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Women Leadership in Panchayats Driving Change

पंचायतों में महिलाओं का नेतृत्व एक मौन क्रांति

पंचायतीराज में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ग्रामीण भारत में मौन क्रांति ला रही है। जानें 73वें संशोधन के बाद कैसे बदला नेतृत्व और विकास मॉडल।


पंचायतों में महिलाओं का नेतृत्व एक मौन क्रांति 

बलकार सिंह पूनियां 

भारत  में पंचायतीराज प्रणाली देश की शासन संरचना का एक अनूठा और अपरिहार्य हिस्सा है, जिसे सत्ता के विकेंद्रीकरण को सुनिश्चित करने और ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। यह प्रणाली भारत की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्थाओं में निहित है और देश के लोकतांत्रिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह न केवल स्थानीय लोकतंत्र को बढ़ावा देती है, बल्कि सहभागी शासन को भी सशक्त बनाती है और जमीनी स्तर पर जनता की आवाज को प्राथमिकता प्रदान करती है। 

'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः 'भारत की सनातन संस्कृति में नारी सम्मान और सशक्तिकरण की समृद्ध परंपरा रही है। वैदिक काल में महिलाएं शिक्षा, शारवार्थ और शासन में सक्रिय भागीदारी निभाती थीं। गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने दर्शन और ब्रह्मविद्या पर गहन संवाद कर अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया। उस समय को सभा और समिति में महिलाओं की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि उन्हें सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। मध्यकाल में महारानी अहिल्याबाई होलकर, रानी लक्ष्मीबाई और रानी अवंतीबाई जैसी वीरांगनाओं ने कुशल शासन और नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए महिला नेतृत्व को सशका रूप से स्थापित किया। इतिहास यह दर्शाता है कि भारतीय नारी ने सदैव समाज और शासन को दिशा दी है।

भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत उसके गांवों में निहित है, और इन गांवों की शासन व्यवस्था को सशक्त बनाने में पंचायतीराज संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। 73वें संविधान संशोधन (1992) के लागू होने के बाद, जब पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला और महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया गया, तब शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि यह प्रावधान एक गहरी सामाजिक क्रांति का आधार बनेगा। आज यह क्रांति किसी शोर-शराबे या आंदोलन के  रूप में नहीं, बल्कि 'मौन क्रांति' के रूप में सामने आई है, जिसमें महिलाएं न केवल संख्या में बड़ी है बल्कि नेतृत्व के केंद्र में आकर ग्रामीण भारत के विकास की दिशा तय कर रही है। 73वां संविधान संशोधन भारतीय लोकतंत्र में विकेंद्रीकरण की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हुआ, जिसने पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक आधार प्रदान करते हुए महिलाओं के लिए न्यूनतम एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया। समय के साथ 20 से अधिक राज्यों द्वारा इसे 50 प्रतिशत तक बढ़ा देने से ग्रामीण शासन में महिलाओं की भागीदारी अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच गई है। आज देश की लगभग 2.6 लाख पंचायतों में 31.5 लाख से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों में करीब 14.5 लाख महिलाएं हैं, जो कुल का लगभग 46 प्रतिशत हैं, और कई राज्यों में यह आंकड़ा 50 से 53 प्रतिशत से भी अधिक हो चुका है। 

यह न केवल विश्व में स्थानीय स्तर पर महिलाओं की सबसे बड़ी राजनीतिक भागीदारी का उदाहरण है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि ग्रामीण लोकतंत्र अब पारंपरिक पुरुष-प्रधान डांचे से आगे बढ़ चुका है। यह परिवर्तन केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक और सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। 2015 से 2021 के बीच ग्राम प्रधानों में महिलाओं की भागीदारी 45 प्रतिशत से बढ़कर 53.7 प्रतिशत तक पहुंचना इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करता है। वैदिक काल की गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज की महिलाएं ग्राम सभा से लेकर जिला परिषद तक निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इस प्रकार पंचायतीराज व्यवस्था के माध्यम से उभरता महिला नेतृत्व ग्रामीण भारत में एक 'मौन क्रांति' का रूप ले चुका है, जो बिना शोर-शराबे के सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और सशक्त लोकतंत्र को नई दिशा तय कर रहा है। महिला नेतृत्व के विस्तार ने ग्रामीण विकास की प्राथमिकताओं को बुनियादी ढांचे से आगे बढ़ाकर मानवीय विकास के केंद्र में स्थापित कर दिया है। जहां पहले पंचायतों का ध्यान मुख्यतः सड़कों, भवनों और भौतिक संरचनाओं तक सीमित रहता था, वहीं महिला प्रतिनिधियों ने पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण जैसे जीवन-गुणवत्ता से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दी है।

 विभिन्न अध्ययनों और आर्थिक सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट होता है कि महिला नेतृत्व वाली पंचायतों में आंगनबाड़ी सेवाओं की गुणवत्ता, स्कूल  पंचायत भवन नामांकन और मातृ-शिशु स्वास्थ्य संकेतकों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, साथ ही सामाजिक कल्याण योजनाओं के फंड का उपयोग लगभग 30 प्रतिशत अधिक प्रभावी ढंग से किया जा रहा है। पारदर्शिता और जवाबदेही के स्तर में भी वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे भ्रष्टच्चार के मामलों में कमी आई है। देश की लगभग 2.6 लाख पंचायतें, जो 65 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के विकास का दायित्व निभाती है, उनमें 31.5 लाख से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों में करीब 46 प्रतिशत महिलाएं हैं, और कई राज्यों में यह भागीदारी 50 से 56 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। यह केवल प्रतिनिधित्व की वृद्धि नहीं, बल्कि सत्ता संरचना में एक गहरे परिवर्तन का संकेत है, जहां महिलाएं निर्णय निर्माण की केंद्रीय भूमिका निभा रही है। 

बढ़ते वित्तीय सशक्तिकरण-जैसे 16वें वित्त आयोग द्वारा 2026-31 के लिए 4.35 लाख करोड़ से अधिक की सिफारिश के प्रभावी उपयोग में भी महिला नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण साबित हो रही है, जिससे योजनाओं का क्रियान्वयन अधिक लक्षित, समावेशी और परिणामोन्मुख बन रहा है। इस प्रकार, पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी न केवल लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत कर रही है, बल्कि ग्रामीण भारत के विकास को अधिक संवेदनशील, पारदर्शी और जन-केंद्रित दिशा भी प्रदान कर रही है। राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कारों में महिलाओं का उभरता नेतृत्व आज ग्रामीण भारत में परिवर्तन की सशक्त मिस्राल बन चुका है। पीआईबी 2024 के अनुसार, सम्मानित पंचायतों में से लगभग 42 प्रतिशत का नेतृत्व महिलाओं के हाथों में रहा है, जो यह दर्शाता है कि महिला प्रतिनिधि केवल सहभागिता तक सीमित नहीं, बल्कि उत्कृष्टता की नई मानक स्थापित कर रही हैं। 

नारी शक्ति, 'स्वस्थ पंचायत और बाल हितैषी पंचायत' जैसी श्रेणियों के साथ-साथ कार्बन न्यूटुल जैसे आधुनिक विषयों में भी उनका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। महाराष्ट्र की पाटोदा ग्राम पंचायत द्वारा 26 पुरस्कार जीतना इस नेतृत्व क्षमता का सशक्त उदाहरण है। सरकार द्वारा पुरस्कारों का नाम देवी अहिल्याबाई होलकर और रानी लक्ष्मीबाई जैसी ऐतिहासिक नायिकाओं के नाम पर रखना भी इस परिवर्तन को सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक मजबूती प्रदान करता है। यह बदलाव केवल प्रशासनिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक संरचना की भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। महिला नेतृत्व ने पंचायतों को अधिक समावेशी बनाया है, जहां लैंगिक और जातिगत भेदभाव को चुनौती मिल रही है। डिजिटल गवर्नेस के विस्तार ने पंचायतों में महिला नेतृत्व को नई मजबूती दी है। ई-ग्राम स्वराज पोर्टल जैसे प्लेटफॉम्र्स ने प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाते हुए महिला प्रतिनिधियों की भागीदारी को अधिक प्रभावी बनाया है। वहीं, जल जीवन मिशन के तहत लगभग 9 करोड़ ग्रामीण महिलाओं को पानी लाने के दैनिक श्रम से मुक्ति मिलने से उनके पास शिक्षा, रोजगार और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय होने के लिए अधिक अवसर उपलब्ध हुए हैं। 

स्पष्ट है कि पंचायतों में महिलाओं का नेतृत्व ग्रामीण भारत में एक 'मौन क्रांति' के रूप में उभर रहा है, जो बिना शोर के लोकतांत्रिक भागीदारी, विकास की प्राथमिकताओं और सामाजिक संरचना को बदल रहा है। हालांकि, इस परिवर्तन को स्थायी रूप देने के लिए निरंतर प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता, वित्तीय स्वायत्तता और सामाजिक सोच में बदलाव आवश्यक है। जब महिलाएं वास्तविक निर्णयकर्ता के रूप में पूरी तरह सशक्त होंगी, तब यह मौन क्रांति समावेशी और सशक्त ग्रामीण भारत की ठोस आधारशिला बन जाएगी।

 

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