नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं को 33% आरक्षण देकर राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे समानता और सशक्तिकरण को नई गति मिलने की उम्मीद है।
धर्मेन्द्र सिंह लोधी
मानव सभ्यता का उत्कर्ष, अस्तित्व, विकास और उसका गतिमान चरित्र दो स्तंभों पर टिका है एक स्त्री और दूसरा पुरुष। वास्तव में स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं और इसी रूप में मानव जीवन की सार्थकता है। निर्विवाद रूप से मानव जाति का उत्कर्ष और अस्तित्व नारी जाति की सृजनशीलता पर आधारित है। अपने सृजनशील गुण के कारण ही भारत की महान सनातन संस्कृति में स्त्री को पूजनीय और वंदनीय माना गया है। हमारे शास्त्र कहते हैं.
स्त्रीणां देवत्वं रत्नेषु च, योषितत्वं महत्सदा।
न स्त्रीणामधिकं किंचित्, पवित्रं जगति क्वचित्।।
अर्थात स्त्रियों को देवताओं और रत्नों के समान माना जाता है। स्त्रियां सर्वदा महान होती हैं। संसार में स्त्री से बढ़कर पवित्र कुछ भी नहीं है।
इसी मूल भावना का समावेश भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी किया गया है। भारतीय लोकतंत्र की आत्मा नारी जाति के प्रति समानता, सहभागिता और प्रतिनिधित्व में निहित है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ इसी पुनीत भावना का सशक्त प्रतिपादन है। यह अधिनियम एक ऐसा ऐतिहासिक कदम है, जो भारतीय राजनीति, समाज और राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका को न केवल स्वीकार करता है, बल्कि उसे संस्थागत आधार भी प्रदान करता है।
वास्तव में स्त्रियां समाज का दर्पण होती हैं। किसी भी समाज एवं राष्ट्र की स्थिति को वहां की नारियों की दशा देखकर आंका जा सकता है। राष्ट्र की स्त्रियां सशक्त होंगी, तो राष्ट्र भी सशक्त होगा। भारत की गौरवशाली हिंदू संस्कृति में नारी का स्थान हमेशा से श्रेष्ठ रहा है। भारत में महिलाओं की भूमिका प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रही है। नारी को हमेशा ‘शक्ति’ और ‘सृजन’ का प्रतीक माना गया है।
भारत में एक ओर जहां गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने वेदों की ऋचाओं को गढ़कर ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया, वहीं दूसरी ओर रानी लक्ष्मीबाई और रानी दुर्गावती जैसी वीरांगनाओं ने अपने शौर्य और पराक्रम से राष्ट्र निर्माण में अपनी सशक्त भागीदारी सुनिश्चित की। किन्तु आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में लंबे समय तक महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत सीमित रहा है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ इसी ऐतिहासिक असंतुलन को सुधारने का प्रयास है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को विधायिका में पर्याप्त प्रतिनिधित्व (33 प्रतिशत) प्रदान करना है, जिससे वे न केवल राष्ट्र निर्माण में सहभागी बनें, बल्कि निर्णय-निर्माता भी बन सकें। यह अधिनियम इस भावना पर आधारित है कि जब नीतियां बनाने वाली मेज पर महिलाएं होंगी, तो समाज की आधी आबादी की वास्तविक आवश्यकताओं का समुचित प्रतिनिधित्व संभव हो सकेगा।
यह सच है कि युग परिवर्तन के साथ हमारे आचार-विचार और आवश्यकताओं में परिवर्तन होना स्वाभाविक है, परन्तु जीवन के मौलिक सिद्धांतों में विभेद होना कदापि उचित नहीं है। यह दुर्भाग्य ही है कि हमारी महान संस्कृति में समय के साथ स्त्रियों की स्थिति में भी गिरावट आई और नारी समानता का विचार हाशिए पर चला गया। पुरुष प्रधान समाज में पुरुष ने स्वयं को श्रेष्ठ और स्त्री को निम्नतर मान लिया, जबकि यह विचार भेदभावपूर्ण और निंदनीय है। स्त्री किसी भी रूप में पुरुष से कमतर नहीं है।
चाणक्य कहते हैं- स्त्री द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा।
साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः॥
अर्थात पुरुषों की अपेक्षा स्त्री की बुद्धि चार गुना अधिक होती है, आहार दो गुना अधिक होता है और उनका साहस पुरुषों की तुलना में छह गुना अधिक होता है।
भारत की आधी आबादी के इसी साहस और क्षमता को राष्ट्र निर्माण में सहभागी बनाने के लिए देश के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी लगातार महिलाओं के उत्थान, कल्याण और सशक्तिकरण के लिए कार्य कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’, ‘प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना’, ‘तीन तलाक निषेध’, ‘आयुष्मान भारत’ और ‘जल जीवन मिशन’ जैसे अनेक कल्याणकारी कदम उठाए हैं।
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के महिलाओं के प्रति सकारात्मक चिंतन का एक और महत्वपूर्ण कदम है। यह अधिनियम महिलाओं के अधिकारों, राष्ट्र निर्माण में उनकी सशक्त सहभागिता और एक उज्ज्वल एवं समावेशी भविष्य की आधारशिला है। इसके माध्यम से विधायिका में महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जाएगा।
इस अधिनियम के दूरगामी प्रभाव कई स्तरों पर दिखाई देंगे। महिलाएं नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएंगी, समाज में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा जैसे विषयों पर अधिक संवेदनशील नीतियां बनेंगी और भविष्य में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ेंगे।
वास्तव में नारी सृष्टि की उत्पादिका और प्रतिपालिका है। मनुष्य के कठिन मार्ग को सुगम बनाने का एकमात्र साधन स्त्री ही है। मां दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में नारी सृजन, ज्ञान और समृद्धि की प्रतीक है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ इसी दार्शनिक सत्य को भारत की आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मूर्त रूप प्रदान करता है।
हमारी संस्कृति में कहा गया है-
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।”
इसी भावना को साकार करते हुए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के माध्यम से महिलाओं को उनके समुचित अधिकार और विधायिका में उचित सहभागिता सुनिश्चित करने का कार्य कर रहे हैं।