असम में आई बाढ़ से कई परिवार प्रभावित हुए। इन प्रभावित परिवारों तक तक राहत सामग्री पहुंचाने के साथ घर, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका बहाल करने का संघ का अभियान जारी रहा।
बाढ़ में पानी घर तक आता है तो उसका असर घर की दीवारों से कहीं आगे तक जाता है। फसल बर्बाद होती है, रोजी-रोटी प्रभावित होती है, बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है। इसके बाद जब पानी उतरता है, तब जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की एक नई चुनौती शुरू होती है।
असम में इसी चुनौती के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों के स्वयंसेवक राहत के साथ पुनर्स्थापन और पुनर्वास के काम में जुटे हुए हैं। यह कहानी सिर्फ बाढ़ में पहुंचाई गई मदद की नहीं है, बल्कि मदद के बाद भी प्रभावित परिवारों के साथ खड़े रहने की है।
मुश्किल समय में संघ का साथ
असम के शिवसागर, चराइदेव, जोरहाट और गोलाघाट समेत बाढ़ प्रभावित इलाकों में स्थिति गंभीर रही। 818 गांव, 80 हजार 650 परिवार और करीब 4 लाख 66 हजार लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। ऐसे वक्त में पहली जरूरत तत्काल राहत की थी। लेकिन इस अभियान की शुरुआत सिर्फ राहत सामग्री बांटने से नहीं हुई। स्वयंसेवकों ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया और तत्काल राहत के साथ आगे की पुनर्वास जरूरतों का भी आकलन किया।
इसके बाद प्रभावित परिवारों तक भोजन सामग्री, पेयजल, कपड़े, दवाइयां, बिस्तर, बर्तन और घरेलू जरूरत का सामान पहुंचाया गया। लेकिन बाढ़ के बाद समस्या सिर्फ भूख की नहीं थी। पानी उतरने के साथ बीमारी और संक्रमण का खतरा भी सामने था। इसलिए स्वच्छता को भी राहत अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया। ब्लीचिंग पाउडर, फिनाइल, क्लोरीन टैबलेट, मच्छरदानी और दूसरी स्वच्छता सामग्री उपलब्ध कराई गई।
शिवसागर में लंबी यात्रा के बाद पहुंची राहत
इस सेवा अभियान की एक तस्वीर शिवसागर में भी दिखाई देती है। लंबी यात्रा कर राहत सामग्री पहुंचाई गई। 200 राशन पैकेट, पानी की 100 कार्टन बोतलें और 300 चना-भुजिया पैकेट वितरित किए गए। इसके बाद 324 परिवारों को ब्लीचिंग पाउडर और फिनाइल पहुंचाया गया। हालांकि रास्ते मुश्किल थे, लेकिन राहत पहुंचाने का सिलसिला नहीं रुका।
राहत के बाद शुरू हुआ पुनर्स्थापन का काम
बाढ़ में घर डूबने के बाद सिर्फ राशन नहीं चाहिए होता। घर फिर से खड़ा करना होता है। बच्चे को फिर स्कूल भेजना होता है और किसान को फिर अपने खेत तक लौटना होता है। यहीं से राहत की कहानी पुनर्स्थापन की कहानी बनने लगती है। प्रभावित इलाकों में घरों की सफाई, स्कूलों और नामघरों में श्रमदान तथा सार्वजनिक स्थानों की सफाई एवं पुनर्स्थापन का काम किया गया। नेपालीखुटा गांव में अस्थायी आवास और गृह निर्माण का काम हुआ। बहुबर नामघर में सफाई की गई। शिमलुगुड़ी क्षेत्र में स्कूल, वृद्धाश्रम और दूसरे स्थानों पर श्रमदान किया गया।
किसानों की आजीविका बहाल करने की कोशिश
बाढ़ के बाद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक आजीविका की भी थी। किसान के लिए खेत सिर्फ जमीन नहीं होता। वही उसकी आय है और वही उसके परिवार का सहारा है। इसीलिए भारतीय किसान संघ की ओर से करीब 5 हजार परिवार, 600 से ज्यादा लाभान्वित किसानों और लगभग 1,500 बीघा कृषि क्षेत्र में पुनः रोपण कराया गया। किसानों को बीज और धान की पौध देने के साथ पशुधन के लिए चारा उपलब्ध कराने को भी प्राथमिकता में रखा गया।
बाढ़ से प्रभावित बच्चों की पढ़ाई का भी रखा ध्यान
बाढ़ खेतों तक पहुंची तो बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई। इसलिए प्रभावित छात्रों के लिए कॉपियां, पेन, ज्योमेट्री बॉक्स और दूसरी शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने का काम किया गया। इस मदद को 5 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों तक पहुंचाया गया।
अलग-अलग संगठनों ने संभाली अलग-अलग जिम्मेदारी
इस पूरे अभियान में संघ से जुड़े अलग-अलग संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्र में योगदान दिया। सेवा भारती पूर्वांचल, आयुर्वेदिक मेडिकल ऑर्गनाइजेशन, ABVP, भारतीय किसान संघ, विद्या भारती, भारत विकास परिषद, संस्कृत भारती और दूसरे संगठनों ने राहत, चिकित्सा, स्वच्छता, श्रमदान, शिक्षा, कृषि सहायता और पुनर्वास के कामों में भाग लिया। कहीं राहत सामग्री पहुंची, कहीं चिकित्सा शिविर लगा, कहीं सफाई हुई, कहीं खेतों में दोबारा रोपण की तैयारी हुई और कहीं बच्चों की पढ़ाई के लिए जरूरी सामग्री पहुंची। काम अलग-अलग थे, लेकिन दिशा एक थी—प्रभावित परिवारों को फिर सामान्य जीवन की ओर लौटने में मदद करना।
पानी उतरने के बाद भी जारी रही सेवा
असम में बाढ़ के बीच शुरू हुई यह सेवा यात्रा राहत सामग्री से आगे बढ़कर घर, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका की बहाली तक पहुंचने की कोशिश है। किसी आपदा में मदद पहुंचाना जरूरी है, लेकिन किसी परिवार को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करने में समय भी लगता है और साथ भी।
आपदा में सरकारें मदद करती हैं, संस्थाएं काम करती हैं, लेकिन लोगों को फिर आत्मविश्वास से खड़ा करने वाले स्वयंसेवक होते हैं। यानी कहानी सिर्फ उस वक्त की नहीं है, जब बाढ़ आई। कहानी उस वक्त की भी है, जब पानी उतरने के बाद लोगों को अपनी जिंदगी फिर से शुरू करनी थी। राष्ट्रसेवा और समाजसेवा की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों की यह मुहिम राहत से पुनर्वास तक पहुंचने की कोशिश को सामने रखती है।