संघ के वरिष्ठ प्रचारक शरद मेहरोत्रा ने जीवनभर राष्ट्र और संगठन कार्य को समर्पित रखा। अनुशासन, सेवा और आत्मीयता से उन्होंने हजारों कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया।
चन्द्रवेश पांडे
भोपाल की वह सर्द जनवरी की भोर आज भी अनेक कार्यकर्ताओं की स्मृतियों में जीवित है। समय था प्रातः 4 बजकर 50 मिनट। कमरे में गहरा सन्नाटा था। कैंसर की असहनीय पीड़ा से जूझ रहे शरद मेहरोत्रा बिस्तर पर लेटे थे, लेकिन चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी। आसपास बैठे कार्यकर्ताओं की आंखें नम थीं, जबकि शरदजी धीमे स्वर में अधूरे कार्यों और आगामी योजनाओं की चर्चा कर रहे थे। किसी ने आग्रह किया कि अब विश्राम कर लें, पर उन्होंने धीरे से कहा- 'कार्यकर्ताओं को बताना, काम रुकना नहीं चाहिए।' कुछ ही क्षण बाद उन्होंने अंतिम सांस ली। 30 जनवरी 1993 को मात्र 51 वर्ष की आयु में उनका जीवन दीप बुझा नहीं, बल्कि हजारों स्वयंसेवकों के भीतर स्थायी प्रकाश बनकर फैल गया।
सुगंध की नगरी से निकला तपस्वीः 20 अक्टूबर 1942 को इत्र नगरी कन्नौज में जन्मे शरतचन्द्र मेहरोत्रा समृद्ध और संस्कारित परिवार में पले-बढ़े। उनके पिता श्री हरिहरनाथ जी संघचालक थे, इसलिए घर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वातावरण स्वाभाविक था। बचपन से ही अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और सेवा के संस्कार उनके भीतर गहरे उतरते गए। आगे की शिक्षा के दौरान वे संघ कार्य से गहराई से जुड़े और एम.ए. (अर्थशास्त्र) पूर्ण करने के बाद मात्र 22 वर्ष की आयु में प्रचारक जीवन का कठिन मार्ग चुन लिया। जिस उम्र में लोग सुख-सुविधाओं और भविष्य की योजनाओं में उलझते हैं, उस आयु में उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रकार्य को समर्पित कर दिया।
व्यवहार से गढ़ते थे कार्यकर्ता- शरदजी का व्यक्तित्व अत्यंत सादा, लेकिन प्रभावशाली था। सफेद धोती-कुर्ता, तेज चाल, समय की कठोर पाबंदी और आत्मीय व्यवहार यही उनकी पहचान थी। वे भाषणों से अधिक अपने आचरण से प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि 'संघ का काम शब्दों से नहीं, व्यवहार से आगे बढ़ता है।' वे केवल कार्यकर्ताओं के नाम नहीं याद रखते थे, बल्कि उनके परिवार, पढ़ाई, कठिनाइयों और सपनों तक की चिंता करते थे। यदि किसी स्वयंसेवक से गलती हो जाती, तो पहले उसके कंधे पर हाथ रखते, फिर समझाते। यही कारण था कि कार्यकर्ता उन्हें अधिकारी नहीं, अभिभावक मानते थे।
जहां गए, वहां संगठन खड़ा हो गया मथुरा, अलीगढ़ और आगरा संभाग में कार्य करते हुए उन्होंने संगठन विस्तार की अद्भुत क्षमता दिखाई। वे स्वयं सबसे पहले मैदान में उतरते थे। प्रांत प्रचारक बनने के बाद भी सामान्य स्वयंसेवक की तरह रातभर व्यवस्थाएं संभालते दिखाई देते थे। उनका विश्वास था कि नेतृत्व ऊपर बैठकर नहीं, साथ चलकर किया जाता है। वर्ष 1981 में मात्र 36 वर्ष की आयु में उन्हें मध्यभारत का सह प्रांत प्रचारक बनाया गया। नया क्षेत्र और नई चुनौतियां थीं, लेकिन उनकी संगठन क्षमता ने शीघ्र ही कार्य में नई ऊर्जा भर दी। उनके सतत प्रवास और आत्मीय संपर्क के कारण हजार शाखाओं का लक्ष्य पूरा हुआ तथा अनेक जिलों में सौ से अधिक शाखाएं स्थापित हुई।
कल्पनाशीलता से असंभव को बनाया संभव: शरदजी केवल संगठनकर्ता नहीं, दूरदर्शी योजनाकार भी थे। वे ऐसे कार्यों की कल्पना करते थे जिन्हें प्रारंभ में लोग असंभव मान लेते थे। शारदा विहार परिसर में मात्र दो माह में भवन निर्माण कर पं. रामनारायण शास्त्री आचार्य प्रशिक्षण संस्थान प्रारंभ कराना हो या बैरसिया में 'पंचवटी' की कल्पना को साकार करना उन्होंने हर चुनौती को साधना की तरह स्वीकार किया। ग्रामीण क्षेत्रों में संस्कारयुक्त शिक्षा के लिए उन्होंने विद्यालयों की योजना बनाई। आगे चलकर यही प्रयास हजारों विद्यार्थियों तक पहुंचा। महिलाओं के लिए राष्ट्रीय विचारों से जुड़ी प्रभावी पत्रिका की आवश्यकता अनुभव हुई तो उन्होंने 'ओजस्विनी' की परिकल्पना को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कैंसर ने शरीर को तोड़ा, लेकिन मन अडिग बना रहा
कैंसर जैसी भीषण बीमारी ने उनके शरीर को तोड़ दिया था, लेकिन उनका मन अडिग रहा। अंतिम दिनों में भी वे 'भाऊराव देवरस सेवा न्यास' की योजनाओं पर चर्चा करते रहे, जिसका उद्देश्य वनवासी बंधुओं को शिक्षा और सेवा के माध्यम से मुख्यधारा से जोड़ना था। चिकित्साधीन रहते हुए भी उन्होंने कार्यकर्ताओं को बुलाकर मार्गदर्शन दिया। उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध कर दिया कि महानता पद या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि निरंतर समर्पण में होती है। आज भी जब कोई कार्यकर्ता बिना नाम और सम्मान की अपेक्षा किए संगठन के लिए कार्य करता है, तो लगता है कि शरद मेहरोत्रा की वही सुगंध अब भी वातावरण में व्याप्त है। उनका जीवन सचमुच इत्र की तरह था जितना तपता गया, उतना ही अधिक महकता गया।
अनुशासन में सौदर्य और आत्मीयता
शरदजी का जीवन अत्यंत अनुशासित था, लेकिन उसमें कठोरता नहीं, संवेदना थी। वे व्यवस्था और सौंदर्य दोनों को महत्व देते थे। कार्यालय की सज्जा से लेकर कार्यक्रम की छोटी-छोटी व्यवस्थाओं तक अनुशासन में सौदर्य और आत्मीयता उनकी विशेष दृष्टि रहती थी। उनका मानना था कि उत्कृष्टता भी संगठन संस्कृति का हिस्सा है। अपने लिए वे अत्यंत कठोर थे, लेकिन कार्यकर्ताओं की पीड़ा उन्हें भीतर तक विचलित कर देती थी। अनेक परिवार आज भी याद करते हैं कि संकट के समय शरदजी बिना बताए उनके घर पहुंच जाते थे। वे सामने वाले को यह एहसास करा देते थे कि वह अकेला नहीं है।