में कमी आई, जिसका परिणाम वैश्विक आर्थिक मंदी के रूप में सामने आया। इसके बाद वेनेजुएला, नाइजीरिया और मैक्सिको जैसे तेल निर्यातक देशों ने अपना उत्पादन बढ़ाया तथा सोवियत संघ बड़ा तेल उत्पादक बनकर उभरा।

तब इन संकटों से निपटने के लिए कुछ अनूठे और कारगर उपाय अपनाए गए थे। इस बार भी कुछ देशों ने ऊर्जा खपत घटाने की कवायद शुरू की है।अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के क्रमबद्ध तरीके से 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने के फैसले से ऊर्जा संकट से निपटने में बड़ी मदद भले ही न मिले, लेकिन पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने के उसके सुझाव उपयोगी साबित हो सकते हैं।मसलन, यथासंभव वर्क फ्रॉम होम लागू किया जाए, निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल बढ़ाया जाए, कार पूलिंग को बढ़ावा दिया जाए, हाईवे पर गाड़ियों की रफ्तार 10 किलोमीटर प्रति घंटा घटाई जाए, और खाना पकाने में बिजली से चलने वाले उपकरणों का उपयोग बढ़ाया जाए।दरअसल, अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर भारत जैसे देश में इन उपायों को जीवनशैली और कार्य संस्कृति का हिस्सा बनाए जाने की जरूरत है।