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विभाजन के दर्द की गूँज

विभाजन विभीषिका; हिंदू नरसंहार की मर्मांतक दास्तां

1947 के भारत विभाजन के समय हुए हिंदू नरसंहार की विभीषिका का वर्णन, जिसमें डॉ. भीमराव अंबेडकर की चेतावनियों को भी साझा किया गया है।


विभाजन विभीषिका हिंदू नरसंहार की मर्मांतक दास्तां

विभाजन विभीषिका के समय जो वीभत्स दृश्य दिखाई दे रहे थे, उनका अनुमान डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बहुत पहले लगा लिया था। डॉ. अंबेडकर ने 'पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ इंडिया' किताब (1945) में लिखा था कि 'अगर भारत का विभाजन होता है तो पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों का भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा।'

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुआ, लेकिन स्वाधीनता के साथ विभाजन की वीभत्स त्रासदी ने राष्ट्र को कभी न भर पाने वाले असह्य घाव दिए। उस समय हुए हिंदुओं के नरसंहार और उसकी पीड़ा से पूरा देश कांप गया, जिसकी मार्मिक चीखें अब भी सुनाई देती हैं। किंतु ये सब कैसे हुआ, इसके लिए इतिहास की ओर रुख करना पड़ेगा।

हमें यह जानना जरूरी है कि उस समय भारत विभाजन के लिए किस प्रकार से अंग्रेज अपनी चाल चल रहे थे। मुस्लिम लीग किस प्रकार से दंगों के आतंकी और क्रूर चेहरे के रूप में उभर रही थी। दरअसल, भारत विभाजन को लेकर जब अंग्रेजों ने पटकथा रची तो वे हर वह दांव-पेंच आजमा रहे थे, जो उनके मंसूबों को पूरा कर सके। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू, भारत विभाजन के लिए आए माउंटबेटन और उनकी पत्नी एडविना के साथ 10 मई 1947 से कई दिनों तक शिमला में पार्टियां कर रहे थे। इतना ही नहीं, माउंटबेटन ने एलिजाबेथ द्वारा दी गई महंगी कार 'रोल्सरॉयस' पंडित नेहरू को दी थी। नेहरू इसी में यात्राएं करते थे। फिर शिमला में माउंटबेटन-नेहरू और एडविना की छुट्टियों के दौरान ही माउंटबेटन के भारत विभाजन संबंधी मसौदे को पंडित नेहरू ने स्वीकार कर लिया था। इससे संबंधित घटनाक्रमों का सविस्तार वर्णन तत्कालीन ब्रिटिश पत्रकार और इतिहासकार लियोनार्ड मोसली ने अपनी पुस्तक 'द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज' में किया है। यानी भारत विभाजन के लिए मुस्लिम लीग और जिन्ना तो उतावले थे ही, साथ ही पंडित नेहरू की भी भूमिका संदिग्ध और विभाजन के पक्ष में ही स्पष्ट प्रतीत होती है।

उस समय कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा भारत विभाजन की माउंटबेटन योजना को स्वीकार करने की तैयारियों का महात्मा गांधी ने भी विरोध किया था। लेकिन उनकी आगे नहीं चली और 3 जून 1947 को पंडित नेहरू की अगुआई में कांग्रेस ने अंग्रेजों के विभाजन प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उन्होंने इस संदर्भ में मनु गांधी से 1 जून 1947 को चर्चा की थी। मनु को अपने दिल की बात कहते हुए उन्होंने बताया, 'आज मैं अपने को अकेला पाता हूं। लोगों को लगता है कि मैं जो सोच रहा हूं, वह एक भूल है। भले ही मैं कांग्रेस का चवन्नी का सदस्य नहीं हूं, लेकिन वे सब लोग मुझे पूछते हैं, मेरी सलाह लेते हैं। आजादी के कदम उलटे पड़ रहे हैं, ऐसा मुझे लगता है। हो सकता है आज इसके परिणाम तत्काल दिखाई न दें, लेकिन हिंदुस्तान का भविष्य मुझे अच्छा नहीं दिखाई देता। हिंदुस्तान की भावी पीढ़ी की आह मुझे न लगे कि हिंदुस्तान के विभाजन में गांधी ने भी साथ दिया था।'

14/15 अगस्त 1947 को भारत के विभाजन के साथ ही पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हिंसा और नरसंहार खुलेआम शुरू हो गया। पाकिस्तान के हिस्से में गैर-मुस्लिमों की संपत्तियां, महिलाओं की इज्जत लूटी जा रही थी। बलात्कार किया जा रहा था। मासूमों तक को मौत के घाट उतारा जा रहा था। हिंदुओं को काफिर कहकर खुलेआम उनकी हत्या के लिए खूंखार मुस्लिम आतंकियों की भीड़ चौतरफा आतंक मचा रही थी। वर्षों से अपनी संपत्ति और अपनी जमीन के मालिक बेघर किए जा रहे थे। विस्थापन के लिए सैकड़ों किलोमीटर की लाइनें आम बात हो चुकी थीं। उस समय विभाजन के एक निर्णय ने लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी को मौत और आतंक के साये में बदल दिया था। पाकिस्तान से हिंदुस्तान के लिए भागते लोग अपनी जमीन और आसमान नाप रहे थे, लेकिन किस पल क्या हो जाए, इसका कोई भरोसा नहीं था। किंतु हिंदुस्तान के हिस्से में मुस्लिम पूरी तरह सुरक्षित थे। जो पाकिस्तान जा रहे थे, उन्हें भी कोई समस्या नहीं थी और जो भारत में रुके, उन्हें भी नहीं हुई। विभाजन की त्रासदी के शिकार हिंदू/सिख हुए।

विभाजन विभीषिका के समय जो वीभत्स दृश्य दिखाई दे रहे थे, उनका अनुमान डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बहुत पहले लगा लिया था। डॉ. अंबेडकर ने 'पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ इंडिया' किताब (1945) में लिखा था कि 'अगर भारत का विभाजन होता है तो पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों का भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा।'इसी संबंध में लियोनार्ड मोसली अपनी पुस्तक 'द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज' के पृष्ठ 279 पर लिखते हैं- 'अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 40 लाख लोगों का विस्थापन हुआ। इस दौरान करीब 6 लाख लोगों की हत्या कर दी गई। बच्चों को पैरों से उठाकर उनके सिर दीवार से फोड़ दिए। बच्चियों का बलात्कार किया गया, बलात्कार कर लड़कियों के स्तन काटे गए। गर्भवती महिलाओं के आंतरिक अंगों को बाहर निकाल दिया गया।'

इन तमाम तथ्यों के बीच प्रश्न उठता है कि विभाजन को स्वीकार करने वाले पंडित नेहरू उस समय क्या कर रहे थे? क्या वे पाकिस्तान के हिस्से में जीवन और मौत के बीच जूझने वाले हिंदू/सिखों के लिए कोई प्रबंध कर रहे थे? पंडित नेहरू ने स्वयं देश की प्रोविजनल संसद में 23 फरवरी 1950 को अपने वक्तव्य में कहा था, 'पिछले कुछ समय से, पूर्वी पाकिस्तान में लगातार भारत विरोधी और हिंदू विरोधी प्रचार हो रहा है। वहां प्रेस, मंच और रेडियो के माध्यम से जनता को हिंदुओं के खिलाफ उकसाया जा रहा है। उन्हें काफिर, राज्य के दुश्मन और न जाने क्या-क्या कहा गया है। हिंदुओं के साथ घृणा और हिंसा का ऐसा ही व्यवहार पश्चिमी पाकिस्तान में भी हो रहा है।'

गौर कीजिए, यह पंडित नेहरू कब कह रहे हैं वर्ष 1950 में। तब तो 1947 से शुरू हुई विभाजन की त्रासदी का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। वह दौर कितना क्रूर और भयावह रहा होगा। फिर बंटवारे के समय से लेकर वर्तमान तक पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के साथ क्या हुआ और क्या हो रहा है? क्या यह किसी से छिपा है? वहां हिंदुओं पर अत्याचार करने वाले कौन लोग थे? इस पर चर्चा करना क्या हिंदू-मुस्लिम करना होता है? जरा! याद करो कुर्बानी की तर्ज पर जरा! याद करो हिंदू नरसंहार की कहानी भी सुनना और सुनाना आवश्यक है। क्योंकि जो अपने इतिहास से सबक नहीं लेते, वे अक्सर मिट जाया करते हैं।

अटल कृष्णमुरारी त्रिपाठी

(लेखक साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार हैं।)

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