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NEET Paper Leak Raises Big Questions

नीट : साख बहाल करने का सवाल

NEET पेपर लीक ने एक बार फिर NTA की विश्वसनीयता और देश की परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा के व्यापारीकरण और कोचिंग संस्कृति पर भी गंभीर चिंता जताई जा रही है।


नीट  साख बहाल करने का सवाल

गिरीश्वर मिश्र

यह देश का दुर्भाग्य है कि आज के माहौल में प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में किसी न किसी तरह सेंध लगाकर परीक्षा-परिणाम को प्रभावित करने और जबरदस्ती अपने पक्ष में कराने के मामले अब लोगों को चौंकाते नहीं हैं। परीक्षा के पेपर लीक की घटनाएं पिछले दशकों में कई प्रकार की परीक्षाओं में सामने आती रही हैं। यदि इन घटनाओं को अपराध के रूप में देखें, तो स्पष्ट हो जाता है कि उनसे जुड़े अपराधियों पर कानूनी कार्रवाई इतनी जटिल और लंबी होती है कि समय पर कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाता। अधिकांश मामलों में सबूतों के अभाव में अपराधियों को दंडित करना लगभग असंभव साबित होता रहा है।

मेडिकल प्रवेश परीक्षा यानी ‘नीट’ में पेपर लीक की ताजा घटना ने एक बार फिर पूरे देश, विशेषकर युवा और किशोर वर्ग को झकझोर दिया है। गौरतलब है कि प्रवेश परीक्षाओं की पुरानी व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से एनडीए सरकार ने वर्ष 2017 में राष्ट्रीय स्तर की स्वायत्त संस्था ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ (एनटीए) की स्थापना का निर्णय लिया था। परीक्षाओं के प्रकार और परीक्षार्थियों की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुए यह सुधार बेहद आवश्यक माना गया।

एनटीए का उद्देश्य उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप एक विश्वसनीय व्यवस्था स्थापित करना था। युवा प्रधान देश में परीक्षा व्यवस्था की विकराल होती चुनौती के समाधान के रूप में इस पहल को रामबाण माना गया। विकसित भारत के लिए योग्य मानव संसाधन तैयार करने में इस एजेंसी की महत्वपूर्ण भूमिका तय की गई। इसके संचालन के लिए आईएएस स्तर के डीजी, अध्यक्ष, निदेशक, संयुक्त निदेशक सहित उच्चस्तरीय प्रबंधकीय ढांचा तैयार किया गया। साथ ही निगरानी के लिए एक अधिकार-संपन्न प्रबंध समिति का भी गठन किया गया।

सरकार और आम जनता दोनों को उम्मीद थी कि पेशेवर तरीके से काम करने वाली एनटीए परीक्षा व्यवस्था में जमीनी बदलाव लाएगी। आशा थी कि यह अखिल भारतीय संस्था प्रवेश परीक्षाओं को निष्पक्ष, विश्वसनीय, समयबद्ध और उच्च स्तरीय तरीके से संपन्न कराएगी। परीक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार के लिए प्रतिबद्ध सरकार को इस संस्था से बड़ी अपेक्षाएं थीं।लेकिन जिस प्रकार परीक्षा संचालन में लगातार चूक सामने आ रही है, उससे कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। परीक्षा की शुचिता और मानकों को बनाए रखने की जिम्मेदारी से एनटीए किसी भी स्थिति में बच नहीं सकता। पेपर लीक की लगातार घटनाओं के कारण एनटीए की कार्यप्रणाली अब संदेह के घेरे में आ गई है। संभवतः संस्था को पूरी तैयारी के साथ लागू करने की प्रक्रिया अभी अधूरी रही है।

स्मरणीय है कि एनटीए व्यवस्था से पहले प्रवेश परीक्षाओं का विकेंद्रीकरण था। धीरे-धीरे लगभग सभी प्रमुख प्रवेश परीक्षाएं एनटीए को सौंप दी गईं। इससे उसके कार्यक्षेत्र का विस्तार इतना बढ़ गया है कि शायद वह उसकी संस्थागत क्षमता से बाहर होता जा रहा है।पेपर लीक की घटनाएं यह भी संकेत देती हैं कि मुख्यधारा की औपचारिक शिक्षा तेजी से अपनी साख खो रही है। शिक्षा का व्यापारीकरण कई रूपों में फैल रहा है। इसी का एक बड़ा हिस्सा कोचिंग उद्योग है, जो महामारी की तरह विस्तार ले चुका है। आज यह एक विशाल समानांतर शिक्षा व्यवस्था का रूप धारण कर चुका है।

अनुमान है कि जेईई, नीट, नेट जैसी परीक्षाओं की कोचिंग का बाजार हजारों करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। यह लाभ का ऐसा व्यापार बन गया है, जिसमें लगभग 95 प्रतिशत स्कूली बच्चे किसी न किसी रूप में शामिल हैं। अब स्कूलों और कॉलेजों की औपचारिक शिक्षा की जगह कोचिंग आधारित तैयारी का चलन तेजी से बढ़ रहा है। कोटा, दिल्ली, पुणे और पटना जैसे शहर कोचिंग उद्योग के बड़े केंद्र बन चुके हैं।माता-पिता भी अब कोचिंग को बच्चों के भविष्य के लिए अनिवार्य निवेश मानने लगे हैं। यह स्थिति विद्यालयों में चल रही औपचारिक शिक्षा की कमजोर होती गुणवत्ता को उजागर करती है।

इन सबका परिणाम यह है कि पेपर लीक और नकल जैसी घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। ऐसे अपराधों पर लगाम लगाने के प्रयास अब तक प्रभावी साबित नहीं हुए हैं। सच्चाई यह है कि देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसी घटनाएं लगातार होती रही हैं और उनका दायरा बढ़ता जा रहा है।दुस्साहस, बेईमानी और तिकड़म के जरिए सफलता हासिल करने की मानसिकता मजबूत होती जा रही है। पढ़ाई से अधिक लोग परीक्षा में अच्छे अंक लाने के शॉर्टकट खोजने में रुचि लेने लगे हैं। सामाजिक परिवेश में परिश्रम और योग्यता का महत्व भी धीरे-धीरे कम होता दिख रहा है।लोगों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि केवल योग्यता, चरित्र और कार्यकुशलता सफलता या नौकरी के लिए पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उसके लिए अतिरिक्त ‘उद्योग’ भी करने पड़ते हैं।

इंटर के बाद स्नातक स्तर पर प्रवेश के लिए एनटीए की परीक्षाओं के अंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। पढ़ाई और ज्ञान की जगह अब परीक्षा में प्राप्त अंक अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। लगातार बढ़ती बेरोजगारी के कारण प्रतिस्पर्धा का दबाव छात्रों पर बढ़ता जा रहा है।हमारी शिक्षा व्यवस्था तेजी से परीक्षणमुखी होती जा रही है, जिसमें ज्ञानार्जन हाशिये पर चला गया है। बहुविकल्पीय प्रश्नों (एमसीक्यू) पर आधारित यांत्रिक परीक्षा प्रणाली का बोलबाला बढ़ रहा है। इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि यह पद्धति सोच-विचार और सृजनात्मकता की बजाय रटंत शिक्षा को बढ़ावा देती है।

उत्सुकता, शोध और खोज की प्रवृत्ति की जगह दोहराव और गैर-सर्जनात्मक मानसिकता को प्रोत्साहन मिल रहा है। शिक्षा और परीक्षा दोनों की साख दांव पर लगी हुई है। नई शिक्षा नीति ने इस समस्या की ओर संकेत जरूर किया है, लेकिन आवश्यक बदलाव अभी दूर की कौड़ी नजर आते हैं। युवा वर्ग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए व्यापक और प्रभावी सुधार को हमारी प्राथमिकता बनाना होगा।

 

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