महाराष्ट्र में धर्म पूछकर हमले की घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल कट्टरपंथ और ‘लोन वुल्फ’ ट्रेंड बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
अनुराग तागड़े
मुंबई में चाकूबाजी के बाद सुरक्षा एजेंसियां घटनाओं को व्यक्तिगत हिंसा मानकर खारिज करने के पक्ष में नहीं हैं।
महाराष्ट्र में बीते कुछ दिनों में सामने आई घटनाओं ने देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुंबई में जुबेर अंसारी द्वारा कथित रूप से धर्म पूछकर दो लोगों पर चाकू से हमला करने की घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है। इससे पहले नासिक के एक बीपीओ सेंटर में भी सांप्रदायिक तनाव से जुड़ा विवाद सामने आया था।इन दोनों घटनाओं के बीच जो समान सूत्र दिखाई दे रहा है, वह है कट्टरपंथी सोच का तेजी से प्रसार और ‘लोन वुल्फ’ हमलों का उभरता पैटर्न।
‘लोन वुल्फ’ या संगठित मानसिकता?
सुरक्षा एजेंसियां इन घटनाओं को केवल व्यक्तिगत हिंसा मानकर खारिज करने के पक्ष में नहीं हैं। प्रारंभिक जांच में यह संकेत मिल रहे हैं कि हमलावर भले ही अकेले हों, लेकिन उनकी सोच और मानसिकता किसी संगठित वैचारिक प्रभाव से निर्मित होती है।विशेषज्ञों का कहना है कि आज का ‘लोन वुल्फ’ पारंपरिक आतंकवादी से अलग जरूर है, लेकिन वह पूरी तरह अलग-थलग नहीं होता। उसके पीछे अक्सर एक डिजिटल नेटवर्क, कट्टरपंथी कंटेंट और वैचारिक प्रशिक्षण होता है, जो धीरे-धीरे उसे हिंसा की ओर धकेलता है।
एआई की भूमिका और सरकारी रणनीति
एआई आधारित एल्गोरिद्म भी रैडिकलाइजेशन को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ये प्लेटफॉर्म यूजर्स को वही कंटेंट दिखाते हैं, जो वे पहले देख चुके होते हैं, जिससे एक ‘इकोचेंबर’ बन जाता है। इससे व्यक्ति केवल एक ही विचारधारा से प्रभावित होता है और उसे ही सच मानने लगता है।दक्षिण और पश्चिम भारत में भी इसके संकेत मिले हैं, जहां स्थानीय भाषाओं में प्रचार और ऑनलाइन भर्ती के मामले सामने आए हैं। इसके बावजूद भारत में स्थिति संतुलित है, क्योंकि यहां का समाज बड़े पैमाने पर मध्यमार्गी है। सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए आतंकवाद विरोधी इकाइयां, डी-रैडिकलाइजेशन कार्यक्रम और ‘ऑपरेशन पिजन’ जैसी पहल शुरू की हैं।
वैश्विक समस्या बनकर उभरा कट्टरपंथ, बढ़ी चिंता
कट्टरपंथ अब केवल भारत की समस्या नहीं रहा, बल्कि वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन चुका है। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात ने यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटीज के लिए अपनी छात्रवृत्ति नीति में बड़ा बदलाव किया।संयुक्त अरब अमीरात ने स्पष्ट रूप से उन संस्थानों को सूची से बाहर कर दिया, जहां उसे इस्लामिक कट्टरपंथ के प्रभाव का खतरा नजर आया। यह कदम मुस्लिम ब्रदरहुड को लेकर यूनाइटेड किंगडम की नरम नीति के विरोध में उठाया गया। यह घटनाक्रम बताता है कि कट्टरपंथ अब शिक्षा, समाज और राजनीति हर स्तर पर चुनौती बन चुका है।
महाराष्ट्र में बढ़ते खतरे के पीछे कई कारण
विशेषज्ञों के अनुसार महाराष्ट्र में बढ़ते खतरे के पीछे कई कारण हैं तेज शहरीकरण, सामाजिक असंतुलन, इंटरनेट की व्यापक पहुंच और स्थानीय घटनाओं का जल्दी सांप्रदायिक रंग लेना। इसके अलावा बाहरी वैचारिक प्रभाव भी तेजी से प्रवेश कर रहे हैं।कट्टरपंथ फैलाने में दो प्रमुख कारक सामने आए हैं विवादित धार्मिक प्रवचन और डिजिटल प्रोपेगेंडा। व्हाट्सएप, टेलीग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर ‘हम बनाम वे’ की सोच को बढ़ावा दिया जाता है। साथ ही तकनीकी साधनों जैसे वीपीएन, फर्जी अकाउंट, गूगल अर्थ और डीपफेक का इस्तेमाल कर पहचान छुपाने और नफरत फैलाने का काम किया जा रहा है।मुंबई और नासिक की घटनाएं केवल अपराध नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक संकट की चेतावनी हैं।