अमेरिकी राजदूत के कश्मीर पर बयान और ट्रम्प की भारतीय चुनावी प्रक्रिया की प्रशंसा से भारत-अमेरिका संबंधों में व्यावहारिक सहयोग की दिशा में बदलाव के संकेत मिलते हैं।
इस सप्ताह भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर द्वारा जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बताए जाने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत की चुनावी प्रक्रिया की सार्वजनिक प्रशंसा ने भारत-अमेरिका संबंधों में एक उल्लेखनीय पुनर्संतुलन के संकेत दिए हैं। ये घटनाक्रम ऐसे समय सामने आए हैं, जब दोनों देशों के बीच शुल्क, रूस से भारत की तेल खरीद, भारतीय व्यापार नीतियों और भारत-पाकिस्तान तनाव को लेकर वाशिंगटन के रुख से राजनयिक असहजता और कड़वाहट का दौर रहा है।
भारत ने लगातार स्पष्ट किया है कि कश्मीर के मामले में तीसरे पक्ष की कोई भूमिका स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में गोर का बयान अमेरिकी नीति में किसी औपचारिक बदलाव का संकेत भले न हो, लेकिन उसका समय और राजनीतिक संदर्भ इसे महत्वपूर्ण बनाते हैं। ट्रम्प के साथ गोर की निकटता और उनकी दक्षिण तथा मध्य एशिया संबंधी भूमिका इस टिप्पणी को और अधिक राजनीतिक महत्व देती है। चुनावी प्रक्रिया पर ट्रम्प की प्रशंसा के साथ इसे देखा जाए, तो लगता है कि अमेरिका भारत के प्रति टकरावपूर्ण रुख से हटकर अधिक व्यावहारिक और रणनीतिक सहयोग की दिशा में बढ़ रहा है।
कश्मीर पर सर्जियो गोर की टिप्पणी
जम्मू-कश्मीर की अपनी पहली यात्रा के दौरान अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इसे ‘भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा’ बताया। इस शब्दावली ने तत्काल ध्यान आकर्षित किया, क्योंकि अमेरिका लंबे समय से कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच संवेदनशील द्विपक्षीय विषय के रूप में देखता रहा है। पाकिस्तान ने गोर के बयान को अमेरिका की स्थापित स्थिति से अलग बताते हुए खारिज किया और दोनों देशों के बीच संवाद से समाधान की बात दोहराई।भारत के लिए इस बयान का प्रतीकात्मक महत्व अधिक है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और संप्रभु हिस्सा है तथा भारत इस विषय को मुख्यतः सीमा पार आतंकवाद और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जोड़कर देखता है। गोर की टिप्पणी में मध्यस्थता या तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की भाषा नहीं थी। इसलिए इसे भारत की संवैधानिक और क्षेत्रीय स्थिति की एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वीकृति के रूप में देखा गया।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि गोर ने कश्मीर पर अमेरिका की पूरी कूटनीतिक या कानूनी नीति में बदलाव की घोषणा नहीं की। राजनयिक बयानों में राजनीतिक संकेत और रणनीतिक अस्पष्टता साथ-साथ चलते हैं। इसलिए इस टिप्पणी को औपचारिक अमेरिकी नीति परिवर्तन के बजाय एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत मानना अधिक उचित होगा।
ट्रम्प और भारतीय चुनावों की प्रशंसा
भारत के प्रति अमेरिकी रुख में बदलाव का दूसरा संकेत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारतीय चुनावी प्रक्रिया की प्रशंसा में दिखाई देता है। भारत के विशाल आम चुनाव का उल्लेख करते हुए ट्रम्प ने मतदाता पहचान और चुनावी प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं की सराहना की। उन्होंने अपने घरेलू राजनीतिक तर्क को मजबूत करने के लिए भारत को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया और अमेरिकी चुनावों में मतदाता पहचान तथा नागरिकता के प्रमाण से जुड़ी कड़ी व्यवस्थाओं की आवश्यकता पर जोर दिया।ट्रम्प की टिप्पणियां मुख्यतः अमेरिकी घरेलू राजनीति से जुड़ी थीं, लेकिन उनका अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी है। भारत को पश्चिमी राजनीतिक और मीडिया विमर्श के कुछ हिस्सों में अक्सर लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर सवालों के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इसके विपरीत, ट्रम्प ने भारत को करोड़ों मतदाताओं वाले विशाल और प्रशासनिक रूप से सक्षम लोकतंत्र के रूप में सामने रखा।
इस प्रशंसा का राजनीतिक अर्थ इसलिए दोहरा है। घरेलू स्तर पर ट्रम्प ने भारत के उदाहरण का उपयोग चुनाव सुधार के अपने तर्क के लिए किया, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने भारत की लोकतांत्रिक क्षमता को सार्वजनिक मान्यता दी। यह उस दौर के बाद महत्वपूर्ण संकेत है, जब दोनों देशों के संबंधों में राजनीतिक अविश्वास बढ़ा था।
क्या वाशिंगटन सचमुच यू-टर्न लेगा?
भारत और अमेरिका के संबंधों में तनाव उस समय बढ़ा, जब ट्रम्प प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाया और अपनी आर्थिक नीति को भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद से भी जोड़ा। शुल्कों का बोझ बढ़ने से यह धारणा बनी कि दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी आर्थिक सौदेबाजी के दबाव में आ रही है। बाद में शुल्कों में कमी और व्यापार ढांचे की दिशा में आगे बढ़ने से स्पष्ट हुआ कि दोनों देश संबंधों को और बिगड़ने से रोकना चाहते हैं।अमेरिका के लिए भारत हिंद-प्रशांत, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण, समुद्री सुरक्षा और चीन के बढ़ते प्रभाव से निपटने में महत्वपूर्ण भागीदार है। दूसरी ओर, भारत को अमेरिकी प्रौद्योगिकी, निवेश, रक्षा सहयोग, ऊर्जा साझेदारी और उन्नत विनिर्माण नेटवर्क की आवश्यकता है। दोनों देशों के हितों का यह परस्पर जुड़ाव संबंधों को केवल व्यापारिक विवादों तक सीमित नहीं रहने देता।
कश्मीर और चुनावों से जुड़े नए संकेत इसी व्यापक रणनीतिक आवश्यकता के अनुरूप दिखाई देते हैं। अमेरिका भारत के साथ अपने सभी मतभेद समाप्त किए बिना राजनीतिक विश्वास बहाल करने का प्रयास कर सकता है। इसलिए इसे पूर्ण यू-टर्न की बजाय व्यावहारिक पुनर्संतुलन कहना अधिक उचित होगा।
रणनीतिक साझेदारी में मतभेद भी रहेंगे
अमेरिका अपनी व्यापारिक चिंताओं और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर असहमतियों को पूरी तरह छोड़ने वाला नहीं है। इसी तरह, भारत रूस, क्षेत्रीय संघर्षों और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था जैसे मुद्दों पर अमेरिकी दृष्टिकोण के साथ स्वतः नहीं चलेगा। दोनों देशों के बीच सहयोग और मतभेद साथ-साथ चलते रहेंगे। यही इस संबंध की वास्तविक प्रकृति भी है।भारत और अमेरिका के बीच संबंध अब केवल मित्रता या विरोध के पारंपरिक खांचों में नहीं देखे जा सकते। यह एक ऐसी साझेदारी है, जिसमें दोनों देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए साझा क्षेत्रों में सहयोग करते हैं।
कश्मीर पर गोर की टिप्पणी और भारतीय चुनावों पर ट्रम्प की प्रशंसा को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। दोनों संकेत मिलकर बताते हैं कि अमेरिका भारत को केवल कठिन व्यापारिक भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और भू-राजनीतिक रूप से अपरिहार्य साझेदार के रूप में देख रहा है।
टकराव से संतुलित सहयोग की ओर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भारत-अमेरिका संबंध टकराव से संतुलित सहयोग की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। इसका अर्थ न तो बिना शर्त मित्रता है और न ही पुराने मतभेदों की वापसी। यह एक व्यावहारिक और लेन-देन आधारित रणनीतिक साझेदारी होगी, जिसमें दोनों देश अपने हितों के अनुसार सहयोग और असहमति, दोनों का रास्ता अपनाएंगे।हिंद-प्रशांत, चीन, प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा और आपूर्ति-श्रृंखलाओं जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की साझा जरूरतें बढ़ रही हैं। ऐसे में आर्थिक विवादों और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद रणनीतिक सहयोग को बनाए रखना दोनों के हित में है।
सर्जियो गोर का कश्मीर संबंधी बयान इसी बदलते समीकरण का प्रतीकात्मक संकेत है। ट्रम्प की भारतीय चुनावी प्रक्रिया की प्रशंसा इस संकेत को दूसरा आयाम देती है। इन दोनों घटनाक्रमों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वाशिंगटन भारत के साथ संबंधों को नए व्यावहारिक संतुलन में ढालने की कोशिश कर रहा है जहां मतभेद बने रहेंगे, लेकिन साझा रणनीतिक हित उन्हें संबंधों पर हावी नहीं होने देंगे।

प्रो. अंशु जोशी
(लेखिका जेएनयू में प्राध्यापिका हैं)