Breaking News
  • चांदी ₹9,658 गिरकर ₹2.36 लाख किलो पर आई: 10 दिन में ₹27 हजार की गिरावट; सोना ₹4,090 टूटा, 10 ग्राम की कीमत ₹1.48 लाख
  • पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर एयरस्ट्राइक की: 11 बच्चों समेत 13 की मौत, 14 महिलाएं घायल
  • हार्दिक पंड्या अफगानिस्तान वनडे सीरीज से बाहर, फिटनेस टेस्ट के दौरान चोट लगी
  • ईरान का बहरीन, कुवैत, जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर हमला, अमेरिकी एयरस्ट्राइक के जवाब में कार्रवाई
  • ममता बनर्जी की करीबी रहीं सुष्मिता देव ने बुधवार को राज्यसभा सांसद से इस्तीफा दिया

होम > विशेष

‘गन-तंत्र’ से गणतंत्र की ओर बढ़ते नक्सल प्रभावित क्षेत्र

अराधिता सिंह


‘गन-तंत्र’ से गणतंत्र की ओर बढ़ते नक्सल प्रभावित क्षेत्र

कई दशकों तक मध्य भारत के बड़े हिस्से विशेषकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में एक अजीब दोहरी वास्तविकता मौजूद रही। कागज़ों पर तो भारतीय राज्य मौजूद था, लेकिन ज़मीनी स्तर पर जीवन का हर पहलू माओवादी नियंत्रण और फरमानों से संचालित होता था। सरकार और शासन के प्रतीक- सड़कें, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र वहीं समाप्त हो जाते थे जहाँ से सुरक्षा जोखिम वाले क्षेत्र शुरू होते थे। जिला मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर बसे गाँवों तक जाने में भी अधिकारी भय महसूस करते थे। इन इलाकों में राज्य की अनुपस्थिति ने एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया था, जिसे नक्सलियों ने अपने समानांतर कर, न्याय और निगरानी तंत्र से भर दिया।

परन्तु वर्ष 2025 में यह परिदृश्य तेजी से बदला, जब भारत सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सल आंदोलन के उन्मूलन का स्पष्ट लक्ष्य तय किया। इसके बाद सुरक्षा अभियानों, प्रशासनिक पहुँच और विकास योजनाओं के समन्वित प्रयासों ने उन इलाकों की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी, जो लंबे समय तक हिंसा और अलगाव के प्रतीक बने रहे। लेकिन जब राज्य वास्तव में बेहतर सुरक्षा उपस्थिति, प्रशासनिक पहुँच या लक्षित विकास के माध्यम से लौटना शुरू करता है, तो वह परिवर्तन केवल संस्थागत नहीं होता, बल्कि सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और गहराई से राजनीतिक भी होता है। भय-आधारित अस्तित्व से निकलकर पूरे क्षेत्र धीरे-धीरे नागरिकता की भावना की ओर बढ़ने लगते हैं। राज्य की इस पुनः वापसी के दौरान क्या घटित होता है, इसे समझना दीर्घकालिक प्रतिरोध-विरोधी और सुशासन नीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सुरक्षा, विश्वास और विकास ने बदली तस्वीर

केंद्र की मोदी सरकार की नक्सल विरोधी नीति की सफलता के चलते वर्तमान समय में बस्तर, गढ़चिरौली, झारखंड और ओडिशा के कई जिलों में अग्रिम सुरक्षा शिविरों की स्थापना, आरसीपीएलडब्ल्यूईए जैसी योजनाओं के तहत सड़क संपर्क और समन्वित नागरिक प्रशासन ने ग्रामीणों की जीवन-स्थितियों को बदलना शुरू कर दिया है। जो पुलिस थाने कभी केवल कागज़ों तक सीमित थे, वे अब कार्यशील हैं। दशकों में पहली बार ब्लॉक अधिकारी और स्वास्थ्यकर्मी अंदरूनी गाँवों तक नियमित रूप से पहुँच पा रहे हैं।

राज्य की यह पुनः एंट्री केवल संस्थागत नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और राजनीतिक परिवर्तन भी है। पूरा भूगोल भय से संचालित जीवन से निकलकर नागरिकता के मजबूत होते एहसास की ओर बढ़ने लगता है। इसी संक्रमण काल में माओवादियों की वर्षों पुरानी समानांतर सत्ता कमजोर पड़ने लगती है।

भारत के एक बड़े भू-भाग में दशकों तक नक्सली ही वास्तविक सत्ता थे। लेकिन अब जैसे-जैसे राज्य पूर्व नक्सल-प्रभावित इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, जन अदालत प्रणाली काफी कमजोर हो चुकी है। ग्रामीण फिर से औपचारिक संस्थाओं तक पहुँच बना रहे हैं। व्यापार, आवागमन और दैनिक जीवन पर माओवादियों द्वारा लगाए गए कठोर प्रतिबंध धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। भय से उपजा पालन अब आशा और विश्वास में बदलने लगा है।

स्थायी सुरक्षा शिविर नक्सली क्षेत्रों में “राज्य की वापसी” का पहला स्पष्ट संकेत बनते हैं। इनके कारण आवाजाही बहाल होती है और वे सड़कें, जिन पर कभी नक्सली गश्त लगाते थे या जिन्हें अवरुद्ध कर दिया जाता था, अब सुरक्षित हो रही हैं। जैसे-जैसे आवाजाही बढ़ती है, वैसे-वैसे त्योहार, साप्ताहिक हाट और सामुदायिक आयोजन फिर से लौटने लगते हैं। जो स्थानीय नेतृत्व वर्षों तक भय के कारण मौन था, उसकी आवाज़ फिर सुनाई देने लगती है। सार्वजनिक विश्वास और प्रशासनिक उपस्थिति लौटने के साथ ही एक मजबूत प्रतिवादात्मक नैरेटिव को भी जगह मिलने लगती है।

इन क्षेत्रों में अब सड़कें, पुल, मोबाइल टावर और बिजली नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाओं का निर्माण हो रहा है, जिनका लंबे समय तक अभाव था। आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य उपकेंद्र और स्कूल वर्षों बाद फिर से संचालित होने लगे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच संभव हुई है, जिससे उस वंचना के चक्र को तोड़ा जा रहा है जिसका लाभ उग्रवादी उठाते थे।

छत्तीसगढ़ की ‘नियाद नेल्लानार’ पहल, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना और विभिन्न कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम अब उन गाँवों तक पहुँच रहे हैं जो पहले पूरी तरह कटे हुए थे। इन विकासात्मक प्रयासों ने जनमत को केवल सुरक्षा अभियानों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बदला है।

राज्य की वापसी के साथ स्थानीय बाजार भी पुनर्जीवित हो रहे हैं। साप्ताहिक हाट फिर से गुलजार हैं। व्यापारी अब बिना भय के गाँवों तक पहुँच रहे हैं, जो कई वर्षों से संभव नहीं था। वन उपज का संग्रह अब संगठित और उचित पारिश्रमिक के साथ हो रहा है, जिससे आदिवासियों को अपनी उपज का सही मूल्य मिल रहा है, न कि माओवादी उगाही का शिकार होना पड़ रहा है।

जो युवा कभी दलम दस्तों को ही अपना भविष्य मानते थे, वे अब शहरों में रोजगार, व्यावसायिक प्रशिक्षण और सुरक्षा बलों में भर्ती की ओर देख रहे हैं। नई आधारभूत संरचना के साथ छोटे व्यवसाय जैसे कि मैकेनिक की दुकानें, मोबाइल रिपेयर सेंटर, परिवहन सेवाएँ और स्थानीय विक्रेता आदि उभर रहे हैं। जो क्षेत्र कभी केवल जीविका तक सीमित था, वह अब विकास के बारे में सोचने लगा है।

लंबे समय तक आदिवासी समुदाय राज्य को दूरस्थ, दंडात्मक या शोषणकारी मानता रहा। राज्य की पुनः वापसी इस संबंध को नए सिरे से स्थापित करने का अवसर दे रही है। अब वन अधिकारों को मान्यता मिल रही है और सामुदायिक दावों को स्वीकृति मिलने लगी है। सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएँ और स्थानीय त्योहार फिर से अपनी जगह बना रहे हैं, जिससे सम्मान और पहचान की भावना मजबूत हो रही है।

जैसे-जैसे राज्य की उपस्थिति मजबूत हो रही है, वैसे-वैसे माओवादी सैन्य ढाँचा भी बिखरने लगा है। स्थानीय मिलिशिया इकाइयाँ अपने सुरक्षित प्रशिक्षण क्षेत्रों और आवाजाही के रास्ते खो रही हैं। वरिष्ठ नेता गहरे जंगलों में सिमटने या राज्य सीमाओं के पार जाने को मजबूर हो रहे हैं। युवाओं के शिक्षा, रोजगार और गतिशीलता की ओर बढ़ने से भर्ती का आधार तेजी से घट रहा है। संगठन के भीतर अविश्वास, आंतरिक संघर्ष और वैचारिक थकान भी बढ़ रही है। इस प्रकार आंदोलन किसी बड़े सैन्य पराजय से नहीं, बल्कि अपनी प्रासंगिकता के धीरे-धीरे और स्थायी रूप से समाप्त होने से कमजोर हो रहा है।

सबसे बड़ा परिवर्तन लोगों की मानसिकता में दिखाई देता है। अब ग्रामीणों को राशन या दवा के लिए 20 किलोमीटर जंगलों से होकर नहीं जाना पड़ता। वे अपने अधिकारों—मजदूरी, राशन और सरकारी लाभ—की मांग करने लगे हैं, जो पहले उनकी पहुँच से बाहर थे। बच्चे अब स्कूलों में शिक्षकों को देख रहे हैं। महिलाएँ बिना भय और उग्रवादियों की अनुमति के स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच पा रही हैं।

पर चुनौतियाँ नहीं हैं कम...

जो पीढ़ी कभी गोलियों की आवाज़ के बीच बड़ी हुई, वह अब अवसरों के बीच बढ़ने लगी है। जब राज्य लौटता है, तब लोकतंत्र केवल एक वादा नहीं रहता, बल्कि लोगों के जीवन में दिखाई देने लगता है। हालाँकि चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। नक्सली अवशेष अपनी मौजूदगी दिखाने के लिए छिटपुट हमले कर सकते हैं। भय इतनी जल्दी समाप्त नहीं होता और समुदाय का सहयोग भी धीरे-धीरे ही लौटता है। आत्मसमर्पण कर चुके कैडरों का पुनर्वास भी एक जटिल और निरंतर प्रक्रिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विकास प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि निरंतर होना चाहिए। एकबारगी हस्तक्षेप सुशासन का विकल्प नहीं बन सकते। स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य रोजमर्रा के स्तर पर कितनी निरंतरता और संवेदनशीलता से अपनी सेवाएँ उपलब्ध कराता है।

भारत के लिए यह केवल एक सुरक्षा सफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गहराई तक पहुँच का क्षण है। असली जीत तब मानी जाएगी जब बस्तर, गढ़चिरौली या झारखंड के दूरस्थ गाँवों का नागरिक भी स्वयं को उतना ही जुड़ा, सुरक्षित और सुना हुआ महसूस करे जितना देश के किसी बड़े शहर का नागरिक। अंततः, जहाँ राज्य निरंतर उपस्थित रहता है और सम्मानजनक जीवन के अवसर देता है, वहाँ उग्रवाद अपनी प्रासंगिकता खो देता है।

अराधिता सिंह, रिसर्च फेलो, इंडिया फाउंडेशन

Related to this topic: