महिला आरक्षण विधेयक में बड़े संवैधानिक बदलाव की तैयारी। 2027 से लागू करने की संभावना, परिसीमन शर्त हटाने पर विचार और संसद-विधानसभाओं में 33% आरक्षण का प्रावधान।
प्रमोद भार्गव
नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक) के परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार बड़े संवैधानिक बदलाव की तैयारी में जुट गई है। संसद के दोनों सदनों से पारित हुए इस विधेयक के प्रारूप में परिसीमन की शर्त को विलोपित कर सरकार की इच्छा लोकसभा और विधानसभाओं में 2027 से ही महिलाओं को आरक्षण देने की है। परिसीमन की शर्त के साथ इस प्रावधान को लागू करना 2029 से पहले संभव नहीं है। इस विधेयक में 33 प्रतिशत महिलाओं के लिए संसद और विधानसभा की सीटें आरक्षित करना जरूरी है। अतएव 16,17 और 18 अप्रैल को विशेष सत्र आमंत्रित किया गया है।
केंद्र सरकार ने देश की आधी आबादी का अभिनंदन करते हुए सितंबर 2023 में 128 वां संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित किया था। लोकसभा में 27 साल से यह विधेयक लंबित था। इस विधेयक के पारित होने के बाद संसद के दोनों सदनों से लेकर विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत तय कर दी गई है। विधेयक के कानून में बदलने और क्रियान्वित होने के बाद वर्तमान स्थिति के हिसाब से लोकसभा में महिलाओं के लिए 181 और राज्य विधानसभाओं में 1374 सीटें आरक्षित हो गई हैं। इन सीटों पर महिला प्रत्याशी ही चुनाव लड़ सकेंगी। फिलहाल
आरक्षण की यह सुविधा 15 वर्ष के लिए तय की गई है। लेकिन मांग के अनुसार इसे बढ़ाया भी जा सकता है। देश में इस समय करीब 44 करोड़ महिला मतदाता हैं। अतएव इसके कानून बनते ही ऐसे कई दोहरे चरित्र के चेहरे हाशिये पर चले जाएंगे, जो पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, गाहे-बगाहे बीते 27 साल से गतिरोध पैदा किए हुए थे। महिला आरक्षण विधेयक का मूल प्रारूप संयुक्त मोचर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान गीता मुखर्जी ने तैयार किया था, लेकिन अक्सर इस विधेयक को लोकसभा सत्र के दौरान अंतिम दिनों में पटल पर रखा गया। इससे यह संदेह हमेशा बना रहा कि एचडी देवगौड़ा, इन्द्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी सरकारें गठबंधन के दबाव और राजनीतिक असहमतियों के चलते ठोस इच्छा शक्ति नहीं जता पाई थीं। हालांकि 9 मार्च 2010 में कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने जरूर इस विधेयक को राज्यसभा में पेश कर पास करा लिया था, लेकिन मनमोहन सिंह इसे लोकसभा से पारित नहीं करा पाए थे, जबकि उनके पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत था। इस सरकार को अपने ही सहयोगी दलों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था।
सहयोगी गठबंधन के सांसदों ने पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, इस विधेयक को अटका दिया था। यहां तक की समर्थक दलों ने कांग्रेस को समर्थन वापसी की धमकी भी दे दी थी। हालांकि प्रजातंत्र में तार्किक असहमतियां, संवैधानिक अधिकारों व मूल्यों को मजबूत करने का काम करती हैं, लेकिन असहमतियां जब मुट्ठीभर सांसदों की अतार्किक हठधर्मिता का पर्याय बन जाएं तो ये संसद की गरिमा और सदन की शक्ति को ठेंगा दिखाने वाली साबित होती हैं। उस समय विधेयक से असहमत दलों की प्रमुख मांग थी, '33 फीसदी आरक्षण के कोटे में पिछड़े और मुस्लिम समुदायों की महिलाओं को विधान मंडलों में आरक्षण का प्रावधान रखा जाए।' जबकि संविधान के वर्तमान स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के समुदायों को आरक्षण की सुविधा हासिल है। ऐसे में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को लाभ कैसे संभव है?
हमारे लोकतांत्रिक संविधान में धार्मिक आधार पर किसी भी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। लिहाजा इस बिना पर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण की सुविधा कैसे हासिल हो सकती है? अब ऐसी जानकारी मिल रही है कि 33 प्रतिशत आरक्षित सीटों के अलावा अनारक्षित सीटों पर भी महिलाओं की उम्मीदवारी को प्राथमिकता देने का प्रावधान जोड़ दिया जाए। इससे एक तो संसद में महिलाओं की कुल हिस्सेदारी 38 प्रतिशत से बढ़कर करीब 40 प्रतिशत हो जाएगी, दूसरे जो लोग पिछड़े समुदाय की महिलाओं को विधेयक में जोड़ने की मांग उठा रहे थे, उनकी बोलती बंद हो जाएगी। दरअसल इस कानून के वजूद में आ जाने के बाद अस्तित्व का संकट उन काडरविहीन दलों को है, जो व्यक्ति और जाति आधारित दल हैं। इसी कारण लालू, मुलायम और शरद यादव इस बिल के विरोध में दृढ़ता से खड़े होते रहे थे। उत्तरप्रदेश और बिहार में जातियता के बूते क्रियाशील इन यादवों की तिकड़ी का दावा रहता है कि इस अलोकतांत्रिक विधेयक के पास होने के बाद पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के लिए जम्हूरियत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। जबकि उनकी वास्तविक चिंता यह नहीं है? दरअसल 33 फीसदी आरक्षण के बाद बाहुबली बने पिछड़े वर्ग के आलाकमानों का लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक आधार तो सिमटेगा ही, सदनों में संख्याबल की दृष्टि से भी इन दलों की ताकत घट जाएगी।
अन्यथा ये सियासी दल वाकई उदार और पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के ईमानदारी से हिमायती हैं, तो सभी आरक्षित सीटों पर इन्हीं वगों से जुड़ी महिलाओं को उम्मीदवार बना सकते हैं? बल्कि अनारक्षित सीटों का भी इन्हें प्रतिनिधित्व सौंप सकते हैं? दरअसल इन कुटिल राजनीतिज्ञों के दिखाने और खाने दांत अलग-अलग हैं। गोया तय है कि अल्पसंख्यकों की बेहतर नुमाइंदगी की वकालात के इनके दावे थोथे हैं। इन दलों का दोहरा चरित्र इस बात से भी जाहिर होता रहा है कि जब देश की पंचायती राज्य व्यवस्था में महिलाओं का 33 फीसदी से 50 फीसदी आरक्षण बढ़ाने का विधेयक लाया गया था तब ये सभी दल एक राय थे।