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NGT Clears ₹80,000 Crore Great Nicobar Project

अंडमान-निकोबार में समुद्र तटीय विकास को हरी झंडी

एनजीटी की मंजूरी के बाद 80 हजार करोड़ की ग्रेट निकोबार परियोजना को हरी झंडी, अंडमान-निकोबार में समुद्री विकास को मिलेगी रफ्तार


अंडमान-निकोबार में समुद्र तटीय विकास को हरी झंडी

प्रमोद भार्गव

80,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार परियोजना को एनजीटी की मंजूरी

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की छह सदस्यीय पीठ ने 80,000 करोड़ रुपये की लागत वाली भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ‘ग्रेट निकोबार महा-आधारभूत संरचना परियोजना’ को स्वीकृति दे दी है। इससे जुड़ी चुनौतियों का अब निपटारा हो चुका है। एनजीटी ने माना है कि परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति में ही आवश्यक उपाय शामिल हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने इसके सामरिक और रणनीतिक महत्व को भी रेखांकित किया।

इस परियोजना के अंतर्गत द्वीपसमूह में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट ग्रीनफील्ड टर्मिनल, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और गैस-सोलर पावर प्लांट का निर्माण किया जाना है। यह परियोजना कुल 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है, जिसमें 130 वर्ग किलोमीटर वन भूमि शामिल है। इसी को लेकर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आपत्ति जताई है। इससे पहले सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी इस पर एतराज जता चुके हैं। वर्ष 2021 में इस परियोजना की शुरुआत नीति आयोग ने की थी।

सिंगापुर की तर्ज पर निकोबार के तट का विकास केंद्र सरकार ‘ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना’ (जीएनआई) के अंतर्गत बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है। 40 हजार करोड़ रुपये की इस वृहद परियोजना के तहत कई उप-परियोजनाओं को अंजाम तक पहुंचाने की तैयारी है। हालांकि, परियोजना के क्रियान्वयन से पर्यावरण को बड़े पैमाने पर नुकसान होने की आशंका भी है। परंतु पूरी दुनिया में आधुनिक विकास पर्यावरणीय क्षति की बुनियाद पर ही आगे बढ़ा है।

अंडमान-निकोबार द्वीप प्रशासन ने कुछ समय पहले महान निकोबार द्वीप की दक्षिणी खाड़ी में मुक्त व्यापार भंडारण क्षेत्र विकसित करने के लिए कंटेनर पोतांतरण टर्मिनल की प्रक्रिया आरंभ की है। इससे भारतीय पोत परिवहन को कोलंबो (श्रीलंका), सिंगापुर और मलेशिया के क्लांग बंदरगाह में पोतांतरण का नया विकल्प मिलेगा।

अंडमान-निकोबार का ढांचागत विकास हो जाने पर यहां मछली पालन और अन्य जलीय कृषि (एक्वाकल्चर) का कारोबार बढ़ेगा। न केवल भारत, बल्कि दुनिया के कई देश इस परिप्रेक्ष्य में व्यापार की बड़ी संभावनाएं देख रहे हैं। इसी दृष्टि से पोर्ट ब्लेयर में एक पायलट परियोजना शुरू की गई थी, जिसके परिणाम उत्साहजनक रहे। गुजरात के भावनगर स्थित ‘केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान’ पिछले कई वर्षों से इस दिशा में कार्य कर रहा है।

भारत में लगभग 8,118 किलोमीटर लंबा समुद्र तटीय क्षेत्र है, जहां मछलियों, समुद्री शैवाल और एल्गी का प्राकृतिक उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत इस संपदा को खाद्य उत्पादों में बदलने के लिए 640 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। अंडमान-निकोबार से लेकर पूरे समुद्र तटीय क्षेत्रों में मछुआरों की स्थिति मैदानी इलाकों के गरीब और पराश्रित किसानों जैसी ही है। इन तटीय क्षेत्रों में मछली पकड़कर आजीविका चलाने वाले मछुआरों की संख्या लगभग आठ करोड़ है। बड़ी नदियों में मछली पकड़ने वाले मछुआरों की संख्या भी करीब तीन करोड़ है। स्पष्ट है कि अंडमान-निकोबार क्षेत्र के विकास से तटवर्ती मछुआरों को सीधा लाभ मिलेगा। मछली और सीवीड के कारोबार में वृद्धि होगी, जिससे इस समुदाय की समृद्धि बढ़ेगी।

महान अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह का निकोबार क्षेत्र आरक्षित जैवमंडल (बायोस्फीयर) क्षेत्र में आता है। इसे वर्ष 2013 में विशेष जैवमंडल का दर्जा दिया गया था। भारत में कुल 18 जैवमंडल क्षेत्र हैं, जिनमें से एक निकोबार जनजातीय (आदिवासी) आरक्षित वन भूमि की श्रेणी में आता है। इन परियोजनाओं के लिए अधिसूचित भूमि पर खड़े लगभग 8,52,000 पेड़ों को काटा जाना है। इसी कारण यहां के प्राचीन वर्षावनों को भारी क्षति की आशंका जताई गई थी। यदि इन्हें नुकसान पहुंचता है तो कई दुर्लभ प्राणी और वनस्पतियों की प्रजातियां, साथ ही इस भू-भाग का मानसून भी प्रभावित हो सकता है।

इसके अलावा निकोबार द्वीपसमूह में शेष बचे आदिम जनजातीय समुदायों के प्राकृतिक जीवन पर भी असर पड़ने की आशंका व्यक्त की गई थी। इनमें शोम्पेन और निकोबारी वनवासी जनजातियां शामिल हैं, जिनकी कुल संख्या लगभग 1,761 है। निकोबार एक विशेष प्रजाति के उड़ान न भर सकने वाले पक्षी ‘मेगापोड’ का भी आवास है, जिनके कुल 51 घोंसले पाए गए हैं।

यह परियोजना भारत की सामरिक रणनीति का भी हिस्सा है। इसके पूर्ण होने के बाद भारत चीन को न केवल कड़ा संदेश देने, बल्कि रणनीतिक दबाव बनाने की स्थिति में भी होगा। यदि चीन लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम की सीमाओं पर तनाव बढ़ाता है, तो भारत मलक्का जलडमरूमध्य क्षेत्र में उसकी आर्थिक जीवन रेखा को बाधित करने की क्षमता हासिल कर लेगा।

भारत ने वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ जिन ‘लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट’ को लागू किया है, वे रणनीतिक, सामरिक सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये समझौते सैन्य, रसद और पेट्रोलियम सुविधाओं के आदान-प्रदान से जुड़े हैं। चीन के बढ़ते सैन्य और आर्थिक प्रभाव को देखते हुए इनकी अहमियत और बढ़ जाती है।

सिंगापुर, हांगकांग और दुबई पहले ही यह दिखा चुके हैं कि किस तरह द्वीपों और समुद्री तटों को विकसित कर सामरिक और व्यापारिक महत्ता को एक साथ बढ़ाया जा सकता है। भारत निकोबार में भी यही प्रयास कर रहा है। एनजीटी की मंजूरी के बाद अब इस परियोजना को मूर्त रूप देने की राह की बाधाएं काफी हद तक दूर हो गई हैं।

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