देवनागरी में उर्दू लेखन के पूरे इतिहास, परंपरा को आईआईएमसी ने सिरे से किया खारिज, दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि देवनागरी में नहीं लिखी जा सकती है उर्दू !
दिल्ली हाई कोर्ट में IIMC का जवाबी हलफनामा पेश कर कहा कि लोहिया को क्यों मानें, गांधी हमारे एकेडमिक निर्णय से ऊपर नहीं!
नई दिल्ली। हिंदी पत्रकारिता के 200वीं सालगिरह के मुबारक मौके 30 मई के ठीक एक दिन पहले केंद्र सरकार के पत्रकारिता के सबसे बड़े संस्थान भारतीय जन संचार संस्थान ने अपने एक जवाबी हलफनामे से हिंदी और देवनागरी में उर्दू पढ़ने-लिखने की रवायत को बड़ा झटका दिया है।
दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल इस हलफनामे में भारतीय जन संचार संस्थान ने देवनागरी लिपि में उर्दू पत्रकारिता की दाखिला परीक्षा कराने से न केवल साफ इंकार किया है बल्कि देवनागरी लिपि में उर्दू लिखने की सैकड़ों साल पुरानी रवायत पर भी सवालिया निशान खड़े करते हुए कहा कि हम नहीं मानते हैं कि देवनागरी में उर्दू लिखी जा सकती है। इस संदर्भ में हमारे फैसले को कहीं चुनौती नहीं दी जा सकती और न ही हमारे ऊपर किसी इतिहास की बात का या किसी साहित्यिक चर्चा या संवाद के प्रमाण से कोई फर्क ही पड़ता है। हमें इस बारे में कोई इतिहास या किसी पत्रकार या किसी इंडस्ट्री की कोई बात नहीं सुननी है। हम अपने फैसले से ही चलेंगे। इंडस्ट्री में भले ही उर्दू को देवनागरी में लिखने की रवायत चल रही है तो हम अपनी रवायत नहीं बदलेंगे।
गौरतलब है कि आईआईएमसी ने हर साल अपने पाठ्यक्रमों को इंडस्ट्री के अनुरूप संशोधित करने का दावा भी करता है और यह भी कि हम अपने पाठ्यक्रमों को बाजार और विद्यार्थियों की जरूरत के हिसाब से लचीला बना रहे हैं और इसमें हर साल सुधार कर रहे हैं लेकिन जैसे ही मामला उर्दू को देवनागरी में लिखने की रवायत का आया तो आईआईएमसी ने देवनागरी प्रेमियों को बड़ा झटका देकर इंडस्ट्री के अनुसार चलने की अपनी घोषणा को ही कुचल दिया।
दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल जवाबी हलफमाने में आईआईएमसी ने साफ लिखा है कि वह देवनागरी लिपि में उर्दू लिखने को मंजूरी नहीं दे सकते, और न ही इस संदर्भ में उसे किसी निर्णय पर पहुंचने के लिए राम मनोहर लोहिया या महात्मा गांधी या किसी अन्य ऐतिहासिक परंपरा की कोई दरकार है। हलफमाने के बिंदु क्रमांक 39 के पैरा CC पेज नंबर-17 पर आईआईएमसी ने कहा है कि हिंदुस्तानी भाषा के संदर्भ में महात्मा गांधी के विचार उर्दू पत्रकारिता में दाखिले के संदर्भ में हमारे अकादमिक फैसले से ऊपर नहीं हैं, इससे हमारा फैसला खारिज नहीं हो सकता।
आईआईएमसी ने राम मनोहर लोहिया की ओर से उर्दू को देवनागरी में लिखे जाने के सुझाव की बाबत जवाब दाखिल किया है कि लोहिया का विचार हमारे अकादमिक मामले में किसी विधिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकता।आईआईएमसी ने दिल्ली उच्च न्यायालय से प्रार्थना की है कि याचिकाकर्ता उपासना कुमारी की अर्जी रद्दकर उस पर जुर्माना ठोंका जाना चाहिए कि आखिर क्यों उसने देवनागरी लिपि में उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा देने के लिए अदालत के सामने केस दायर किया। उससे अदालती कार्यवाही का सारा खर्च वसूला जाना चाहिए।
गौरतलब है कि 27 मई 2026 को आईआईएमसी के पोर्टल पर उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा का विज्ञापन प्रकाशित हुआ था। इसमें स्नातक अर्हता रखी गई थी। साथ में उर्दू लिपि के साथ देवनागरी(हिंदी) में भी प्रवेश परीक्षा कराए जाने का तथ्य भी अंकित किया गया था। इससे उर्दू लिपि न जानने वाले विद्यार्थियों ने भी दाखिले के लिए बड़ी तादाद में आवेदन शुरु किए। जब तक आईआईएमसी प्रशासन विज्ञापन वापस लेता तब तक आधा दर्जन विद्यार्थियों ने आवेदन कर दिए। 6 मई 2026 को जब आईआईएमसी ने नए विज्ञापन में उर्दू लिपि में प्रवेश परीक्षा की नई अनिवार्य शर्त पहली बार अंकित कर दी तो झारखंड की ग्रेजुएट छात्रा उपासना कुमारी पुत्री विजय सिंह और साथ में कुछ अन्य विद्यार्थियों ने फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में फौरन आईआईएमसी और सूचना प्रसारण मंत्रालय से जवाब तलब कर लिया। आईआईएमसी ने जवाब दाखिल कर दिया है। देखना लाजिमी होगा कि अब दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से क्या फैसला आता है।
मामले में अदालत में आईआईएमसी ने कहा है कि वह 6 मई 2026 को जारी प्रवेश सूचना के अनुसार उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा उर्दू लिपि में कराने के लिए आबद्ध है, न्यायालय इस मामले में कोई स्थगन आदेश या राहत याचिकाकर्ता को न दे।
इस संदर्भ में आईआईएमसी ने यह भी रेखांकित किया है कि उर्दू लिपि के साथ देवनागरी में प्रवेश परीक्षा कराए जाने के संदर्भ में 27 मई 2026 को पूर्व प्रकाशित उसका विज्ञापन विभागीय त्रुटि और अनावधानी के कारण प्रकाशित हुआ था और जैसे ही गलती संज्ञान में आई, उसे हटाकर नया नियम लागू कर दिया गया।
हालांकि इस नए नियम पर भी याचिकाकर्ता ने सवाल उठा दिए हैं। याचिकाकर्ता उपासना कुमारी ने दावा किया है कि उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा में उर्दू लिपि की अनिवार्यता आईआईएमसी ने इसके पहले कभी किसी विज्ञापन में अंकित नहीं की है, और न ही इसे किसी अकादमिक काउंसिल या एक्जीक्यूटिव काउंसिल से मंजूरी ही मिली है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि आईआईएमसी मनमाने तरीके से उर्दू पाठ्यक्रम चला रहा है। इसमें हर स्तर पर विद्यार्थियों को हमेशा से प्रवेश परीक्षा से लेकर आंतरिक असाइनमेंट, लैब जर्नल, पत्रिका और सेमेस्टर परीक्षा में भी देवनागरी लिपि का इस्तेमाल कभी मना नहीं किया गया। इस बारे में याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं।
मामले में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि आईआईएमसी के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि आईआईएमसी ने 26 मई को प्रकाशित विज्ञापन में उर्दू लिपि के साथ देवनागरी लिपि में परीक्षा कराए जाने का लिखित उल्लेख किया। किंतु इस पर संस्थान के भीतर कतिपय विवाद उठने के बाद अचानक आईआईएमसी ने देवनागरी के इस्तेमाल के संदर्भ में अपनी इजाजत वापस लेकर उर्दू पत्रकारिता में देवनागरी के इस्तेमाल के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं।
हलफनामें में भारतीय जन संचार संस्थान ने उर्दू पत्रकारिता में देवनागरी पर प्रतिबंध को लेकर कुतर्कों की सारी हदें पार कर दी। मसलन, आईआईएमसी ने दावा किया है कि एक याचिकाकर्ता ने खुद ही आवेदन वापस ले लिया है, जबकि याचिकाकर्ता नंबर-2 आकाश अंबुज का कहना है कि आईआईएमसी ने उसकी फीस अचानक उसके एकाउंट में वापस कर दी। आकाश अंबुज ने अपने वकील के माध्यम से दावा किया है कि आईआईएमसी के अधिकारियो ने केस दाखिल होने के बाद उसे कॉल किया, केस में नोटिस हो जाने के बाद फिर से कॉल किया। वकील के अनुसार, आईआईएमसी का यह बर्ताव विधिक कार्यवाही के समय उचित नहीं था।
मामले में मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के एमए-फिल्म मेकिंग कोर्स को लेकर भी आईआईएमसी ने पैरा-31 पेज नंबर 8 पर झूठा दावा किया है कि उसका पाठ्यक्रम अलग है। गौरतलब है कि मौलाना आजाद उर्दू यूनिवर्सिटी ने अपने एमए-फिल्ममेकिंग(उर्दू) के पाठ्यक्रम में दाखिला परीक्षा उर्दू लिपि में कराए जाने की शर्त हटाकर इसे अंग्रेजी और हिंदी लिपि में भी कराए जाने की बात कही है। आईआईएमसी ने याचिकाकर्ता की ओर से यह पूछे जाने पर कि जब मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी देवनागरी में प्रवेश परीक्षा को अनुमति दे रही है तो आईआईएमसी ने इस बारे में आदेश वापस क्यों लिया है? इस सवाल पर आईआईएमसी ने जवाब दाखिल किया है कि याचिकाकर्ता ने गलत जानकारी दी है।
जबकि मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी के विज्ञापन के अनुसार यह सही है कि एमए-फिल्म मेकिंग की प्रवेश परीक्षा उर्दू लिपि के साथ देवनागरी और अंग्रेजी में भी आयोजित हो रही है। साफ है कि आईआईएमसी ने अदालत के सामने झूठी दलील पेश की है। जवाबी हलफनामे के पैरा 33 में आईआईएमसी ने कहा है कि देवनागरी लिपि में भले ही उर्दू अखबार छपते हैं लेकिन इससे वह उर्दू पत्रकारिता की परीक्षा उर्दू के साथ देवनागरी में कराने के लिए बाध्य तो नहीं है।
पैरा 37 में आईआईएमसी ने कहा है कि देवनागरी में रेख्ता आदि प्रकाशनों की लोकप्रियता का मतलब यह तो नहीं है कि आईआईएमसी अपने उर्दू कोर्स की प्रवेश परीक्षा देवनागरी में कराने लगे। हम प्रवेश परीक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं कर सकते।
आईआईएमसी ने याचिकाकर्ता के इस दावे का खंडन किया है कि पहले उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा और सेमेस्टर परीक्षा में देवनागरी को इजाजत रही है। इसके पक्ष में आईआईएमसी ने सेलेक्टिव सेमेस्टर एक्जाम की कॉपी की प्रतियां एनेक्जर में लगाई हैं, हालांकि प्रवेश परीक्षा की कोई पुरानी कॉपी की प्रतिलिपि आईआईएमसी ने कोर्ट के सामने नहीं रखी है।
दूसरी ओर याचिकाकर्ता ने इंटरनल असाइनमेंट से लेकर लैब जर्नल और अनेक प्रकाशित चीजें अदालत के सामने पेश कर दी हैं जिसमें से साफ जाहिर होता है कि आईआईएमसी में शुरु से दाखिले से लेकर इंटरनल असाइनमेंट और सेमेस्टर परीक्षा में भी उर्दू और देवनागरी दोनों का इस्तेमाल विद्यार्थी कर रहे थे। इस संदर्भ में एक पूर्व छात्र पंकज मेघवाल ने कुलपति को ईमेल कर जानकारी दी है कि उसने खुद देवनागरी में प्रवेश परीक्षा दी थी, हालांकि आईआईएमसी ने उसके सेमेस्टर एक्जाम की उर्दू लिपि की कॉपियां तो कोर्ट के सामने रख दी हैं लेकिन बाकी अन्य दावों पर चुप्पी साध ली है।
आईआईएमसी ने निजी प्रकाशकों की ओर से देवनागरी में उर्दू की पुस्तकें प्रकाशित करने के सवाल को पैरा 39-J में उठाया है और कहा है कि इन प्रकाशनों से उसका फैसला प्रभावित नहीं होता। पैरा 39-I में आईआईएमसी ने निजी चैनलों में देवनागरी में उर्दू के इस्तेमाल पर जवाब दिया है कि ब्रॉडकॉस्ट मीडिया में कुछ पत्रकारों के अभ्यास से हमारा फैसला खारिज नहीं हो सकता।
पैरा 39-M, N और 39-O में आईआईएमसी ने संवैधानिक प्रावधानों के हवाले से कहा है कि उर्दू आठवीं अनुसूची में है और इसमें उसकी लिपि का कोई जिक्र नहीं है। तो भी इससे देवनागरी में उर्दू लिखने की इजाजत नहीं दी जा सकती। पैरा 39-एन में संविधान के अनुच्छेद 343 का जिक्र कर आईआईएमसी ने कहा है कि यह राजभाषा के बारे में है और यह याचिकाकर्ता को ऐसा कोई अधिकार नहीं देती जिसकी वजह से वह ये मांग करे कि उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा देवनागरी में कराई जाए।
आईआईएमसी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बारे में भी कहा है कि शिक्षा का अधिकार हमें इसके लिए बाध्य नहीं कर सकता है कि हम इसके कारण अपने एक्जाम पैटर्न को बदल दें। आईआईएमसी ने भारत समेत दुनिया भर में उर्दू को देवनागरी में लिखने की रवायतों को भी सिरे से खारिज कर कहा है कि ऐसी कोई भी चीज हमें उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा देवनागरी में कराए जाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
पैरा 39-Y और Z में कहा गया है कि हिंदी और उर्दू के बारे में कोई ऐतिहासिक बात या अनेक लिपियों मे इसकी कोई लेखन परंपरा हमें हमारे फैसले से डिगा नहीं सकती।
पैरा 39-EE में कहा गया है कि हिंदी और उर्दू को लेकर भाषा विज्ञान के सिद्धांत से प्रवेश परीक्षा की लिपि तय नहीं होगी। हमारे एक्जाम का जो पैटर्न है वहीं रहेगा। किसी पत्रकार का या किसी विद्वान का क्या मत है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
आईआईएमसी ने पैरा 39 K में कहा कि हिंदुस्तानी, रेख्ता या उर्दू की अनेक लिपि होने के संदर्भ में अनेक ऐतिहासिक, साहित्यिक चर्चाओं बावजूद हमारे निर्णय की वैधानिकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं हो सकता। यह संस्थान का फैसला है कि उर्दू पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा उर्दू लिपि में ही होगी, संस्थान इसे कराने का हक रखता है।
पैरा 39-G में कहा गया है कि प्रवेश के लिए विद्यार्थी कम आ रहे हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं है कि हम आवश्यक एकेडमिक स्टैंडर्ड से समझौता कर लें।