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India-Russia Trade: Big Target, Bigger Risks

रूस से आपसी व्यापार में लंबी छलांग का लक्ष्य और चुनौतियां

भारत और रूस ने 2030 तक 100 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य तय किया है। जानिए इस बढ़ते व्यापार में भारतीय कंपनियों के लिए अवसर, जोखिम और बड़ी चुनौतियां क्या हैं।


रूस से आपसी व्यापार में लंबी छलांग का लक्ष्य और चुनौतियां

विवेक शुक्ला

भारत निकट भविष्य में रूस के साथ अपने आपसी व्यापार को सालाना 100 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर दोनों ही इस लक्ष्य के प्रति भारत की मजबूत प्रतिबद्धता स्पष्ट कर चुके हैं। इस बीच दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्धों के कारण वैश्विक व्यापारिक रिश्ते तेजी से बदल रहे हैं। इन्हीं बदलावों के बीच रूस भारतीय निर्यातकों के लिए एक साथ बड़ा अवसर और बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 23 मार्च 2026 को कहा, “दोनों पक्ष वर्तमान वार्षिक व्यापार को 68.7 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन संतुलित तरीके से।” उन्होंने गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने, नियामक अड़चनों को समाप्त करने, भारत की कुशल कार्यशक्ति का लाभ उठाने और भारत-यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन मुक्त व्यापार समझौते की प्रगति पर जोर दिया।

भू-राजनीतिक बदलाव और रूसी बाजार:यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी कंपनियां रूस से लगभग पूरी तरह दूर हो गई हैं। इसके परिणामस्वरूप वहां मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां, रसायन, कपड़ा, खाद्य उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान और औद्योगिक उपकरणों की भारी कमी पैदा हो गई है। रूसी खरीदार अब भारतीय आपूर्तिकर्ताओं को सक्रिय रूप से बुला रहे हैं। कम प्रतिस्पर्धा, अच्छी मांग और ज्यादा मुनाफे की संभावना साफ नजर आ रही है।वाणिज्य मंत्रालय के जानकारों के अनुसार इस आकर्षण के पीछे एक गंभीर मसला भी छिपा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का जाल, भुगतान व्यवस्था में आने वाली जटिलताएं, छिपे हुए अंतिम उपयोगकर्ता और कंपनी की प्रतिष्ठा को होने वाला दीर्घकालिक नुकसान किसी भी निर्यातक के लिए भारी पड़ सकता है।

भारत-रूस व्यापार : आंकड़े और लक्ष्य वित्त वर्ष 2024-25 में भारत-रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचकर 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसमें भारतीय निर्यात करीब 4.9 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात, जो मुख्य रूप से कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद और अन्य वस्तुओं से बना है, 63.8 अरब डॉलर रहा।दोनों देशों ने 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य तय किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 5 दिसंबर 2025 को आशावादी स्वर में कहा कि भारत और रूस को 2030 तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा, वे इससे पहले ही 100 अरब डॉलर के लक्ष्य को पार कर सकते हैं।उन्होंने रूस से ज्यादा निवेश आमंत्रित किया और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में जारी तेज रफ्तार को रेखांकित किया। भारत के रूस में राजदूत विनय कुमार ने भरोसा जताते हुए कहा, “भारत और रूस 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं। यह लक्ष्य पूरी तरह संभव है।” उन्होंने उर्वरक, कृषि और इंजीनियरिंग क्षेत्र में नई वस्तुओं के निर्यात तथा दोनों देशों की अपनी मुद्राओं के अधिक उपयोग पर विशेष जोर दिया।यह बढ़ता व्यापार भारतीय निर्यातकों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित कर रहा है। जब भारत रूस से इतना ज्यादा सामान खरीद रहा है, तो निर्यात बढ़ाकर संतुलन क्यों न बनाया जाए? लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना बहुत जरूरी है।

जोखिम और वास्तविकता:जानकार मानते हैं कि 2022 के बाद रूस एक सामान्य बाजार नहीं रहा है। सामान अक्सर सिविलियन उपयोग के नाम पर भेजा जाता है, लेकिन मध्यस्थों के जरिए उसका उपयोग दूसरी दिशा में किया जा सकता है। भुगतान घुमावदार रास्तों से होता है और अंतिम उपयोगकर्ता अक्सर छिपे रहते हैं।अमेरिकी प्रतिबंधों का असर भारतीय कंपनियों पर भी पड़ चुका है। 30 अक्टूबर 2024 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (ओएफएसी) ने रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े प्रतिबंधों के उल्लंघन के आरोप में 21 भारतीय संस्थाओं जिनमें 19 कंपनियां और 2 व्यक्ति शामिल थे पर प्रतिबंध लगा दिए।भारतीय सरकार ने इन घटनाओं को गंभीरता से लिया। संसद में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। 28 नवंबर 2024 को राज्यसभा में अनस्टार्ड प्रश्न संख्या 412 के जवाब में विदेश मंत्रालय के राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने इसकी पुष्टि की। 20 दिसंबर 2024 को लोकसभा में भी इस संबंध में जानकारी दी गई।सितंबर 2025 में अमेरिकी उद्योग और सुरक्षा ब्यूरो ने एक भारतीय कंपनी को काली सूची में डाल दिया, क्योंकि वह अमेरिकी मूल की वस्तुएं रूस भेज रही थी। ये उदाहरण साफ बताते हैं कि भारतीय कंपनियों को रूस के साथ काम करते समय बेहद सोच-समझकर कदम उठाना होगा।

सही रणनीति क्या हो?:भारत एकतरफा प्रतिबंधों को मान्यता नहीं देता और अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। जैसा कि राजदूत विनय कुमार ने कहा, भारत अपने 1.4 अरब नागरिकों की जरूरतों के लिए जहां बेहतर सौदा मिलेगा, वहां से सामान खरीदेगा।फिर भी निजी क्षेत्र के लिए संदेश बहुत स्पष्ट है। ड्यू डिलीजेंस केवल इनवॉइस या बुनियादी रजिस्ट्रेशन जांच तक सीमित नहीं होनी चाहिए। कम जोखिम वाले उपभोक्ता सामान, कुछ दवाइयां और खाद्य उत्पाद सामान्य सावधानी के साथ भेजे जा सकते हैं, लेकिन बड़े औद्योगिक सामान या संवेदनशील उत्पादों में अंतिम उपयोगकर्ता की पूरी जांच, भुगतान की पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन अनिवार्य है।विदेश मंत्री एस. जयशंकर कहते हैं कि भारत रूस के साथ गहरे और टिकाऊ संबंध चाहता है, लेकिन लंबे समय के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा।

जो निर्यातक सख्त नियमों का पालन करेंगे, वे मौजूदा समय में अच्छा लाभ उठा सकते हैं। जो बिना सोचे-समझे कदम उठाएंगे, वे खुद को नुकसान पहुंचा सकते हैं। गंभीर भारतीय व्यवसायी रूस को अवसर और परीक्षा दोनों की तरह देख रहे हैं। वे जहां सुरक्षित हो, वहां लाभ कमाएंगे और पूरे उद्यम को प्रतिबंधों के जाल से बचाकर रखेंगे।बढ़ी हुई जांच के इस दौर में सतर्कता कोई विकल्प नहीं, बल्कि टिकाऊ वैश्विक व्यापार की अनिवार्य शर्त है।

 

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