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Valentine Week: Love Blooms Amid Delhi Book Fair

प्रेम की बेफिक्री: पुस्तक मेले से वेलेंटाइन डे तक

दिल्ली के पुस्तक मेले में हाथ थामे घूमते प्रेमी, वेलेंटाइन डे पर प्यार की छोटी मुस्कानें और जीवन के खुशनुमा पल


प्रेम की बेफिक्री पुस्तक मेले से वेलेंटाइन डे तक

रिंकल  शर्मा

पुस्तक मेला ज्ञान का ऐसा उत्सव है, जहां प्रेम ने बिना टिकट और बिना स्टॉल के अपनी जगह बना ली थी। 'दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन...'गुलजार द्वारा रचित 'मौसम' फिल्म का यह गीत आज भी फुर्सत, प्रेम और खोए हुए सुकून का सबसे खूबसूरत प्रतीक माना जाता है। पर आज के समय में फुर्सत ढूंढना उतना ही कठिन हो गया है, जितना भीड़-भरे पुस्तक मेले में अपनी पसंद की किताब पाना।

दिल्ली के भारत मण्डपम में लगे पुस्तक मेले में किताबों से ज्यादा, हाथों में हाथ थामे घूमते लोग दिखाई दे रहे थे। मानो प्रेम ने समय की कमी के बीच अपने लिए कुछ फुर्सत के पल निकाल लिए हों। जनवरी का महीना था। सर्दी अपनी पूरी ईमानदारी से चरम पर थी। वही जगह थी, जहां लोग यह साबित करने आते हैं कि वे किताबें पढ़ते हैं, भले ही घर जाकर उन्हें अलमारी में सजा दें।

रविवार के दिन पुस्तक मेले में लेखकों, प्रकाशकों और पाठकों की भीड़ इतनी थी कि अगर कोई बिछड़ जाए, तो अगला संस्करण आने तक मिलने की उम्मीद ही की जा सकती थी। अलग बात यह थी कि लोगों में किताबें खरीदने की दिलचस्पी कम और फोटो लेने की ज्यादा थी। चारों ओर किताबें थीं, इतनी कि मन में यह अपराधबोध होने लगा 'इतनी किताबें हैं और हमने कितनी पढ़ी हैं?'

लेकिन इस ज्ञान-समुद्र के बीच एक दृश्य बार-बार ध्यान खींच रहा था। भीड़ में युवक-युवतियां हाथ में हाथ डाले ऐसे घूम रहे थे, जैसे यह पुस्तक मेला नहीं, बल्कि प्रेम मेला हो। वे एक-दूसरे का हाथ थामे स्टॉल दर स्टॉल घूम रहे थे, जैसे हर किताब प्रेम-पत्र हो और हर प्रकाशक उनके प्रेम का गवाह। कोई कविताओं की किताब उठाकर गंभीर मुद्रा में पढ़ रहा था, जबकि उसकी गंभीरता से भी ज्यादा गंभीर उसके साथी की नजरें थीं। कोई इतिहास की किताब के बहाने भविष्य की योजनाएं बना रहा था।हाथ थामे घूमती इन प्रेमी जोड़ियों को देखकर यह एहसास हुआ कि शायद उनके लिए पुस्तक मेला 'बुक' से ज्यादा 'लुक' का मामला है। पर भीड़ में हाथ थामकर चलना, एक-दूसरे को खोने न देना यह भी प्रेम का ही एक संस्करण था।

वेलेंटाइन डे केवल प्रेमियों का दिन नहीं, बल्कि प्रेम की उस भावना का उत्सव है, जो जीवन को सहनीय ही नहीं, बल्कि सुंदर भी बनाती है। प्रेम वह तत्व है, जो चाय को 'बस ठीक है' से 'वाह!' तक पहुंचा देता है और साधारण बातचीत को यादगार बना देता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि प्रेम कोई फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में छुपा हुआ सच है।

प्रेम की सबसे दिलचस्प बात यह है कि वह जितना गंभीर होता है, उतना ही शरारती भी। वह बिना बताए रूठता है, बिना कहे मान जाता है, और कभी-कभी बिना वजह मुस्कुरा देता है। वेलेंटाइन डे उन मुस्कुराहटों का सार्वजनिक संस्करण है, जिन पर हम बाकी दिनों में 'कुछ नहीं' कहकर बात टाल देते हैं। यह वह मौका है, जब दिल को थोड़ी-सी छुट्टी मिलती है और दिमाग से कहा जाता है'आज तुम चुप रहो।'

आज के तेज़ रफ्तार जीवन में प्रेम के लिए समय निकालना लगभग वैसा ही हो गया है, जैसा व्यस्त समय में पूरी किताब पढ़ना। वर्तमान में प्रेम को सबसे ज्यादा खतरा समय से नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं से है। हमारे पास हर चीज़ के लिए वक्त है सीरीज देखने के लिए, रील्स स्क्रॉल करने के लिए, बहस करने के लिए पर किसी अपने की बात शांति से सुनने के लिए नहीं।

 

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