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Emergency Story: Hunger, Jail and Courage

आपातकाल की आपबीती: जब रोटी में रेत थी और इरादे पत्थर जैसे

आपातकाल के दौरान गुना के कन्हैयालाल रजक ने जेल में यातनाएं झेलीं, लेकिन अपने विचारों से समझौता नहीं किया। पढ़िए संघर्ष, भूख और लोकतंत्र की यह मार्मिक कहानी।


आपातकाल की आपबीती जब रोटी में रेत थी और इरादे पत्थर जैसे

अभिषेक शर्मा

कुंभराज के निवासी कन्हैयालाल रजक बेहद साधारण परिवार से थे। कपड़े धोना और प्रेस करना ही उनके परिवार का मुख्य साधन था। सीमित साधनों के बावजूद वे राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरित होकर सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहते थे। यही सक्रियता आपातकाल में उनके लिए मुसीबत बन गई।

आपातकाल लागू होते ही पुलिस उनके घर पहुंची और बिना किसी स्पष्ट आरोप के उन्हें यह कहकर ले गई कि साहब बुला रहे हैं। उन पर मीसा नहीं लगी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें तीन महीने तक जेल में रखा गया।जेल का जीवन अमानवीय था। उनके पोते दिलीप रजक बताते हैं कि उन्हें गुना के साथ ग्वालियर और जबलपुर जेलों में भी रखा गया। वहां उन्हें जो भोजन दिया जाता था, वह इंसान के खाने लायक नहीं था।

आटे में रेत मिलाकर रोटी और कंकड़ वाली दाल दी जाती थी। कई बार उन्हें भूखे रहना पड़ता था। सिर्फ भोजन ही नहीं, मानसिक और शारीरिक यातनाएं भी दी जाती थीं। उन्हें मारपीट कर यह कहने के लिए मजबूर किया जाता था कि वे आपातकाल का समर्थन करें, लेकिन उन्होंने किसी भी कीमत पर अपने विचारों से समझौता नहीं किया।इधर, घर की स्थिति भी कम भयावह नहीं थी। परिवार पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर था। कन्हैयालाल के जेल में होने से आय का एकमात्र साधन बंद हो गया।

उनकी भतीजी की शादी थी, लेकिन वे उसमें शामिल नहीं हो सके। पत्नी मोतीबाई पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। छोटे छोटे बच्चों के बीच भोजन जुटाना भी कठिन हो गया। बेटा गजानंद पढ़ाई छोड़कर घर आ गया और मां का हाथ बंटाने लगा। परिवार के सामने दोहरी चुनौती थी - पेट भरना और पिता की चिंता। कन्हैयालाल का पूरा जीवन संघर्ष में बीता। उन्होंने कभी सुविधाओं की मांग नहीं की, केवल अपने सिद्धांतों पर टिके रहे। वर्ष 2020 में उनका निधन हुआ, लेकिन संघर्ष यहां भी खत्म नहीं हुआ। कोरोना काल में उनकी अस्थियां समय पर गंगा में प्रवाहित नहीं हो सकीं। कुछ ही समय बाद उनके पुत्र गजानंद का भी निधन हो गया। पोते ने दोनों की अस्थियां सहेजकर रखीं और लॉकडाउन हटने के बाद प्रयागराज जाकर विसर्जन किया। यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस दौर की है, जब लोकतंत्र की कीमत गरीब परिवारों ने अपने हिस्से की रोटी और आंसुओं से चुकाई।

आपातकाल केवल सत्ता और विरोध की लड़ाई नहीं था, यह उन घरों की कहानी भी था जहां रोजमर्रा की जिंदगी अचानक संघर्ष में बदल गई। गरीब परिवारों के लिए यह दौर और भी कठिन था, जहां एक ओर रोजी रोटी का संकट था, वहीं दूसरी ओर अपमान, भय और अनिश्चित भविष्य का बोझ। गुना के कन्हैयालाल रजक की कहानी इसी त्रासदी और अडिगता की ऐसी मिसाल है, जिसमें भूख, यातना और गरीबी के बीच भी लोकतंत्र के प्रति विश्वास नहीं टूटा।

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