भारत में हीटवेव और बढ़ती गर्मी अब जलवायु आपातकाल का संकेत बन चुकी है। रिकॉर्ड तापमान, शहरीकरण और पर्यावरणीय असंतुलन ने जनजीवन पर गंभीर असर डाला है।
निरंजन देव भारद्वाज
अप्रैल 2026 का यह महीना भारत के लिए केवल एक कैलेंडर का पन्ना नहीं, बल्कि एक अस्तित्वगत संकट की गूंज बन गया है। देश के विशाल भूभाग पर सूरज का कहर इस कदर टूट रहा है कि दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों की सूची में से 95 अकेले भारत के हैं। दिल्ली की तपती सड़कों से लेकर ओडिशा के तटीय उमस तक, पारा 45-47 डिग्री सेल्सियस के स्तर को चुनौती दे रहा है। यह अब केवल 'लू' या मौसम का सामान्य बदलाव नहीं है, यह उस पारिस्थितिक असंतुलन का चरम विस्फोट है जिसे हमने दशकों तक प्रगति के शोर में अनदेखा किया।
आज भारत की झुलसाती हवाएं चीख-चीखकर कह रही हैं कि हम जलवायु परिवर्तन के किसी भविष्य की आशंका में नहीं, बल्कि उसके एक अत्यंत क्रूर और जानलेवा वर्तमान के बीच खड़े हैं। और इसी 'वर्तमान' की सबसे कठोर हकीकत यह है कि यह तापीय संकट अब सीधे जीवन हानि में बदल चुका है। हीटवेव आज भारत की सबसे घातक प्राकृक्तिक आपदाओं में शामिल हो चुकी है, जिसके चलते 2010 के बाद से अब तक 46,000 से अधिक संदिग्ध मौतें दर्ज की गई हैं। 2013 से 2022 के बीच गर्मी से होने वाली वार्षिक मृत्युदर में 1991-2000 की तुलना में लगभग 85 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इस भीषण गर्मी का सबसे अधिक प्रभाव उन श्रमिकों पर पड़ता है जो खुले वातावरण में-निर्माण स्थलों, सड़कों और खेतों में काम करने को मजबूर स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं।
यह संकट हमारी आधुनिक जीवनशैली और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर एक कड़ा प्रहार है। जहां एक ओर सरकारी फाइलों में बढ़ते 'ग्रीन कवर' के आंकड़े हमें सुकून देने की कोशिश करते हैं, वहीं जमीन पर फैलते कोक्रीट के जंगलों ने हमारे शहरों को 'धधकते तंदूर' में तब्दील कर दिया है। यह आपदा समाज की गहरी आर्थिक खाई को भी उजागर करती है, जहां 'ठंडी हवा' अब एक बुनियादी अधिकार नहीं बल्कि अमीरों की विलासिता बन गई है, और बहुसंख्यक आबादी इस तापीय अन्याय का शिकार होकर अपनी जान दांव पर लगा रही है। इस असामान्य गर्मी का सबसे गहरा असर केवल मौसम के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सौधे आम जनजीवन, कृषि व्यवस्था और शहरी बुनियादी ढांचे पर दिखाई देने लगा है। दोपहर के समय सड़कों पर सन्नाटा, श्रमिकों की घटती कार्यक्षमता, पानी की बढ़ती मांग और बिजली की रिकॉर्ड खपत ये सभी संकेत बताते हैं कि शहर और गांव दोनों ही इस तापीय दबाव के सामने असहज स्थिति में पहुंच चुके हैं।
इस पृष्ठभूमि में वैश्विक तापवृद्धि और जलवायु परिवर्तन की भूमिका और भी स्पष्ट होकर सामने आती है। बढ़ते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, अनियंत्रित शहरीकरण और प्राकृक्तिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने वायुमंडलीय संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है, जिसका सीधा परिणाम इस तरह की चरम मौसमीय घटनाओं के रूप में दिख रहा है। खेतों में खड़ी फसलें भी तेज गर्म हवाओं और नमी की कमी के कारण तनाव में हैं, जिससे आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न गहराता दिखाई देता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि हीटवेव अब केवल 'मौसम की घटना' नहीं, बल्कि एक गहरे होते जलवायु संकट का परिणाम है-और इसके और विकास संबंधी विफलताओं की भूमिका को समझना अब और भी आवश्यक हो गया है।
भारतीय शहरों में गर्मी का बढ़ता प्रकोप केवल बढ़ते तापमान का नतीजा नहीं है, बल्कि 'अर्बन हीट आइलैंड' (शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव) के उस प्रभाव का परिणाम है जिसने महानगरों को जीते-जागते तंदूर में बदल दिया है। जब हम शहरों को कांक्रीट, डामर और कांच की ऊंची इमारतों से पाट देते हैं, तो ये सतहें दिनभर सूरज की गर्मी को सोखती हैं। जहां ग्रामीण इलाकों में पेड़ और मिट्टी वाष्पीकरण के जरिए खुद को ठंडा रखते हैं, वहीं हमारे शहर इस गर्मी को कैद कर लेते हैं। इसका सबसे भयावह असर रात के समय दिखता है-जब सूरज ढलने के बाद भी कांक्रीट की ये दीवारें और सड़कें उस कैद की गई गर्मी को धीरे-धीरे बाहर छोड़ती हैं, जिससे रात का तापमान भी सामान्य से 5 से 8 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा बना रहता है। यह 'थर्मल ट्रैप' शहरवासियों को चौचीसों घंटे एक असहज अंगीठी में झोंक देता है।
विकास की वेदी पर चढ़ती हरियालीः एक आत्मघाती कदम विडंबना यह है कि इस तपिश को कम करने का प्राकृक्तिक समाधान यानी हमारे 'पेड़' विकास की अंधी दौड़ में सबसे पहले काटे जा रहे हैं। फ्लायओवर्स, मेट्रो लाइन्स और चौड़ी सड़कों के नाम पर शहरों के उन पुराने और घने पेड़ों की बलि दी जा रही है जो दशकों से हमारे 'नेचुरल एयर कंडीशनर का काम कर रहे थे। इसका सबसे ज्वलंत और दुखद उदाहरण नासिक में देखने को मिलता है, 250 साल पुराने बरगद और पीपल के पेड़ों पर कुल्हाड़ी चला दी गई। ये केवल पेड़ नहीं थे और शीतलता के संरक्षक थे। एक परिपक्व पेड़ अपने आसपास के वातावरण को 2 से 4 डिग्री तक ठंडा रख सकता है, लेकिन 'विकास' की कागजी योजनाएं अक्सर एक पुराने घने पेड़ के बदले दस नए छोटे पौधे लगाने का झांसा देती हैं.
हकीकत यह है कि एक पुराना बरगद या पीपल का पेड़ जितना कार्बन सोखता है और ठंडक देता है, उसकी जगह ये नए छोटे पौधे अगले बीस साल तक नहीं ले सकते। पेड़ों की इस सामूहिक हत्या ने शहरों के 'विंड कॉरिडोर' (हवा के प्राकृतिक रास्ते) को ब्लॉक कर दिया है। जहां पहले घनी हरियाली लू के थपेड़ों को फिल्टर करती थी, अब वहां केवल नंगी कांक्रीट की सतहें हैं जो गर्मी को कई गुना बढ़ा देती हैं। यह केवल हरियाली का नुकसान नहीं है, बल्कि एक सुविचारित पर्यावरणीय आत्महत्या है। अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़ा मुद्दा भी इसी व्यापक पर्यावरणीय संकट का एक अहम उदाहरण है, जहां प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन और तेजी से बढ़ते खनन दबाव के बीच टकराव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 और जनवरी 2026 के अपने महत्वपूर्ण आदेशों में अरावली की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए खनन पर कड़ी पाबंदियां लगाई हैं। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अरावली केवल 'पहाड़' नहीं, बल्कि एक निरंतर पारिस्थितिक तंत्र है जिसे खंडित नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद, नासिक और अरावली का संकट अकेला नहीं है। देश के कई शहर इसी प्रवृत्ति का हिस्सा बनते जा रहे हैं।