दिल्ली में छात्रों और पुलिस के बीच टकराव के चलते गंभीर विवाद उभरा। राहुल गाँधी और अन्य नेताओं ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया।
दिल्ली में छात्र आंदोलन के अंतिम चरण में उग्र भीड़ और पुलिस के टकराव ने एक गंभीर विवाद पैदा कर दिया। छात्रों और उमके समर्थकों के अलावा असामाजिक तत्वों अपराधियों पर पुलिस कार्रवाई में राहुल गाँधी और उनके गठजोड़ी नेता बर्बरता से लाठी गोली, हजारों के घायल होने के अनर्गलं आरोप संसद से सड़क तक लगा रहे हैं। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद देश के गृह मंत्री अमित शाह को पुलिस ज्यादती का दोषी बता इस्तीफा मांगने लगे। असली निशाना तो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। प्रतिपक्ष यह क्यों भूल जाता है कि यदि अगली बार पुलिस हिंसक भीड़ को संसद या विधान सभा में घुसने से रोकने के बजाय लाठी आंसू गैस, बंदूक को नीचे रख दे तो क्या स्थिति होगी? पुलिस अपनी रक्षा और सुविधाओं के लिए किसी राज्य में ही सड़क पर खड़ी हो जाए, तो नेताओं और जनता का क्या होगा? राहुल गांधी को उनके पालतू सलाहकार या अमेरिकन अंकल न जानते हों, लेकिन पुराने कांग्रेसी 1973 में कांग्रेस राज में प्रादेशिक पुलिस (पीएसी) द्वारा अपने अधिकार और सुविधाओं के लिए संघर्ष की जानकारी होगी। तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से गुहार लगा सेना बुलानी पड़ी थी। सेना की कार्रवाई में करीब 35 पुलिसकर्मी मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए थे। न केवल मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, राष्ट्रपति शासन लगाकर स्थिति पर नियंत्रण किया जा सका।
दिल्ली का रामलीला मैदान और जंतर-मंतर देश में विरोध और लोकतांत्रिक असहमति की आवाज उठाने का प्रमुख स्थल रहा है। अन्ना आंदोलन से लेकर किसानों, पहलवानों, छात्रों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के आंदोलनों तक यहां प्रदर्शन होते रहे हैं। इसलिए इनको लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। लेकिन हाल ही में अमेरिका से उतरी कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा छात्रों की परीक्षाओं में गड़बड़ियां रोकने की मांगों पर 20 जुलाई 2026 को के 'संसद चलो' प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर और नई दिल्ली क्षेत्र में पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच गंभीर टकराव हुआ। दिल्ली पुलिस के अनुसार इस हिंसा में 118 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे। बाद की रिपोटों में घायल पुलिसकर्मियों की संख्या 129 तक बताई गई। लगभग 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने और करीब 60 प्रदर्शनकारियों के घायल होने की भी रिपोर्ट आई।
फिर 31 जुलाई को घायल दिल्ली पुलिसकर्मियों के परिवारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। परिवारों के मुताबिक अग्रिम पंक्ति में तैनात जवानों को भीड़ ने घेरा, उन पर पत्थर फेंके और शारीरिक हमला किया। परिवारों ने कुछ पुलिसकर्मियों की गंभीर चोटों का भी उल्लेख किया। प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस द्वारा बल प्रयोग, लाठीचार्ज
और अन्य कार्रवाई को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। राहुल गाँधी एन्ड कंपनी के मैदान में कूदने पर विदेशों में बैठे मानव अधिकारों के ठेकेदारों की संस्थाओं ने भारतीय लोकतंत्र को बदनाम करने के साथ सीधे या गोपनीय ढंग से आग को और भड़काने के इंतजाम कर दिए। इन सबने ने 20 जुलाई की कार्रवाई पर अत्यधिक बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों से संबंधित चिंताएं उठाई। इसलिए लोकतंत्र में सवाल यह नहीं है कि 'पुलिस सही थी या प्रदर्शनकारी? घटना की सबसे बड़ी सीख यह है कि राजधानी के सबसे संवेदनशील प्रदर्शन क्षेत्र में भी पुलिसकर्मी यदि भीड़ के सीधे हमले का शिकार होते हैं तो यह केवल किसी एक जवान की समस्या नहीं है। यदि किसी पुलिसकर्मियों को हजारों लोगों की भीड़ नियंत्रित करनी है, तो उसके पास पर्याप्त अधिकार और साधन, जरुरत पड़ने पर रैपिड फोर्सेज का सहयोग और सरकार ही नहीं प्रतिपक्ष तथा समाज का विश्वास समर्थन होना चाहिए।
इसे संयोग ही कहा जाएगा कि हाल की घटना पर देश भर में हंगामे के बीच 2020 में साम्प्रदायिक उपद्रव के दौरान आम आदमी पार्टी के पार्षद की अगुआई में दिल्ली पुलिस को सहायता कर रहे केंद्रीय इंटेलिजेंस ब्यूरो के युवा अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या मामले में दिल्ली की अदालत का फैसला आया है। यह इस बहस को और गंभीर बना देता है। अदालत के फैसले में बताया गया है कि नेता ताहिर हुसैन के साथ चार अन्य अपराधियों ने बहुत क्रूरता के साथ अंकित शर्मा की हत्या कर शव नदी नाले में फेंक दिया। जबकि अंकित शर्मा घटना के समय निहत्थे थे। अदालत ने उनके शरीर पर 51 चोटों और सात घातक घावों का उल्लेख करते हुए इसे अत्यंत क्रूर हत्या बताया और आजीवन कारावास की सजा दी। जबकि अभियोजन पक्ष यानी पुलिस ने अदालत से मृत्युदंड की मांग की थी। यह फैसला केवल 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ा एक आपराधिक मामला नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न को भी सामने लाता है कि जब भीड़ कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों, सुरक्षा कर्मचारियों या खुफिया अधिकारियों को ही निशाना बनाने लगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करे?
के आंदोलन को छात्रों की समस्याओं मांगों और पुलिस के सम्मान, काम की परिस्थितियों, रहने की व्यवस्था, छुट्टी, संगठन बनाने के अधिकार और वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार से जुड़ी शिकायतों को ध्यान में रखकर सोचना चाहिए। मैं तब दिल्ली में हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी का संवाददाता के रूप में संसद और राजनीति कवर करता था। संसद में इस मुद्दे की गूंज देखीं सुनीं है। अब आबादी, अपेक्षाओं के साथ देश विदेश की भारत विरोधी ताकतों के इरादों एवं डिजिटल इंटरनेट से सही गलत सूचना अफवाह आग की तरह भड़कने के स्थिति समझना चाहिए 7मार्च 1973 में अधीनस्थ पुलिसकर्मियों के बीच संगठनात्मक गतिविधियां तेज हुई। अप्रैल में भी अनुशासन से जुड़े विरोध के संकेत मिले और मई आते-आते असंतोष खुली चुनौती में बदलने लगा। लखनऊ विश्वविद्यालय विस्फोट का केंद्र बना। विश्वविद्यालय में परीक्षाओं के दौरान पीएसी की तैनाती को लेकर छात्रों में भी असंतोष था। मई 1973 में पीएसी के कुछ असंतुष्ट जवानों और छात्रों के आंदोलन का आपस में संपर्क हो गया। देखते-देखते 'पीएसी छात्र एकता' के नारे लगने लगे। स्थिति तब खतरनाक हुई जब पीएसी के कुछ जवानों ने छात्रों के साथ मिलकर विरोध में भाग लिया और विश्वविद्यालय परिसर में हिंसा तथा आगजनी होने लगी। विश्वविद्यालय की कई इमारतों को नुकसान पहुंचा। पुलिस असंतोष विद्रोह के रूप में दबा, जवानों पर मुकदमे चले, कई मारे गए, सैकड़ों गिरफ्तार और बर्खास्त हुए, यह पुलिस असंतोष, छात्र आंदोलन, प्रशासनिक विफलता, हथियारबंद विद्रोह, सेना के हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन इन सभी का एक साथ विस्फोट था।
पिछले करीब 20 वर्षों में पुलिस और सुरक्षा बलों को प्रदर्शन, दंगों, सांप्रदायिक हिंसा और अन्य भीड़ की हिंसा के दौरान अनेक बार निशाना बनाया गया दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद दिल्ली में हुए विशाल प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव हुआ। कांस्टेबल सुभाष तोमर गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। दिसंबर 2018 उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए बेहद गंभीर रहा। बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी गई। यह घटना भीड़ की हिंसा और कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती थी। नवंबर 2019 में तीस हजारी अदालत परिसर में पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक टकराव के बाद दिल्ली पुलिस के लगभग 2,000 पुलिसकर्मी और उनके परिवारजन पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के लिए पहुंचे। पुलिस बल के भीतर बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्ति थी। 2020 में कोरोना महामारी में लॉकडाउन के लॉकडाउन लागू कराने के दौरान पुलिसकर्मियों पर कई स्थानों पर हमले हुए। । इसलिए सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था और भारतीय समाज को अन्य देशों में होने वाले आन्दोलनों और लोकतान्त्रिक अधिकारों के नाम पर अनियंत्रित आन्दोलनों उपद्रवों को समय पर रोकने के प्रयास करने चाहिए।
लोकतंत्र में सवाल यह न है कि 'पुलिस सही थी या प्रदर्शनकारी? घटना की सबसे बड़ी सीख यह है कि राजधानी के सबसे संवेदनशील प्रदर्शन क्षेत्र में भी पुलिसकर्मी यदि भीड़ के सीधे हमले का शिकार होते हैं तो यह केवल किसी एक जवान की समस्या नहीं है। यदि किसी पुलिसकर्मियों को हजारों लोगों की भीड़ नियंत्रित करनी है, तो उसके पास पर्याप्त अधिकार और साधन, जरुरत पड़ने पर रैपिड फोर्सेज का सहयोग और सरकार ही नहीं प्रतिपक्ष तथा समाज का विश्वास समर्थन होना चाहिए।

आलोक मेहता
(लेखक पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ संपादक हैं)