वैश्विक सामाजिक एवं आर्थिक परिदृश्य के बदले स्वरुप में आज भारत को स्थापित करने के लिए विभिन्न पहलुओं पर काम करना होगा। भारत विविधताओं से भरा देश है. जहाँ बिभिन्न धर्म, संप्रदाय, भाषा के लोग निवास करते है। वही राष्ट्रीय एकता, रोजगार एवं आर्थिक विकास अतयंत महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे समय में जब विद्यार्थी को अपने घर से बाहर आना ही पड़ता है, चाहे वो गांव, जिला, शहर, प्रदेश ही क्यों न हो। इस बाहर आने के कई कारण हो सकते हैं जिनमे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक भी प्रमुख है। सामाजिक समरसता, व्यवसाय, पर्यटन, रोजगार एवं विभिन्न संस्कृतियों के साथ समन्वय करते हुए अपने को सफल बनाने के लिए संवाद एवं सम्बंधित भाषा की जानकारी सफलता का मापदंड निर्धारित करती है।
यह वास्तविकता है की विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में सम्वाद करने में सबसे सहज महसूस करता है। भारत में शिक्षा के क्षेत्र में इसका ध्यान पूर्व में भी रखा गया था, वही राष्ट्रिय शिक्षा निति २०२० में भी इसे प्रमुखता से लागु किया गया है यही कारण है की प्रत्येक छात्र को स्कूली शिक्षा में सर्वप्रमुख्ता उसकी मातृभाषा को दी जाती है वहीं क्षेत्रीय भाषा या राष्ट्रिय भाषा हिंदी के साथ अन्य भाषा की जानकारी bhi होनी चाहिए इस त्रिभाषा फॉर्मूला १९६४.१९६८, एवं २०२० की शिक्षा नीतियों व आयोगों के माध्यम से आम नागरिको को बताया गया है। भारत को एक सूत्र में पिरोने एवं भाषाई विविधता को संरक्षित करते हुए एक भारत श्रेष्ठ भारत की संकल्पना को साकार बनाने व छात्रों में संज्ञानात्मक विकास हेतु त्रिभाषा फॉर्मूला कारगर सिद्ध होगा, यही नहीं सामाजिक एवं आर्थिक गतिशीलता भी आज समय की जरूरत है। यात्रा एवं पर्यटन में केवल एक भाषा की जानकारी होने से चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए अपनी मातृभाषा के साथ दो अन्य भाषाओ जिनमे राष्ट्रिय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में बोली जाने वाली भाषाओ की जानकारी चनौतियों को काफी सीमा तक दर यही कारण है की अधिकांश महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को एक अन्य देशी/विदेशी भाषा को सिखने हेतु प्रेरित किया जाता है। विशेष रूप से ऐसे विश्वविद्यालय जहाँ केरल, तमिल, आंध्रा, कर्नाटका से लेकर सुदूर उत्तरपूर्व के विद्यार्थी एक ही छत के नीचे विद्या अर्जन करते है।
शिक्षकों को भी इस क्रॉस कल्चर (अंतर संस्कृति) को समझते हुए त्रिभाषी फॉर्मूला पर कार्य करना होगा। वहीं विद्यार्थियों को भी अपने आपको बदलते राष्ट्रिय एवं वैश्विक परिवेश के अनुरूप ढ़ालना होगा, केवल भाषा ही नहीं अपितु संस्कृतियों की समझ विकसित करनी होगी, बहुभाषी होने से आत्मविशवास और बेहतर संवाद के साथ आपके व्यबहार के सकारात्मक परिणाम भी आते है जो समस्या समाधान का विकास भी करती है।
भाषाई विकास एक ओर कैरियर, व्यापार, यात्रा एवं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विद्यार्थी की सफलता का निर्धारण करती है वहीं दूसरी ओर कैरियर ग्रोथ में भी सहायक सिद्ध होती है।
विद्यार्थी अपने बायोडाटा में अन्य भाषाओं की जानकारी देकर अपने चयनित होने की सम्भावनाओ को बढ़ा सकते है। एक शिक्षक के रूप में मैंने स्वयं भी इसे महसूस किया जब कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आँध्रप्रदेश बंगाल, ओडिशा, मणिपुर प्रवास के दौरान स्थानीय भाषा में सम्वाद कर लोगो का अपनापन एवं स्थानीय शिक्षिकों से स्रेह प्राप्त किया। नौकरी हेतु साक्षात्कार पैनल में भी उन अभियर्थियों को चयन में वरीयता दी जाती है, जिन्हे अपनी मातृभाषा के अलावा अन्य भाषाओ का भी ज्ञान होता है। अतः उपरोक्त विश्लेषण यह उचित प्रतीत होता है कि लिपि निर्धारकों, विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने हेतू एक उचित वातावरण तैयार कर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को प्रमुखता दी जानी चाहिए ।
आज के तकनिकी विकास के युग में घर बैठ कर बिभिन्न भाषाओं को एप्स के माध्यम से किया जा सकता है। महाविद्यालओं एवं विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की पेयरिंग/गठबंधन हिंदी/अहिंदी विद्यार्थियों के साथ एव मेन्टरिंग (भाषाविद के द्वारा) की जा सकती है। स्किल कोर्स के साथ वहुभाषा का समावेश कर शिक्षा को और भी ज्यादा प्रभावी वनाया जा सकता है।

लेखक वरिष्ठ प्रोफेसर (डॉ.) संदीप कुलश्रेष्ठ हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत है. पूर्व में भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान (भारत सरकार) के निदेशक रहे है।