तमिलनाडु के कलपक्कम में भारत ने फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में क्रिटिकलिटी हासिल की। इससे परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भरता और थोरियम आधारित भविष्य की राह खुली है।
आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में भारत आ ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। तमिलनाडु के कलपक्कम में वैज्ञानिकों ने यहां परमाणु ऊर्जा को लेकर जारी एक प्रयोग में ऐतिहासिक सफलता पाई है। इस उपलब्धि को हासिल करने के साथ ही भारत अब परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की तरफ अपने कदम बढ़ा चुका है। कलपक्कम में स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत का पहला स्वदेशी फास्ट ब्रीडर परमाणु रिएक्टर बन चुका है। भारत ने परमाणु ऊर्जा संयंत्र में क्रिटिकैलिटी यानी क्रांतिकता हासिल कर ली है। अब भारत का परमाणु कार्यक्रम इसी क्रिटिकैलिटी की सफल राह पर आगे बढ़ेगा। इसके चलते भारत जल्द ही पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा पैदा करने की जगह स्वच्छ अक्षय ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार हो जाएगा।
अब इसे चलाने के लिए किसी बाहरी दखल की जरूरत नहीं है, ये खुद न्यूट्रॉन पैदा करेगा और खुद ही बिजली बनाएगा। यहां बता दें कि भारत पिछले करीब 40 साल से एक फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) में प्रयोगों को अंजाम दे रहा है लेकिन इसे सफलता नहीं मिल सकी। 2014 में जब तो केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार सता में आई इस पर तेजी से काम शुरु हुआ जिसका परिणाम यह हुआ कि आज भारत इस क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता की और अपने कदम बढ़ा चुका है। इसे बनाने में 200 से ज्यादा भारतीय उद्योगों और लघु एवं मध्यम उद्योगों की भूमिका रही है। दुनियाभर में परमाणु ऊर्जा संयंत्र मौजूदा समय में लाइट वॉटर रिएक्टरों का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें ईंधन के तौर पर यूरेनियम लगता है। हालांकि, दुनिया में यूरेनियम के भंडार लगातार घट रहे हैं और नए भंडार की कम मौजूदगी की
वजह से धीरे-धीरे खात्मे की कगार पर पहुंचने वाले हैं। भारत के पास भी यूरेनियम के भंडार काफी कम है। भारत के पास दुनिया का केवल एक प्रतिशत यूरेनियम है। हालांकि, फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों की खास बात यह है कि पारंपरिक रिएक्टर्स से इतर इनमें ईंधन के तौर पर प्लूटोनियम और थोरियम का भी इस्तेमाल हो सकता है। दुनिया में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की तकनीक अत्यंत जटिल है। अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसे कई विकसित देशों ने तरल सोडियम को सुरक्षित रूप से संभालने में विफलता और अन्य वित्तीय चिंताओं के कारण अपने कार्यक्रमों को बंद कर दिया। इसके व्यावसायिक रूप से ग्रिड से जुड़ने के बाद, रूस के बाद भारत दुनिया का केवल दूसरा देश बन जाएगा जिसके पास वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर होगा।
जिससे कचरे को लंबे समय तक विशाल भूमिगत स्टोरेज में डंप करने की चिंता काफी कम हो जाती है। एक आंकलन के मुताबिक, वैश्विक थोरियम भंडार का लगभग 25 फीसदी हिस्सा भारत में खासकर दक्षिण भारत की तटीय रेत में मौजूद है। यह भारत की दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा थोरियम का भंडार बनाता है। थोरियम को जब तेज रफ्तार के न्यूट्रॉन के संपर्क में लाया जाता है तो यह यूरेनियम-233 पैदा करता है। यानी थोरियम सीधे तौर पर एक बेहद कीमती परमाणु तत्व में बदल जाता है। कलपक्कम का यह रिएक्टर इसी काम में माहिर है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर यह सफल होता है तो भारत अपने थोरियम भंडार से वर्षों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो जाएगा। अगर यह संयंत्र सारे प्रयोगों में सफल हो जाता है और इसे बिजली पैदा करने के लिए वाणिज्यिक यानी कमर्शियल ग्रिड से जोड़ दिया जाता है तो भारत दुनिया का सिर्फ दूसरा पैसा देश बन जाएगा, जिसके पास व्यावसायिक रूप से संचालित होने वाला फास्ट बीडर रिएक्टर होगा। अब तक यह उपलब्धि सिर्फ रूस के पास ही मौजूद है।
भारत के पास यूरेनियम का भंडार भले ही दुनिया का एक प्रतिशत हो, लेकिन वैश्विक थोरियम का लगभग 25 प्रतिशत भंडार भारत में मौजूद है। वर्तमान में भारत अपने ऊर्जा स्रोतों के लिए आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इस रिएक्टर की सफलता के बाद भारत अपने थोरियम भंडार का उपयोग करके अगले 400 वर्षों तक 500 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) बिजली उत्पन्न करने में सक्षम हो सकता है।