राम नवमी पर जानिए श्रीराम के आदर्श, मर्यादा और धर्म के संदेश की प्रासंगिकता। आधुनिक जीवन में श्रीराम के मूल्यों को अपनाने की जरूरत क्यों बढ़ी।
गिरीश्वर मिश्र
शाश्वत मूल्य-बोध के साकार विग्रह स्वरूप श्रीराम भारतीय संस्कृति के ऐसे लोक-विश्रुत आदर्श हैं, जो पढ़े-लिखे और अनपढ़ समाज के हर वर्ग के लिए युगों-युगों से प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। साहित्य जगत ने राम-कथा में कल्पना और रस का अजस्र स्रोत खोजा है और पिछली पीढ़ियों के कवियों और लेखकों ने इसे अपने सृजन का आधार बनाया। साहित्य की यह परंपरा आज भी अविरल रूप से जारी है। इस परंपरा का स्पष्ट संदेश है कि पृथ्वी पर श्रीराम का आविर्भाव मात्र लोक-कल्याण के लिए हुआ था। उन्हें अयोध्या के राजा के पुत्र दशरथनंदन के रूप में मानवीय भाव में प्रतिष्ठित करते हुए भारतीय मनीषा मनुष्यता की चुनौतियों, उसके द्वंद्वों, संघर्षों और उपलब्धियों से परिचित कराती है।
महर्षि वाल्मीकि को राम-कथा को लोक तक पहुँचाने वाले प्रथम रचनाकार का सम्मानित दर्जा प्राप्त है। वाल्मीकि रामायण की प्राचीनता भी इस तथ्य की पुष्टि करती है। इसमें वर्णित श्रीराम की विलक्षण गाथा मनुष्य को सत्य के चरम साक्षात्कार के लिए निरंतर प्रेरित करती है। यह अलौकिक कथा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि मनुष्य जीवन में उत्थान और पतन दोनों प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक हैं। जीवन में दिन और रात की तरह उत्कर्ष और अपकर्ष का होना सहज है। इनके बीच संतुलन के लिए धर्मानुकूल कर्तव्य पालन ही एकमात्र साधन है। यही वह तत्व है जो जीवन की सीमाओं को संभावनाओं में बदल देता है।
श्रीराम का संपूर्ण जीवन विभिन्न भूमिकाओं के द्वंद्वों और उनसे जुड़ी चुनौतियों से भरा हुआ है। पुत्र, शिष्य, पति, भाई, मित्र, योद्धा और राजा हर रूप में उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया। एक प्रतापी राजा के युवराज होने के बावजूद उनके धैर्य की परीक्षा जीवन भर होती रही। रामायण के अनेक पात्रों में उनके प्रति ईर्ष्या, द्वेष और संदेह भी देखने को मिलता है। राक्षसराज रावण के रूप में उनके सामने अत्यंत जटिल चुनौती उपस्थित होती है। ज्ञानी और समृद्ध होने के बावजूद रावण का अधर्म उसे श्रीराम का शत्रु बना देता है। वह शौर्य में अद्वितीय था, जिसके कारण राम-रावण युद्ध अतुलनीय बन गया “रामरावणयोः युद्धो रामरावणयोः इव।” अंततः अधर्म के मार्ग पर चलने का परिणाम विनाशकारी हुआ और लंका का पतन हो गया।
जीवन में आने वाले संघर्षों के समाधान के लिए श्रीराम एक नीतिज्ञ के रूप में अपनी दैहिक, दैविक और भौतिक सभी शक्तियों का समुचित संयोजन करते हैं। वे नर हों या वानर, सभी का सहयोग लेकर धर्म की रक्षा का प्रयास करते हैं। वे स्वयं मर्यादा का पालन करते हैं और उसके उल्लंघन को दंडित करना उनकी नीति है। उनका धर्म-भाव परिस्थितियों के अनुसार गतिशील है, जो उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण भी है। यही वजह है कि भारत के साथ-साथ कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी श्रीराम की व्यापक प्रतिष्ठा है। उनकी कथा जन-स्मृति का हिस्सा बन चुकी है, जिसका प्रमाण विभिन्न भाषाओं में राम-कथा का सतत लेखन, मंचन और गायन है।
अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर के लोकार्पण के बाद करोड़ों श्रद्धालुओं का आगमन इस बात की पुष्टि करता है कि श्रीराम भारतीय मानस में गहराई से रचे-बसे हैं। रामायण आज भारत की लगभग हर भाषा में उपलब्ध है और इसकी परंपरा अत्यंत प्राचीन है। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार कथानक में बदलाव स्वाभाविक है, क्योंकि राम जन-जन के हैं। वाचिक परंपरा के कारण भी समय के साथ इसमें परिवर्तन होते रहे हैं। अवधी भाषा में रचित गोस्वामी तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ पिछले पाँच सदियों से लोकजीवन में प्रतिष्ठित है और राम-कथा के प्रसार में इसकी विशेष भूमिका रही है।आज के समय में जब वैश्विक स्तर पर चुनौतियाँ बढ़ रही हैं, जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं जल, वायु और अन्न पर संकट गहराता जा रहा है। ऊर्जा की बढ़ती खपत के कारण पेट्रोल और गैस जैसे संसाधनों की मांग लगातार बढ़ रही है। प्रभावशाली देश अपने हितों के लिए नियमों और मानवीय मूल्यों की अनदेखी कर रहे हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन भी कई बार प्रभावहीन दिखाई देते हैं। यह परिदृश्य मनुष्यता को अपने विचार और कर्म पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करता है।
रामायण धर्म को जीवन का सार बताता है “धर्मादर्थः प्रभवति, धर्मात् प्रभवते सुखम्।” अर्थात धर्म से ही अर्थ, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। श्रीराम का धर्म-भाव आदर्श, मर्यादा, धैर्य, सहनशीलता, त्याग, समानता, प्रेम, विनम्रता और क्षमा जैसे गुणों में प्रकट होता है। इन मूल्यों को आत्मसात करने में ही मानवता का भविष्य निहित है। आइए, हम सभी श्रीराम के इन आदर्शों को अपने जीवन में स्थापित करने का संकल्प लें।