ईरान-इजराइल युद्ध के बीच भारत के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता की चुनौती बढ़ी। तेल कीमतों में उछाल की आशंका, सरकार के सामने नई रणनीति की जरूरत।
संकट के समय आत्मनिर्भरता केवल एक नारा ही नहीं होती, अपितु एक आवश्यकता भी होती है, जो आपदा को अवसर में बदलने का मार्ग प्रशस्त करती है। जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं टूटती हैं, तब आत्मनिर्भरता ही विकास की नई राह दिखाती है। भारत में वह दमखम है कि संकट के समय में वह और अधिक ताकत के साथ उभरकर आता है। कोरोना काल में इस चमत्कार को दुनिया ने देखा। ईरान-इजराइल युद्ध के संकट के चलते देश के समक्ष कुछ नई चुनौतियां आई हैं, लेकिन भारतीय नेतृत्व इन चुनौतियों से निपटने में पूर्णतः सक्षम है।
अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के साथ दुश्मनी खत्म करने के लिए 15 बिंदुओं वाला एक एजेंडा भेजा है। इसे लेकर तेल और गैस बाजारों ने आशावादी प्रतिक्रिया दी है। खासकर ईरान के अधिकारियों के बयानों ने इन उम्मीदों को और बढ़ाया है। उन्होंने कहा है कि गैर-दुश्मन देशों के जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने देंगे, बशर्ते वे ईरान से संपर्क बनाए रखें और इसकी इजाजत हासिल करें।ईरान-इजराइल युद्ध के इन संकेतों को खाड़ी में हफ्तों से जारी संकट के अंत और जीवाश्म ईंधन बाजार में सामान्य हालात की वापसी के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन अमेरिका, ईरान और इजराइल से जुड़े सभी पक्षों के अप्रत्याशित स्वभाव को देखते हुए यह अपेक्षा करना शायद कुछ ज्यादा ही होगा। ठोस रूप से कहें तो भारत को आने वाले समय में आयातित ऊर्जा के लिए अपेक्षा से अधिक कीमतें चुकानी पड़ सकती हैं।
कारोबारी मार्गों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का एक असर यह हुआ है कि कुछ बाजार, जो पहले वैश्विक स्वरूप में थे मसलन कच्चे तेल का बाजारअब उनकी क्षेत्रीय कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव नजर आ रहा है। उदाहरण के लिए, भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र का तेल मूल्य टेक्सास या उत्तरी सागर के तेल की कीमतों की तुलना में कहीं अधिक मायने रखता है। कुछ अनुमानों के अनुसार, आने वाले कुछ महीनों में इंडियन बास्केट कच्चे तेल की कीमत पिछले कई महीनों की तुलना में लगभग दोगुनी हो सकती है।यह कहना आवश्यक नहीं कि यदि ऐसा होता है, तो आम परिवारों और सरकार दोनों की वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव पड़ेगा। भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा की कीमतों में तेज उछाल से संकट पैदा होने का खतरा नया नहीं है। ऐसा पहले भी हो चुका है हम 2013 में, 1999 में और उससे पहले भी ऐसे हालात झेल चुके हैं। इससे निपटने के लिए अधिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही एकमात्र उपाय है, लेकिन उसे तत्काल लागू नहीं किया जा सकता।
हालांकि, वर्तमान सरकार के पास ऐसा करने के लिए एक दशक से अधिक का समय रहा है। साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से इसे अपेक्षाकृत लंबे समय तक प्रबंधनीय ऊर्जा कीमतों का लाभ मिला। इस अवधि में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में कुछ कदम उठाए गए, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के महत्वाकांक्षी लक्ष्य। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में नवीकरणीय ऊर्जा जीवाश्म ईंधन का पर्याप्त विकल्प नहीं है, विशेषकर बिजली की बेस लोड आवश्यकता के लिए, और आने वाले कई वर्षों तक भी नहीं होगी।इसलिए तेल और गैस की घरेलू खोज, उत्पादन और प्रसंस्करण बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दुर्भाग्यवश, इस अहम मानक पर सरकार पीछे रह गई है। उत्खनन नीति में कुछ अग्रगामी बदलावों के प्रयासों के बावजूद उत्पादन 2014 के बाद से 30 प्रतिशत कम हुआ है, जबकि घरेलू मांग में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
2016 में नई उत्खनन और लाइसेंसिंग नीति में सरलीकरण की प्रक्रिया को तेज करके व्यावसायिक जगत में रुचि आकर्षित की गई। उत्पादन साझेदारी में राजस्व वृद्धि देखने को मिली। हालांकि, नए खुले क्षेत्रों के लिए डेटा कवरेज बहुत कम रहा और मूल्य अस्थिरता बनी रही। इस बीच, ब्राजील ने भूवैज्ञानिक डेटा में निवेश करके उत्खनन का स्तर दो से तीन गुना तक बढ़ा लिया है।