सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों के बाद ओबीसी, एससी-एसटी आरक्षण, क्रीमी लेयर और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस तेज हो गई है।
मेजर सरस त्रिपाठी
हाल के वर्षों में न्यायपालिका के कुछ निर्णयों और टिप्पणियों में एससी-एसटी आरक्षण के भीतर भी ‘आंतरिक वर्गीकरण’ तथा सीमित रूप से क्रीमी लेयर जैसी अवधारणाओं पर चर्चा हुई है। तर्क यह दिया गया कि इन वर्गों के भीतर भी कुछ समुदाय लगातार लाभ उठा रहे हैं, जबकि अत्यंत वंचित समूह पीछे रह जाते हैं। परंतु यह प्रश्न अभी भी संवैधानिक और राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण की वर्तमान संरचना, विशेषकर ‘क्रीमी लेयर’ और वास्तविक सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर एक वाद की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने मौखिक टिप्पणी की कि आरक्षण का लाभ समाज के भीतर वास्तव में वंचित वर्गों तक पहुँचना चाहिए, न कि केवल उन समूहों तक जो पहले से अपेक्षाकृत सशक्त हो चुके हैं। यह टिप्पणी भारतीय आरक्षण व्यवस्था की जटिलताओं और उसके पुनर्संतुलन की आवश्यकता को उजागर करती है।
भारतीय संविधान में आरक्षण का मूल उद्देश्य आर्थिक सहायता देना कभी नहीं था, बल्कि व्यवस्था का अंग बन चुके सामाजिक अन्याय, असमानता और सामाजिक बहिष्करण को दूर करना था। आरक्षण मूलतः प्रतिनिधित्व के लिए दिया गया था, जिसमें अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के सदस्यों के लिए विधायिका (संसद और विधानसभाओं) में सीटें सुरक्षित रखने का प्रावधान था। बाद में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण लागू किया गया।
अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के सदस्यों को प्रतिनिधित्व देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) के अंतर्गत विशेष प्रावधान बनाए गए। समय के साथ यह व्यवस्था न केवल विस्तृत हुई, बल्कि विकृत भी होती गई और निजी शिक्षण संस्थानों तक पहुँच गई। मंडल आयोग की संस्तुतियों को लागू कर तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण के दायरे में शामिल किया। इस प्रकार आरक्षण का प्रभाव क्षेत्र (Scope) ही नहीं, बल्कि परिमाण (Scale) भी बढ़ता गया।
सरकार से बिना सहायता प्राप्त किए चल रहे (अनएडेड प्राइवेट) कॉलेजों में आरक्षण संविधान के 93वें संशोधन के बाद लागू हुआ। इसके तहत अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत राज्य को निजी शैक्षणिक संस्थानों, चाहे वे सरकारी सहायता प्राप्त हों या अनएडेड प्राइवेट कॉलेज, में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, एससी और एसटी के लिए आरक्षण लागू करने का अधिकार मिला। हालांकि, अल्पसंख्यक संस्थानों को इससे बाहर रखा गया, जो एक अलग चर्चा का विषय है।
केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में वर्तमान व्यवस्था के अनुसार सामान्यतः ओबीसी को 27 प्रतिशत, एससी को 15 प्रतिशत, एसटी को 7.5 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है। कुल मिलाकर यह आरक्षण लगभग 59.5 प्रतिशत तक पहुँचता है। इसे सांख्यिकी की तकनीकी भाषा में ऊर्ध्वाधर (Vertical) आरक्षण कहा जाता है।
निजी अनएडेड कॉलेजों में आरक्षण का प्रतिशत राज्यों की नीतियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है, क्योंकि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। कई राज्यों में स्थानीय सामाजिक संरचना के आधार पर आरक्षण 60 प्रतिशत से भी अधिक है। अनेक राज्यों में, जहाँ लगभग पूरी जनसंख्या जनजातीय है, आरक्षण 100 प्रतिशत तक लागू है।
ऊर्ध्वाधर (Vertical) और क्षैतिज (Horizontal) आरक्षण क्या है?:भारतीय आरक्षण प्रणाली मूलतः दो स्तरों पर कार्य करती है वर्टिकल (ऊर्ध्वाधर) और हॉरिजॉन्टल (क्षैतिज) आरक्षण।वर्टिकल आरक्षण सामाजिक श्रेणियों पर आधारित आरक्षण है, जैसे एससी, एसटी, ओबीसी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS)। इन वर्गों को अलग-अलग निश्चित प्रतिशत सीटें प्रदान की जाती हैं। यह संविधान के सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है।
हॉरिजॉन्टल आरक्षण विशेष परिस्थितियों या समूहों के लिए होता है, जैसे महिलाएँ, दिव्यांगजन, भूतपूर्व सैनिक, ट्रांसजेंडर व्यक्ति आदि। हॉरिजॉन्टल आरक्षण सभी वर्टिकल श्रेणियों के भीतर लागू होता है। उदाहरण के लिए, यदि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण है, तो यह एससी, एसटी, ओबीसी और सामान्य सभी श्रेणियों के भीतर लागू होगा। अर्थात ओबीसी महिला, एससी महिला और सामान्य महिला सभी को अपने-अपने वर्ग के भीतर अवसर मिलेगा।व्यवहार में यही व्यवस्था कई बार विवाद और न्यायिक व्याख्या का विषय बनती है, क्योंकि मेरिट सूची, कट-ऑफ और श्रेणी समायोजन की प्रक्रिया अत्यंत तकनीकी होती है।
ओबीसी आरक्षण और क्रीमी लेयर: ओबीसी आरक्षण में सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ‘क्रीमी लेयर’ सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि ओबीसी वर्ग के भीतर जो परिवार सामाजिक और आर्थिक रूप से पर्याप्त उन्नति कर चुके हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। यह सिद्धांत 1992 के ऐतिहासिक Indra Sawhney Judgment अर्थात ‘मंडल केस’ में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित किया गया था। इसी संदर्भ में न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि ओबीसी आरक्षण की समीक्षा आवश्यक है, ताकि अत्यंत पिछड़े समूहों को वास्तविक प्रतिनिधित्व मिल सके। उनका संकेत इस ओर था कि कई बार आरक्षण का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत संगठित और सक्षम ओबीसी समुदायों तक ही सीमित रह जाता है।
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि एससी-एसटी आरक्षण और ओबीसी आरक्षण में तकनीकी अंतर है। एससी और एसटी आरक्षण की संवैधानिक अवधारणा ओबीसी से भिन्न है। तकनीकी रूप से सबसे बड़ा अंतर ‘क्रीमी लेयर’ सिद्धांत का है।ओबीसी में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू होता है, जिसमें सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के साथ आर्थिक उन्नति को भी देखा जाता है। यदि पारिवारिक आय निर्धारित सीमा से ऊपर है, तो आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। जबकि एससी-एसटी में पारंपरिक रूप से क्रीमी लेयर लागू नहीं होती। इसका आधार यह माना गया कि जातिगत अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव केवल आर्थिक प्रगति से समाप्त नहीं हो जाते। अर्थात कोई एससी या एसटी परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाए, तब भी उसे सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है।
आरक्षण व्यवस्था की वर्तमान चुनौतियाँ:आज भारतीय आरक्षण व्यवस्था के सामने तीन प्रमुख चुनौतियाँ हैं. वास्तविक लाभार्थियों की पहचान, सामाजिक न्याय और मेरिट के बीच संतुलन,आरक्षण के भीतर समान वितरणआरक्षण का मूल उद्देश्य अवसरों की समानता स्थापित करना था, किंतु अब यह केवल संवैधानिक नीति नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बन चुका है।कई राज्य आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर ले जाने का प्रयास कर चुके हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने सामान्यतः 50 प्रतिशत सीमा को संवैधानिक संतुलन माना है, यद्यपि कुछ अपवाद भी स्वीकार किए गए हैं।भारतीय आरक्षण व्यवस्था केवल रोजगार या शिक्षा की नीति नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्सरचना का उपकरण है। परंतु सात दशकों के अनुभव के बाद यह स्पष्ट है कि इसके भीतर निरंतर समीक्षा और सुधार की आवश्यकता बनी हुई है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना की टिप्पणी इसी व्यापक बहस का हिस्सा है, जो यह प्रश्न उठाती है कि क्या आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे वंचित वर्ग तक पहुँच रहा है?वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल आरक्षण की जटिल संरचना, निजी संस्थानों में बढ़ती आरक्षण भागीदारी तथा क्रीमी लेयर की अवधारणा यह दर्शाती है कि भारत की सामाजिक न्याय नीति में पुनरावलोकन की आवश्यकता है। भविष्य की चुनौती यह होगी कि सामाजिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक समानता और प्रशासनिक दक्षता इन तीनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।