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Renowned Indian Painter Lakshminarayan Bhavsar Die

रंगों में विलीन हुआ तूलिका का तपस्वी

मालवा की मिट्टी से निकले वरिष्ठ चित्रकार डॉ. लक्ष्मीनारायण भावसार का निधन। भारतीय चित्रकला जगत ने खोया रंगों का तपस्वी


रंगों में विलीन हुआ तूलिका का तपस्वी

चन्द्रवेश पांडे

भारतीय चित्रकला के विराट आकाश में आज एक दीप्त नक्षत्र विलीन हो गया। डॉ. लक्ष्मीनारायण भावसार का निधन केवल एक कलाकार का अवसान नहीं, बल्कि एक ऐसी सृजन-परंपरा का विराम है जिसने रंगों के माध्यम से जीवन की सूक्ष्मतम संवेदनाओं को स्वर दिया। मालवांचल की मिट्टी में जन्मे इस साधक ने अपनी तूलिका से जनजीवन, चेतना, चेष्टा, लोक रीति, इतिहास और प्रकृति-सबको एक ही कैनावास धरातल पर संयोजित किया।

1 सितम्बर 1939 को शाजापुर में जन्मे डॉ. भावसार ने कला को प्रारम्भ से ही साधना का रूप दिया। सर जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स मुंबई से स्नातक और विक्रम यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर उन्होंने शास्त्रीय अनुशासन को आत्मसात किया। तत्पश्चात इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से शोधोपाधि अर्जित कर अपने ज्ञान को अकादमिक गहराई प्रदान की। वे केवल कलाकार नहीं, विचारशील अध्येता और प्रतिबद्ध शिक्षक भी थे। शासकीय महाविद्यालय में ड्राइंग एवं पेंटिंग के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष के रूप में उन्होंने असंख्य विद्यार्थियों को सृजन की दीक्षा दी। उनकी शिष्य-परंपरा आज भी उनके रंग-संस्कारों को आगे बढ़ा रही है।

उनकी कृतियों में मालवा अंचल का सांस्कृतिक बोध अपनी सम्पूर्ण आभा के साथ उपस्थित होता है। लोक-संस्कृति की गरिमा, ग्रामीण जीवन की सहजता और प्रकृति की नीरव लय इन सबका अद्भुत सामंजस्य उनके कैनवास पर दिखता है। उनकी चर्चित कृति 'अस्सी घाट' में वाराणसी के प्राचीन घाट की सांस्कृक्तिक सुबह जैसे रंगों में साँस लेती प्रतीत होती है। वहाँ केवल दृश्य नहीं, एक आध्यात्मिक कंपन है; केवल स्थापत्य नहीं, समय का प्रवाह है। उनके रंग बोलते नहीं, गुनगुनाते हैं, उनकी रेखाएं ठहरी नहीं, प्रवाहित होती हैं।

मैंने उन्हें खजुराहो नृत्य समारोह में खजुराहो के मंदिरों का सौंदर्य और तानसेन समारोह में ताना री री रचते निकट से देखा। वे सृजन के क्षणों में अद्भुत तल्लीनता से भर उठते थे। आसपास का कोलाहल मानो उनसे दूर हो जाता और वे अपने कैनवास पर उस क्षण की आत्मा को पकड़ लेते। उनके व्यक्तित्व में विनम्रता की वह शीतल छाया थी जो बड़े कलाकारों की पहचान होती है। वे संवाद में सरल, व्यवहार में आत्मीय और दृष्टि में अत्यंत गंभीर थे। कला पर चर्चा करते समय वे परंपरा की जड़ों का स्मरण कराते हुए आधुनिकता के विस्तार की बात करते थे, मानो अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु स्वयं खड़े हों।

उनकी प्रदर्शनी देश-विदेश की दीर्घाओं में सराही गई। दिल्ली, मुंबई, राजस्थान, वाराणसी से लेकर विदेशों तक उनकी कृतियाँ संग्रहित हैं। परंतु पुरस्कार और प्रशंसा उनके लिए लक्ष्य नहीं थे; वे तो रंगों के माध्यम से जीवन के सत्य को छूने की चेष्टा में रत रहते थे। उनके चित्र दर्शक को केवल आकर्षित नहीं करते, भीतर उतरकर प्रश्न भी जगाते हैं। वे मानते थे कि कला समय का दस्तावेज भी है और आत्मा का दर्पण भी इसीलिए उनकी रचनाएँ सजावटी नहीं, संवेदनात्मक और विचारोत्तेजक थीं।

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनकी तूलिका से उपजी रोशनियाँ भारतीय चित्रकला के क्षितिज पर दीर्घकाल तक आलोक बिखेरती रहेंगी। उनके जाने से एक रिक्तता अवश्य बनी है, किंतु यह रिक्तता उनके सृजन से भरी हुई है। वे देह से विदा हुए हैं, पर उनकी कला जीवित है- प्रत्येक रंग-स्पर्श में, प्रत्येक रेखा-संयोजन में, प्रत्येक सांस्कृतिक संकेत में। 

डॉ. लक्ष्मीनारायण भावसार का जीवन हमें सिखाता है कि कला केवल दृश्य नहीं, दृष्टि है; केवल आकार नहीं, आस्था है; केवल कौशल नहीं, साधना है। उनकी स्मृति भारतीय कला-जगत के लिए प्रेरणा-स्रोत बनी रहेगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिजनों, शिष्यों तथा कला-प्रेमियों को यह वियोग सहने की शक्ति प्रदान करे। उनके रंग कभी फीके नहीं पड़ेंगे वे हमारी सांस्कृतिक चेतना में सदा उज्ज्वल बने रहेंगे।