जंतर-मंतर पर युवाओं द्वारा दी गई गालियों ने समाज के विभिन्न वर्गों में मतभेद उत्पन्न कर दिए हैं। इस विवाद में तुलसीदास के दोहे की प्रासंगिकता पर चर्चा की गई है।
इन दिनों गालियों को लेकर घमासान मचा हुआ है। जंतर-मंतर पर आंदोलनकारी युवक-युवतियों द्वारा दी गई अश्लील गालियों ने समाज के प्रबुद्ध वर्ग को दो हिस्सों में बाँट दिया है। एक पक्ष इसे नई पीढ़ी के आक्रोश की सहज अभिव्यक्ति मानकर उसका बचाव कर रहा है, जबकि दूसरा सार्वजनिक जीवन में इस प्रकार की भाषा को पूरी तरह अस्वीकार्य बता रहा है।
गालियाँ कोई नई बात नहीं हैं। वे लोकजीवन का हिस्सा रही हैं और संसार का शायद ही कोई समाज हो, जहाँ उनका चलन न हो। ऐसे में कुछ युवाओं को ही कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। दूसरी ओर, विरोध करने वालों का प्रश्न है कि जिन गालियों को हम अपने घरों में बोलने से भी बचते हैं, उन्हें सार्वजनिक मंच पर कैसे स्वीकार किया जा सकता है? विशेषकर वे गालियाँ, जो स्त्रियों के सम्मान और उनके यौन अंगों को लक्षित करती हैं, उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर कैसे उचित ठहराया जा सकता है?
यहीं से एक बड़ा अंतर्विरोध सामने आता है। जिस समाज में लोग सहज ही माँ-बहन की गालियाँ देते पाए जाते हैं, वहाँ उनका विरोध कितना सार्थक है? और दूसरी ओर, वे बुद्धिजीवी तथा स्त्रीवादी चिंतक, जो वर्षों से ऐसी गालियों को पुरुषसत्तात्मक मानसिकता का प्रतीक बताते रहे हैं, वे भी इस प्रसंग में उनका समर्थन करते दिखाई दिए। विरोध और समर्थन, दोनों पक्षों में अंतर्विरोध स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसे समय संत कवि तुलसीदास का एक दोहा याद आता है.
'अमिय गारि गारेउ गरल, गारि कीन्ह करतार।
प्रेम बैर की जननि युग, जानहिं बुध न गँवार॥'
अर्थात, विधाता ने मानो अमृत और विष दोनों को मिलाकर गाली की रचना की है। वही प्रेम की भी जननी बन सकती है और बैर की भी। इस रहस्य को बुद्धिमान समझते हैं, मूर्ख नहीं।तुलसीदास ने लोकजीवन के मनोविज्ञान को अद्भुत गहराई से समझा है। वे गाली पर कोई फ़तवा नहीं देते, बल्कि उसके प्रयोग की परिस्थिति और मनःस्थिति को महत्व देते हैं। वही शब्द मित्रों के बीच हास-परिहास में स्नेह का माध्यम बन जाते हैं और वही शत्रु के मुख से निकलकर विषबाण की तरह चुभते हैं। गाली का प्रभाव उसके शब्दों से अधिक उसकी मंशा और प्रसंग पर निर्भर करता है।
हम अपने आसपास ऐसे अनेक लोगों को देखते हैं, जो मित्रों के बीच गालियाँ भी प्रेमोपहार की तरह देते हैं और कोई बुरा नहीं मानता। वहीं वही शब्द यदि अपमानित करने या नीचा दिखाने के उद्देश्य से कहे जाएँ, तो विवाद और वैर का कारण बन जाते हैं। होली, विवाह या समधी-समधिन के हास्य-परिहास में कही जाने वाली गालियाँ सामान्यतः सहज मानी जाती हैं, किंतु दैनिक जीवन में किसी को अपमानित करने के लिए प्रयुक्त भाषा सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करती है।
जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जिस प्रकार की अश्लील गालियाँ दी गईं, उन्हें तुलसीदास के इस गाली-सूक्त की कसौटी पर कसकर देखें, तो स्पष्ट है कि वे प्रेम नहीं, घृणा और आक्रोश की अभिव्यक्ति थीं। वे ऐसे लोगों की भाषा थीं, जो अपने राजनीतिक विरोध को मर्यादा के भीतर व्यक्त करने के बजाय अश्लीलता के माध्यम से प्रकट कर रहे थे।
आज जो दो वर्ग दिखाई दे रहे हैं, उनके पीछे भी सामान्य मनोविज्ञान काम कर रहा है। जो लोग मोदी और उनकी सरकार के विरोध में हैं, वे इन गालियों को इसलिए हल्के में ले रहे हैं कि उनका लक्ष्य उनका राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। दूसरी ओर, जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे केवल अश्लीलता के कारण ही नहीं, बल्कि इसलिए भी कि यह अपमान उस व्यक्ति का है, जिसे वे देश का लोकप्रिय नेता मानते हैं और जिसके नेतृत्व में उनकी आस्था है।
वास्तव में कोई भी व्यक्ति स्वयं को या अपने प्रिय व्यक्ति को अपमानित होते हुए सहज भाव से स्वीकार नहीं करता। यही कारण है कि इस घटना पर व्यापक प्रतिक्रिया सामने आई। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, किंतु भाषा की मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक है। विचारों का संघर्ष यदि अश्लीलता में बदल जाए, तो वह लोकतांत्रिक संवाद नहीं रह जाता।
तुलसीदास का संकेत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गाली अपने आप में न अमृत है, न विष; उसका स्वरूप बोलने वाले की मंशा और सुनने वाले के साथ उसके संबंध से तय होता है। यही विवेक समाज को संवाद और वैमनस्य के बीच का अंतर समझाता है। इसलिए तुलसीदास का निष्कर्ष आज भी सार्थक प्रतीत होता है 'जानहिं बुध न गँवार।'

इंदुशेखर तत्पुरुष
(लेखक कवि व स्तंभकार हैं)