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BJP Rise in Bengal: From 0 to Power

भाजपा की जीतने की जिद ने दीदी को किया आउट, भाजपा/जन संघ के सियासी संघर्ष का  लेखा-जोखा

पश्चिम बंगाल के पिछले 17 विधानसभा चुनावों में 11 बार नहीं खुला था सीटों का खाता,


भाजपा की जीतने की जिद ने दीदी को किया आउट भाजपाजन संघ के सियासी संघर्ष का  लेखा-जोखा

राजदेव पांडेय

भोपाल। भाजपा और उसकी पूर्ववर्ती पार्टी जन संघ   पश्चिम बंगाल के पिछले 17 विधानसभा चुनावों में 11 में जीत का खाता तक नहीं खोल सकी थी। फिर भी धैर्य नहीं खोया। लगातार हार के बाद भी जीतने की जिद ने पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अपनी सरकार बना ली। अब गंगोत्री से गंगा सागर तक ही नहीं, बल्कि भाजपा का राज पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक कायम हो गया है। 

फिलहाल पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता दीदी की अभेद सियासी किलेबंदी ढह गयी। यहां भाजपा ने अपनी जीत का परचम लहरा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भाजपा की यह जीत  महत्वपूर्ण  है। यह देखते हुए कि इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता का स्वाद इससे पहले कभी नहीं चखा था। फिलहाल पश्चिम में अरब सागर से लगे गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी से सटे पश्चिम बंगाल  तक अब भाजपा राज  कायम होने जा रहा है। 

इस राज्य के चुनावी इतिहास का विश£ेषण करें तो साफ होता है कि इस राज्य में भाजपा के पूर्ववर्ती दल 1951 के पहले विधानसभा चुनाव से इस राज्य को जीतने की अटूट कोशिश की। बेशक सफलता अब पूरे 75 साल बाद मिली है। अपवाद एक बार 1977 के चुनाव को छोड़ दें तो इस पार्टी ने हर चुनाव में चुनावी ताल ठोकी। आजादी के बाद से अब तक हुए 17 विधानसभा चुनावों में से 10 में भाजपा जीत का खाता तक नहीं खोल सकी। बावजूद पार्टी हर चुनाव में पूरे जोश के साथ उतरती गयी। अंतत: वर्ष 2026 का  चुनाव में सरकार बनाने की भागीरथ मंशा पूरी हो गयी। 

 पश्चिम बंगाल में  भाजपा  की सियासी यात्रा को इन आंकड़ों से समझा जा सकता है

चुनाव वर्ष कुल सीटों पर लड़ा चुनाव जीते
1951 85 09
1957 33 00
1962 25 00
1967 58 01
1969 50 00
1971 23 01
1972 16 00
1982 52 00
1987 57 00
1991 291 00
1996 292 00
2001 266 00
2006 29 00
2011 289 00
2016 291 03
2021 291 77

 खास बात ये है कि 

  • 1977 में भारतीय जनसंघ ने स्वतंत्र रूप में चुनाव न लड़कर जनता पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा था। 
  • 1982 से पहले के चुनाव भारतीय जन संघ के रूप में लड़े थे। इसके बाद जनसंघ  भाजपा के रूप में सामने आयी।

राजदेव पांडेय, स्वदेश भोपाल के स्थानीय संपादक हैं।

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