अशोक सिंघल की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके जीवन और आदर्शों को याद किया गया। उन्होंने समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
एक बहुत सुंदर सुभाषित है, 'वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।' इसका मतलब है कि पेड़ कभी अपने फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल अपने पास नहीं रखती। इसी तरह, संत स्वभाव के लोग भी स्वयं को प्राथमिकता न देते हुए सदैव दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं और अपना जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं। सदियों से हमारे ऋषियों ने हमें यही सिखाया है कि मानवता के कल्याण के लिए समर्पित जीवन का महत्व व्यक्तिगत उपलब्धियों से कहीं अधिक होता है। श्रद्धेय अशोक सिंघल जी का जीवन इस भावना का पुण्य उदाहरण है।
27 सितंबर से हम स्वर्गीय अशोक सिंघल जी का जन्मशताब्दी वर्ष मनाने जा रहे हैं। यह एक महान विभूति के सम्मान का सुअवसर है। उन्होंने आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण और दशकों तक समर्पित भाव से समाज एवं संगठन के कार्यों को आगे बढ़ाया।यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मुझे अशोक जी के साथ लंबे समय तक कार्य करने, उनसे सीखने, संवाद करने और उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला। मुझे 1981 का एक प्रसंग याद आता है। उस समय मैं एक युवा कार्यकर्ता के तौर पर संगठन की जिम्मेदारियां निभा रहा था। तब मुझे अशोक जी का हाथ से लिखा एक पत्र मिला। उसमें उन्होंने आने वाले एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मुझे कुछ जिम्मेदारियां सौंपी थीं। उस समय अशोक सिंघल जी से पत्र पाना मेरे लिए बहुत विशेष और यादगार क्षण बन गया था।
मैंने उन्हें कई दशकों तक दिन-रात काम करते देखा। वे देश के दूर-दराज के क्षेत्रों की लंबी और कई बार कठिन यात्राएं किया करते थे। गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में जाना उन्हें विशेष रूप से प्रिय था। वे लगातार इस पर चिंतन करते थे कि समाज के वंचित और अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के लिए और क्या किया जा सकता है। जब भी देश में कहीं प्राकृतिक आपदा आती, अशोक सिंघल जी प्रभावित लोगों की सहायता के लिए स्वयं पहुंचते या कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन देते। वर्ष 2001 में कच्छ में आए भूकंप के बाद उनके साथ का मेरा अनुभव अविस्मरणीय है।अशोक जी अत्यंत प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार से थे, लेकिन बहुत कम उम्र से ही उनका झुकाव सेवा और राष्ट्रकार्य की ओर था। प्रयागराज में पले-बढ़े अशोक जी कई घंटे संगम के तट पर बैठा करते थे। नदी के प्रति उनका स्वाभाविक आकर्षण था। वहां आने वाले साधु-संतों और श्रद्धालुओं से उनकी आत्मीयता ने भारत के सांस्कृतिक लोकाचार की उनकी समझ को और समृद्ध किया। वे चाहते थे कि भारत का पुनरुत्थान हो और मां भारती की संतान गौरवशाली उपलब्धियां हासिल करें। दूसरों के लिए जीने की यही ललक उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ले आई। उन्हें जो भी जिम्मेदारी मिली, उसे उन्होंने पूरे उत्साह, अनुशासन और कर्तव्यभाव से निभाया।
श्री अशोक सिंघल जी ने अपने निरंतर प्रयास और अथक परिश्रम से अनेक संस्थाओं और आंदोलनों को मजबूत किया। अपनी ओजस्वी वाणी और अभिव्यक्ति की अद्भुत शैली से वे पूरी सभा को मंत्रमुग्ध कर देते थे। अपने साथी कार्यकर्ताओं के प्रति वे अत्यधिक स्नेह रखते थे। जो भी उनके संपर्क में आता, वह उनकी सादगी से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। संत समाज के साथ उनके संबंध अत्यंत प्रगाढ़ थे और देशभर के साधु-संत उनके परामर्श को महत्व देते थे।मेरी स्मृति में ऐसी दो घटनाएं हैं, जिनसे उनके विराट व्यक्तित्व और संगठनात्मक कौशल को समझा जा सकता है। पहली घटना 1993 की है, जब विश्व हिंदू परिषद ने स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने पर अमेरिका में एक सम्मेलन आयोजित किया था। विदेश में इतने बड़े सम्मेलन की योजना बनाना और विभिन्न समूहों को एक मंच पर लाना अशोक जी के अद्वितीय संगठनात्मक कौशल का परिचायक था।
दूसरी घटना वर्ष 2000 की है, जब त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में विश्व हिंदू सम्मेलन हुआ। मैं भी वहां था। मैंने प्रत्यक्ष देखा कि अशोक सिंघल जी की उपस्थिति ने प्रतिनिधियों में कितना उत्साह भर दिया था। मेरे संबोधन के बाद उन्होंने जिस तरह मेरी सराहना की, वह मेरे लिए भावुक कर देने वाला अनुभव था। उनके प्रोत्साहन में हर कार्यकर्ता को नई ऊर्जा देने की अद्भुत क्षमता थी।राम जन्मभूमि आंदोलन में श्री अशोक सिंघल जी की ऐतिहासिक भूमिका का स्मरण किए बिना उनका कोई भी उल्लेख अधूरा है। वर्ष 1991 की बोट क्लब रैली में दिया गया उनका ओजस्वी संबोधन आज भी स्मरणीय है। आंदोलन के दौरान घायल अवस्था में उनकी तस्वीर भी लोगों की स्मृतियों में अंकित है। आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर है, तो इसके पीछे अशोक जी जैसी विभूतियों का निस्वार्थ समर्पण भी है, जिन्होंने इस कार्य के लिए स्वयं को पूरी तरह खपा दिया। यदि आज अशोक जी हमारे बीच होते तो अयोध्या में राम मंदिर को देखकर वे निश्चित ही अत्यंत भावुक और प्रसन्न होते।
स्वर्गीय अशोक सिंघल जी के विचारों में सामाजिक समरसता और भाईचारे का विशेष स्थान था। वे स्पष्ट रूप से मानते थे कि समाज में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति समान गरिमा एवं सम्मान का अधिकारी है। यही भावना उनके उन प्रयासों में भी दिखाई देती थी, जिनमें उन्होंने समाज के वंचित वर्गों की भागीदारी को महत्व दिया। अयोध्या में राम मंदिर की पहली ईंट रखने के लिए बिहार के वंचित वर्ग से आने वाले श्री कामेश्वर चौपाल जी को आगे करना और काशी में डोम राजा को सम्मानित करना इसी सामाजिक समरसता की भावना को प्रकट करता है।राष्ट्र-निर्माण के साथ ही श्री अशोक सिंघल जी के दो प्रिय क्षेत्र थे शिक्षा, विशेषकर वैदिक शिक्षा, और संगीत। वाराणसी ने उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बीएचयू से शिक्षा प्राप्त की और मेधावी छात्र के रूप में अपनी पहचान बनाई। वे एकल विद्यालय की पहल से भी गहराई से जुड़े रहे, जिसने दूर-दराज के गांवों और जनजातीय क्षेत्रों तक शिक्षा पहुंचाने का कार्य किया। वे गहरे अध्येता और उत्साही पाठक थे तथा युवा कार्यकर्ताओं को भी पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।
अशोक जी को निकट से जानने वालों को पता है कि वे कितना सुंदर गाते थे। नागपुर की बैठकों में वे 'एकल गीत' गाया करते थे। उनका गायन पूरी बैठक में नई ऊर्जा भर देता था। वर्ष 2015 में उनके 90वें जन्मदिवस समारोह का एक वीडियो भी खूब चर्चित हुआ था, जिसमें उन्होंने 'हे मातृभूमि मेरी, हे पितृभूमि मेरी' गाया था।स्वर्गीय अशोक सिंघल जी ने अपने जीवन में हर क्षण इस महान राष्ट्र के उत्कर्ष का स्वप्न देखा। उनके जीवन और आदर्शों से आज भी हमें प्रेरणा मिलती है। उनकी जन्मशती के इस पावन अवसर पर यह हमारा दायित्व है कि अधिक से अधिक युवा उनके विराट व्यक्तित्व, सेवा-भाव और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण से परिचित हों। आइए, हम अपने राष्ट्र और देशवासियों के लिए अशोक सिंघल जी के सपनों को साकार करने के संकल्प को एक बार फिर दोहराएं।

नरेंद्र मोदी
(लेखक भारत के प्रधानमंत्री हैं।)