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Opposition Disruptions Raise Questions on Parliame

संसदीय कार्यवाही: संसदीय गरिमा को ठेस पहुंचाता विपक्ष

बजट सत्र के दौरान संसद में लगातार हंगामे से संसदीय मर्यादा पर सवाल। क्या विरोध का यह तरीका लोकतंत्र को मजबूत करता है?


संसदीय कार्यवाही संसदीय गरिमा को ठेस पहुंचाता विपक्ष

आदर्श तिवारी

संसद भवन केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का पवित्र मंदिर है। यहां देश की आवाज गूंजती है, नीतियां बनती हैं और जनता की आकांक्षाओं को मूर्त रूप मिलता है। दुर्भाग्य से इस बजट सत्र के दौरान जो दृश्य देखने को मिल रहे हैं, वे न केवल निराशाजनक हैं, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं पर भी गहरे सवाल खड़े करते हैं। विपक्षी दलों द्वारा सदन की कार्यवाही को बार-बार अवरुद्ध करना और फिर सार्वजनिक मंचों पर स्वयं को लोकतंत्र का संरक्षक बताना, यह विरोधाभास समकालीन राजनीति की एक बड़ी विडंबना बनकर उभरा है।

गौरतलब है कि आम बजट पर गंभीर चर्चा और विमर्श की आवश्यकता होती है, लेकिन ठीक उसी समय संसद में अवरोध की राजनीति हावी हो जाती है। प्रतिदिन नए मुद्दे, नई मांगें और निरंतर हंगामा यह सिलसिला इतना सुनियोजित प्रतीत होता है कि लगता है विपक्ष का असली मकसद बहस करना नहीं, बल्कि येन-केन-प्रकारेण संसद को ठप करना है। सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर संसदीय विरोध की यह शैली क्यों अपनाई जा रही है? क्या बजट में गरीबों, किसानों, युवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए किए गए प्रावधानों पर सार्थक चर्चा नहीं होनी चाहिए?

नेता प्रतिपक्ष की भूमिका इस पूरे प्रकरण में विशेष रूप से चर्चा का विषय बनी रही। नेता प्रतिपक्ष का पद अत्यंत गरिमामय और जिम्मेदारीपूर्ण होता है। इस पद की गरिमा यह अपेक्षा करती है कि सरकार की आलोचना संसदीय मर्यादा के दायरे में रहकर, तर्कों और तथ्यों के आधार पर की जाए। लेकिन इस सत्र में कई बार ऐसी परिस्थितियां बनीं, जहां संसदीय परंपराएं तार-तार होती नजर आईं।उल्लेखनीय है कि पहले एक पूर्व सेना प्रमुख की अप्रकाशित पुस्तक का हवाला देकर राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल उठाने का प्रयास किया गया, जिसे स्पीकर ने संसदीय नियमों के तहत अस्वीकार कर दिया। सवाल उठता है कि क्या नेता प्रतिपक्ष स्वयं को संसदीय नियमों से ऊपर मान बैठे हैं? इसके बाद जो घटना हुई, वह और भी गंभीर थी। केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को संसद परिसर में सार्वजनिक रूप से अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया गया। यह घटना महज व्यक्तिगत हमला नहीं थी। एक सिख मंत्री के प्रति की गई यह टिप्पणी पूरे समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली मानी गई।

सदन के भीतर और बाहर इस घटना की व्यापक निंदा हुई। यह निस्संदेह संसदीय शिष्टाचार का घोर उल्लंघन था। ध्यान देने योग्य है कि जो नेता अपने भाषणों में उच्च नैतिक मानकों की बात करते हैं, उनके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि उनका आचरण भी उन्हीं मानकों पर खरा उतरे।विरोध के तरीकों में तथ्यों की बजाय राजनीतिक बयानबाजी अधिक दिखाई देती है। मुद्दे उठाए तो जाते हैं, लेकिन जब सरकार की ओर से विस्तृत उत्तर देने का प्रयास होता है, तब या तो सदन छोड़ दिया जाता है या शोर-शराबे में जवाब को दबाने की कोशिश की जाती है। विपक्ष की यह रणनीति साफ नजर आती है आरोप लगाओ, मीडिया कवरेज पाओ और फिर उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना आगे बढ़ जाओ।

जब शब्दों से विरोध पर्याप्त नहीं लगता, तो कभी-कभी शारीरिक प्रदर्शन का सहारा लिया जाता है। कुछ दिन पहले लोकसभा में जो दृश्य सामने आए, वे भारतीय संसदीय इतिहास में दुर्भाग्यपूर्ण माने जाएंगे। विवाद के बाद कुछ सांसद सदन के बीचोंबीच पहुंच गए, सचिव जनरल की टेबल पर चढ़ गए और स्पीकर की कुर्सी की ओर कागज फेंके गए। गौरतलब है कि स्पीकर की कुर्सी किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरी संसद और लोकतंत्र की प्रतिनिधि होती है। यह केवल एक पद नहीं, बल्कि संवैधानिक गरिमा का प्रतीक है।इस प्रायोजित अराजकता के बाद लोकसभा स्पीकर ने आठ सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए निलंबित कर दिया। ध्यान देने योग्य है कि जब जनप्रतिनिधि टेबल पर चढ़कर स्पीकर की ओर कागज फेंकते हैं, तो यह महज विरोध नहीं रह जाता, बल्कि संसदीय अनुशासन की मूल भावना के विरुद्ध चला जाता है।

इस पूरे प्रकरण में एक दोहरापन साफ दिखाई देता है। मीडिया के सामने लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संसदीय परंपराओं की बातें की जाती हैं, लेकिन सदन में जब वास्तविक बहस का अवसर मिलता है, तब अवरोध का रास्ता अपनाया जाता है। निलंबन के बाद विपक्षी नेताओं ने दावा किया कि वे अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या संसदीय अनुशासन का उल्लंघन जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी में आता है?उल्लेखनीय है कि सरकार की ओर से लगातार यह प्रयास किए गए कि संसद में सार्थक बहस हो। कई बार अपील की गई कि सदन को चलने दिया जाए और जनता के मुद्दों पर चर्चा की जाए, लेकिन विरोध की हठधर्मिता जारी रही। इससे यह संकेत मिलता है कि शायद कुछ लोग नहीं चाहते कि जनता को पता चले कि वास्तव में क्या काम हुआ है और आम नागरिक के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं।

गौरतलब है कि संसद में एक घंटे की कार्यवाही पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। यह राशि करदाताओं की है। जब सदन ठप होता है, तो जनता के संसाधनों की बर्बादी होती है। हर वह बहस जो नहीं होती और हर वह विधेयक जो समय पर पारित नहीं होता, उसका सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है।लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं है। लोकतंत्र का मतलब है जिम्मेदारीपूर्वक अपनी भूमिका निभाना। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर नेता की जवाबदेही जनता के प्रति है। यदि नीतियों में कोई कमी है, तो उसे तर्कों से सिद्ध किया जाना चाहिए। यदि बजट में खामी है, तो उस पर आंकड़ों के साथ चर्चा होनी चाहिए और विकल्प सुझाए जाने चाहिए। यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारी संसदीय परंपराएं समृद्ध और सम्मानजनक रही हैं, लेकिन जब जनप्रतिनिधि स्वयं इन परंपराओं का उल्लंघन करते हैं, तो यह चिंताजनक हो जाता है। संसद का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। कोई भी राजनीतिक दल, चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में, संसदीय मर्यादा का पालन करने के लिए बाध्य है।

लोकतंत्र में असहमति की पूरी आजादी है, लेकिन असहमति को अभद्रता में बदलना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि विपक्षी दल अपने आचरण पर पुनर्विचार करें। यदि नीतियों से असहमति है, तो सदन में रहकर तर्कों के साथ अपनी बात रखी जाए।जनता यह देखना चाहती है कि उसके प्रतिनिधि सदन में क्या बहस कर रहे हैं, न कि यह कि वे कैसे हंगामा कर रहे हैं। जनता ने प्रतिनिधियों को अपनी समस्याएं उठाने के लिए चुना है, अराजकता फैलाने के लिए नहीं। संसद राजनीतिक दलों का युद्धक्षेत्र नहीं, बल्कि देश की आशाओं और आकांक्षाओं का केंद्र है। जब इस पवित्र मंच की गरिमा को ठेस पहुंचती है, तो यह पूरे राष्ट्र के लिए चिंता का विषय बन जाता है।

सभी राजनीतिक दलों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में सहयोग करना होगा। देश की जनता ऐसे प्रतिनिधि चाहती है जो उसकी आवाज बनें, न कि ऐसे जो संसद को प्रदर्शन का मंच बना दें। संसदीय लोकतंत्र की रक्षा सबकी साझा जिम्मेदारी है और इस जिम्मेदारी को निभाना हर राजनीतिक दल का संवैधानिक कर्तव्य है।

 

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