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Iran-US Talks: Pakistan Role Under Lens

ईरान-अमेरिका वार्ता, पाक की भूमिका

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता पर सवाल उठे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान की भूमिका सीमित और प्रभावहीन रही है।


ईरान-अमेरिका वार्ता पाक की भूमिका

प्रो.अंशु जोशी

इस सप्ताह, पाकिस्तान की ३ तथाकथित मध्यस्थता में ईरान और अमेरिका की तथाकथित शांतिवार्ता न हो पाने के बाद पश्चिम एशिया के साथ साथ पूरे विश्व के लिए तनाव बढ़ा। ट्रम्प ने युद्धविराम को आगे तो खिसकाया पर होमूंज से अपने बेड़े नहीं हटाए और भारत के खिलाफ अनर्गल टिप्पणी कर न सिर्फ भारत अमेरिका संबंधों में तनाव उत्पन्न किया, अपने 'कबूतर' पाकिस्तान की साख बनाए रखने के लिए अपनी और अपने राष्ट्र की साख पर बट्टा लगाया। यह समझना बहुत आवश्यक है कि पाकिस्तान की इस पूरे संघर्ष में युद्धविराम की दृष्टि से क्या भूमिका है। आयएम्एफ द्वारा पाकिस्तान को पश्चिम एशिया का भाग दिखाना अमेरिका के पाकिस्तान में अतिक्रमण के इरादों को भी स्पष्ट करता है पर पाकिस्तान सब समझते हुए भी पहले अमेरिका, फिर चीन और अब फिर अमेरिका के हाथों अपने आप को बेच कर विश्व शांति और सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है।

साफ दिखता है कि एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में कार्य करने के बजाय, पाकिस्तान वाशिंगटन के आदेशों का पालन एक आज्ञाकारी बच्चे के रूप में कर रहा है, जो पाकिस्तान को 'अमेरिका के कबूतर' के रूप में पूरे विश्व के सामने प्रस्तुत कर रहा है। अमेरिका-ईरान युद्ध को टालने, या यहां तक कि इसे सीमित करने में इसकी विफलता इसके अपने विफल स्वरूप और नीतियों का परिणाम है। अमेरिका के दिए ड्राफ्ट को ज्यों का त्यों पेस्ट कर देने से लेकर निरर्थक बयानबाजी तक, पाकिस्तान ने इस युद्ध को और उलझाया ही है और अपनी हंसी उड़वाई है।

इतिहास में झांक के देखें तो शीत युद्ध की शुरुआत से ही, पाकिस्तान ने लगातार अपनी नीतिगत स्वायत्तता को अमेरिकी समर्थन के लिए बदला है, और सैन्य व आर्थिक सहायता के बदले में सीटों और

सेंटो जैसे अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधनों के साथ खुद को जोड़ा है। अफगानिस्तान में सोवियत विरोधी संघर्ष के दौरान, इस्लामाबाद ने स्वेच्छा से खुद को अमेरिकी गुप्त अभियानों के लिए प्रमुख बेस के रूप में स्थापित किया, जिससे अमेरिका को फायदा पहुंचा पर पाकिस्तान की अपनी जनता और व्यवस्था को बड़ा नुकसान। फिर, 11 सितंबर, 2001 की घटनाओं के बाद, अमेरिका द्वारा शुरू किए गए आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान ने अपने आप को एक सहयोगी के रूप में पेश करने का प्रयास तो किया पर दुनिया ने देखा कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की धरती पर ही मिला और तबसे आज तक पूरी दुनिया में पाकिस्तान की छवि एक आतंकवादी देश कि रूप में स्थापित और पक्की होती रही है। अमेरिका की पाकिस्तान से दूरी बढ़ी और चीन की पाकिस्तान में दखल देने के बाद संबंधों में और खटास आई। पर पिछले वर्ष जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तब पाकिस्तान को ईरान का प्रमुख सहयोगी जानते हुए ट्रम्प ने मुनौर के साथ संबंध सहज किए ताकि पाकिस्तान ईरान का साथ न दे और चीन की सहायता ईरान तक अपनी साझा सीमा के जरिये न पहुंचा सके। तबसे अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध एक नई दिशा और नई गति लेते दिखाई पड़े।

पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान ने स्वयं को एक शांतिदूत के रूप में प्रस्तुत करते हुए ईरान और अमेरिका के युद्ध को रोकने में मध्यस्थ की भूमिका को बढ़ चढ़कर प्रचारित प्रसारित किया। किन्तु दोनों ही पक्षों को साथ लाने में असफल रहा। न युद्ध ही रुक पाया न पाकिस्तान की साख ही सुधर पाई। ईरान ने अब पाकिस्तान पर अपना अविश्वास जताया है और किसी जिम्मेदार मध्यस्थ की बात की है। युद्ध को टालने में पाकिस्तान की अक्षमता कई कारणों से पूर्वनिर्धारित थी। सबसे पहले, सैन्य शक्ति के मामले में, पाकिस्तान के पास अमेरिका पर किसी भी प्रकार के आदेश या परिणाम थोपने या अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों में बाधा डालने की कोई क्षमता नहीं है। अमेरिका से जुड़े वित्तीय संसाधनों और आईएमएफ जैसी पश्चिमी प्रभुत्व वाली संस्थाओं पर इसकी भारी निर्भरता, इसे मध्यस्थ नहीं कठपुतली बना कर प्रस्तुत करती है। दूसरा, ईरान पर पाकिस्तान का प्रभाव उसकी बयानबाजी से कहीं अधिक कमजोर है। द्विपक्षीय संबंध नाजुक हो चुके हैं, जो आवादी संगठनों और सीमा पार छिटपुट हमलों से संबंधित पारस्परिक आरोपों से ग्रस्त है, जिसमें पाकिस्तानी क्षेत्र में ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमले भी शामिल हैं। इस संदर्भ में, कम से कम अब ईरान के पास पाकिस्तान को एक विश्वसनीय सुरक्षा सहयोगी मानने का कोई कारण नहीं है, और वह इसके बजाय इसे अमेरिका, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के साथ इसके बनिष्ठ संबंधों के कारण इसे ईरान-विरोधी गठबंधन के एक राष्ट्र के रूप में देखता है।

अमेरिकी-ईरान संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की कार्रवाइयां और असफलता इसकी अतिशयोक्ति और उस्को वास्तविकता के बीच की असमानता को उजागर करती हैं। 2026 की घटनाओं ने पाकिस्तान को 'अमेरिका का कबूतर' होने के ठप्पे से मुक्त नहीं किया, बल्कि, इसे और पक्का कर दिया है। मध्यस्थता में इस्लामाबाद की भूमिका अमेरिका और ईरान दोनों के रणनीतिक विचारों, पाकिस्तान की आर्थिक तथा सामरिक कमजोरियों और एक ऐसे सुरक्षा तंत्र की इच्छा से सीमित हो गई जो अमेरिका से मान्यता चाहता है। इन तमाम परिस्थितियों में युद्ध न सिर्फ और भड़कता नजर आता है, अमेरिका की पाकिस्तान में सैन्य बेस बनाने की आशंका भी जागृत होती है। हम सिर्फ आशा और प्रार्थना कर सकते हैं कि दोनों ही पक्ष आगामी दुष्परिणाम समझते हुए आपसी वार्ता के लिए तैयार हों।

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