इंदौर का साइकिल से लंबा नाता रहा है, जहाँ कभी साइकिल आवश्यकता का प्रतीक थी, वहीं आज यह स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए अहम बन गई है।
अजय कुमार बियानी
इंदौर की पहचान केवल पोहे-जलेबी, राजवाड़ा और सराफा से नहीं बनी है। इस शहर की गलियों में कभी साइकिल की घंटी भी उतनी ही परिचित थी, जितनी आज मोटरगाड़ियों की आवाज है। विश्व साइकिल दिवस हमें केवल एक वाहन की याद नहीं दिलाता, बल्कि उस दौर की स्मृति भी जगाता है, जब साइकिल इंदौर की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी।
एक समय था, जब किसी घर में नई साइकिल आना किसी उत्सव से कम नहीं माना जाता था। विवाह में दूल्हे को साइकिल मिल जाए तो पूरे मोहल्ले में चर्चा होती थी। बच्चों के लिए साइकिल चलाना केवल शौक नहीं, बल्कि बड़े होने का प्रमाणपत्र होता था। पिता की साइकिल को बिना अनुमति छूना भी किसी साहसिक अभियान जैसा अनुभव माना जाता था।इंदौर का साइकिल से रिश्ता बहुत पुराना है। लगभग सवा सौ वर्ष पहले नगर प्रशासन साइकिल चलाने के लिए लाइसेंस जारी करता था। इतना ही नहीं, साइकिल पर वार्षिक कर भी लगाया जाता था। आज की पीढ़ी को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि जिस साइकिल को अब पर्यावरण मित्र माना जाता है, कभी उस पर कर भी देना पड़ता था।
वर्ष 1958 के नगर निगम चुनाव में साइकिल कर एक बड़ा मुद्दा बन गया था। नागरिक मोर्चे ने इसे समाप्त करने का वादा किया और जनता ने उसका भरपूर समर्थन किया। चुनाव जीतते ही साइकिल कर समाप्त कर दिया गया। यह घटना बताती है कि उस समय साइकिल केवल एक साधन नहीं, बल्कि आम आदमी की आवश्यकता थी।कपड़ा मिलों के स्वर्णिम दौर में हजारों मजदूर प्रतिदिन साइकिल से काम पर जाते थे। सुबह-सुबह मिलों की ओर बढ़ती साइकिलों की कतारें इंदौर की पहचान हुआ करती थीं। वर्ष 1956 में शहर में लगभग तीस हजार पंजीकृत साइकिलें थीं। उस दौर में साइकिल के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन था।
हमारे 'आपण इंदौरी' अंदाज में कहें तो तब पेट्रोल की चिंता नहीं थी, यातायात जाम का झंझट नहीं था और पार्किंग खोजने की परेशानी भी नहीं थी। साइकिल उठाई और निकल पड़े। न कोई प्रदूषण, न कोई शोर और न कोई तनाव।समय के साथ परिस्थितियां बदलती गईं। कभी दस रुपये में मिलने वाली साइकिल आज हजारों रुपये तक पहुंच गई है। गियर वाली, पहाड़ी और खेल प्रतियोगिताओं के लिए विशेष साइकिलें बाजार में उपलब्ध हैं। लेकिन विडंबना यह है कि साइकिल जितनी आधुनिक हुई, उतनी ही आम जीवन से दूर भी होती चली गई।आज छोटी-सी दूरी तय करने के लिए भी लोग मोटर वाहन निकालते हैं। पैदल चलना या साइकिल से जाना मानो प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझ लिया गया है। दूसरी ओर, चिकित्सक, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और पर्यावरणविद लगातार साइकिल अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
अब साइकिल का एक नया रूप सामने आया है। पहले यह मजबूरी का साधन थी, आज यह स्वास्थ्य का साधन बन गई है। इंदौर की सड़कों पर सुबह के समय बड़ी संख्या में लोग साइकिल चलाते दिखाई देते हैं। कोई वजन कम करने के लिए पैडल मार रहा है, कोई हृदय को स्वस्थ रखने के लिए और कोई केवल ताजी हवा का आनंद लेने के लिए।साइकिल की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी है। यह न धुआं छोड़ती है, न शोर करती है और न ही ईंधन मांगती है। बढ़ते प्रदूषण और बदलते मौसम के दौर में साइकिल ऐसा समाधान प्रस्तुत करती है, जो जेब और पर्यावरण दोनों के लिए हितकारी है।इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में देश को नई दिशा दिखाई है। यदि शहर में छोटी दूरी के लिए साइकिल उपयोग की संस्कृति को बढ़ावा मिले, तो यह स्वच्छता अभियान का स्वाभाविक विस्तार होगा। इससे यातायात का दबाव घटेगा, प्रदूषण कम होगा और नागरिकों का स्वास्थ्य बेहतर होगा।