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आपातकाल की आपबीती और दृढ़ता

आपातकाल की आपबीती: शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना सहकर भी राष्ट्रनिष्ठा रही अडिग

आपातकाल के दौरान पत्रकार जयकृष्ण गौड़ ने शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना किया, पर उनकी राष्ट्रनिष्ठा अडिग रही। उनकी कहानी लोकतंत्र के लिए प्रेरणा है।


आपातकाल की आपबीती शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना सहकर भी राष्ट्रनिष्ठा रही अडिग 

इंदौर। भारत में पांच दशक पूर्व लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का वह स्याह अध्याय है, जिसमें असहमति की आवाज को दबाने के लिए भय और दमन का सहारा लिया गया। स्वयंसेवकों, नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ पत्रकारों, लेखकों तथा विचारकों को भी प्रतिबंधों के शिकंजे में कसा गया। शासन-विरोधी लेखन छोड़ने, संघ कार्य से विमुख होने और सत्तानुकूल पत्रकारिता करने का दबाव बनाया गया। जिलाबदर की धमकियां दी गईं, किंतु अनेक मीसाबंदी अपने संकल्प से विचलित नहीं हुए। ऐसे ही निर्भीक व्यक्तित्व थे' स्वदेश', इंदौर के पूर्व संपादक और वरिष्ठ पत्रकार स्व. जयकृष्ण गौड़, जिन्हें सम्मान से 'गौड़ साहब' कहा जाता था।

गौड़ साहब को 3 जुलाई 1975 को तड़के चार बजे इंदौर की सीआरपी लाइन से हिरासत में लिया गया। इससे पहले 27 जून को 'स्वदेश' के संपादक एवं संचालक मंडल को कुप्प.सी. सुदर्शनजी के साथ गिरफ्तार किया जा चुका था। गौड़ साहब समाचार-संकलन के लिए बाहर गए होने से उस समय बच गए थे। लौटते ही पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और जिला जेल भेज दिया। जेल में सुदर्शनजी, शास्त्रीजी और मामाजी के मार्गदर्शन में स्वयंसेवक कठिन परिस्थितियों में मनोबल बनाए रखते थे। प्रशासनिक अधिकारियों से परिचय और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह से मित्रवत संबंध होने के बावजूद गौड़ साहब ने किसी रियायत अथवा समझौते का सहारा नहीं लिया।

बरसते पानी में खाली कराया आवास- उनकी गिरफ्तारी के साथ परिवार पर भी विपत्ति टूट पड़ी। मां, पत्नी और बच्चों सहित छह सदस्यों को बरसती रात में सरकारी आवास खाली करना पड़ा। कुछ दिन रिश्तेदारों और मित्रों के यहां रहने के बाद परिवार ने तिलक नगर में एक कमरे का किराए का मकान लिया। यही छोटा-सा आवास आपातकाल के दौरान उनके संघर्ष का केंद्र बना।

मुलाकात भी अनुमति की मोहताज- जिला जेल में निरुद्ध गौड़ साहब से परिवार को महीने में केवल एक बार मिलने की अनुमति थी। इसके लिए कलेक्टर की स्वीकृति आवश्यक थी। जेल में आने-जाने वाले पत्रों की जांच होती थी। रक्षाबंधन पर बहन भगवतीदेवी को देवास से आकर राखी बांधने की अनुमति के लिए भी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। भाई गोपाल कृष्ण गौड़ को भी मुलाकात के लिए कठिनाइयां उठानी पड़ीं।

मां और पत्नी ने संभाला परिवार- गौड़ साहब की माताजी मुकुंदबाई दृढ़चित्त महिला थीं। उन्होंने बहू दमयंती गौड़ और पौत्रों चंद्रेश तथा बबलू के साथ परिवार को संभाला। कृषि महाविद्यालय में कार्यरत दमयंती गौड़ को पति की अनुपस्थिति के कारण कार्यालयीन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा,किंतु सहयोगियों ने साथ दिया। एक कमरे में छह लोगों के साथ जीवन यापन करते हुए उन्होंने धैर्य नहीं खोया। आपातकाल समाप्त होने के बाद भी सरकारी आवास मिलने में बाधाएं आई, पर परिवार ने उन्हें भी दृढ़ता से पार किया।

जेल में बिगड़ा स्वास्थ्य, अस्पताल में भी पहरा जेल में गौड़ साहब परिवार की चिंता से व्यथित रहते थे। दूसरी ओर भूमिगत कार्यकर्ता समय-समय पर उनके परिवार के पास आश्रय लेने पहुंचते थे। स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया। दीपावली भी अस्पताल में ही बीती। कमरे के बाहर दो प्रहरी तैनात रहते और प्रत्येक आगंतुक तथा संदेश पर निगरानी रखी जाती। परिवार को दिन में एक बार मिलने दिया जाता था। शारीरिक कष्ट के बीच भी उनका आत्मबल अक्षुण्ण रहा।

सुदर्शनजी और मामाजी ने दिखाई पत्रकारिता की राह

राजगढ़ जिले के सारंगपुर में 6 अगस्त 1944 को जन्मे जयकृष्ण गौड़ ने सरकारी नौकरी से जीवन की शुरुआत की थी। कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे वरिष्ठ अधिवक्ता वी.एस. कोकजे के साथ वकालत की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान मामाजी और सुदर्शनजी ने पत्रकारिता को कर्मक्षेत्र बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने 'हिन्दुस्तान समाचार' से संवाददाता के रूप में शुरुआत की और बाद में 'स्वदेश' से जुड़ गए। आपातकाल के समय वे 'स्वदेश' में नगर संवाददाता थे

कलम से जीवन पर्यंत राष्ट्रधर्म का निर्वाह ग्रामीण अंचल से निकलकर संपादक बने गौड साहब ने पत्रकारिता में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनका स्तंभ' काल के कपाल पर' चर्चित रहा। उनकी पुस्तकें 'प्रवाह' और 'काल के कपाल पर' प्रकाशित हुई। वे पूर्व प्रधानमंत्रियों पी.वी. नरसिंहाराव और अटल बिहारी वाजपेयी की विदेश यात्राओं में पत्रकार प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। 'स्वदेश' से निवृत्ति के बाद वे मध्यप्रदेश संस्कृत बोर्ड के उपाध्यक्ष तथा महर्षि पातंजलि संस्कृत संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष रहे। मूल्यनिष्ठ मीडिया और राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठन के प्रयासों में भी योगदान दिया। भाजपा की पत्रिका 'चरैवेति' के प्रधान संपादक रहते हुए वे मंगलवार के अपने स्तंभ' काल के कपाल' के माध्यम से लिखते रहे। 14 अक्टूबर 2019 को भोपाल में उनका निधन हुआ। उनका जीवन प्रमाण है कि दमन की दीवारें विचारों की लौ बुझा नहीं सकतीं। उनकी मीसा यात्रा केवल व्यक्तिगत यातना की कथा नहीं, उस परिवार की तपस्या का भी दस्तावेज है जिसने अभाव, भय और दबाव में राष्ट्रनिष्ठा को सर्वोपरि रखा। पांच दशक बाद भी गौड़ साहब की दृढ़ता लोकतांत्रिक चेतना के लिए प्रेरणा है।

 

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