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US-Iran Talks Fail: Pakistan Faces Strategic Crisi

क्या फिर शुरू होगी अमेरिका-ईरान के बीच जंग

अमेरिका-ईरान वार्ता विफल होने के बाद पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव। कूटनीतिक, सैन्य और आंतरिक चुनौतियों के बीच फंसा इस्लामाबाद।


क्या फिर शुरू होगी अमेरिका-ईरान के बीच जंग

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शनिवार को अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता को लेकर पहले से ही तय था कि यह वार्ता बेनतीजा समाप्त हो जाएगी, क्योंकि अमेरिका और ईरान दोनों ही इस वार्ता को लेकर उत्साहित नहीं थे। शांति वार्ता के विफल हो जाने से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के मंसूबों पर पानी फिर गया है। अगर यह वार्ता सफल हो जाती तो विश्व में उनकी प्रतिष्ठा बढ़नी तय थी, परंतु अब वे दोनों तीन में रहे न तेरह में। हालांकि वह दोनों दम भर रहे हैं कि अगले दस दिनों में फिर बातचीत फिर हो सकती है। शांति वार्ता टूटने से न केवल पश्चिम एशिया में फिर से मिसाइलों और बमों से हमले शुरू हो सकते हैं, बल्कि पाकिस्तान को भी गंभीर कूटनीतिक और सुरक्षा संकट में धकेल दिया है।

पाकिस्तान इन वार्ताओं का मध्यस्थ बनकर वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन शांति वार्ता टूटने से पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ गई है। एक तरफ अमेरिका है, जिससे पाकिस्तान आर्थिक सहायता, आईएमएफ जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से समर्थन और सुरक्षा सहयोग की उम्मीद रखता है तो दूसरी तरफ ईरान है जो पाकिस्तान का प्रत्यक्ष पड़ोसी है। दोनों देशों के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा है जो ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील रही है। ईरान के साथ कोई भी टकराव पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को दशकों पीछे धकेल सकता है, क्योंकि सीमा क्षेत्र में पहले से ही अस्थिरता मौजूद है। शांति वार्ता के बीच पाकिस्तान ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया।

 शनिवार को ही उसने अपने फाइटर जेट और सैन्य बलं सऊदी अरब भेज दिए। यह कदम 2025 में सऊदी अरब के साथ हुए सुरक्षा समझौते के तहत उठाया गया है। इस समझौते के अनुसार यदि सऊदी अरब पर कोई हमला करेगा तो पाकिस्तान को उसकी सुरक्षा के लिए सैन्य सहायता प्रदान करनी होगी। फिलहाल सऊदी अरब अमेरिका का करीबी सहयोगी है और ईरान के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण हैं। पाकिस्तान की आंतरिक स्थित्ति भी बेहद नाजुक है। पाकिस्तान में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी रहती है।

ईरान के खिलाफ किसी भी प्रकार के सैन्य सहयोग से पाकिस्तान में सांप्रदायिक दंगे या गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। बलूचिस्तान और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में पहले से ही आतंकवादी गतिविधियां सक्रिय हैं। ऐसे में बाहरी दबाव आंतरिक अस्थिरता को और बढ़ा सकता है। सीमा पर तनाव के कारण हॉट बॉर्डर बनने की आशंका है। पाकिस्तान-ईरान सीमा पर जैश अल अदल जैसे सुन्नी बलूच मिलिटेंट गुट पहले से सक्रिय हैं। ये समूह दोनों देशों के सुरक्षा बलों पर हमले करते रहे हैं।

वार्ता विफल होने और क्षेत्रीय अराजकता बढ़ने पर ये गुट इस अस्थिरता का फायदा उठाकर हमले तेज कर सकते हैं। इससे सीमा क्षेत्र में सैन्य तैनाती बढ़ेगी, संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और दोनों पड़ोसियों के बीच विश्वास की कमी और गहरी हो जाएगी। पाकिस्तान के लिए यह स्थिति अत्यंत कठिन है, क्योंकि वह न तो अमेरिका को पूरी तरह नाराज कर सकता है और न ही ईरान के साथ सीचा संघर्ष मोल ले सकता है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर दोनों ही इस समय तनाव में हैं। 

वे एक तरफ अमेरिकी दबाव को संभालने की कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी तरफ ईरान के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कूटनीतिक चैनल खुले रखने पर जोर दे रहे हैं। सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाना भी दौधारी तलवार साबित हो सकता है। यह ईरान को भड़का सकता है। समग्र रूप से अमेरिका-ईरान वार्ता टूटने के बाद पाकिस्तान को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां उसकी हर चाल क्षेत्रीय संतुलन और घरेलू स्थिरत्ता दोनों को प्रभावित करेंगी।

 

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