आपातकाल 1975 के दौरान भोपाल के सत्यनारायण शर्मा की 18 महीने की जेल यात्रा का उल्लेख। राष्ट्रपति पर हमले के झूठे आरोप, भूमिगत गतिविधियाँ और बाद में शिक्षा व सामाजिक कार्यों में योगदान की कहानी सामने आई
विनोद दुबे
भोपाल। भोपाल के रोहित नगर निवासी सत्यनारायण शर्मा का जीवन आपातकाल के उस दौर का सजीव दस्तावेज है, जब असहमति को अपराध मान लिया गया था। अक्टूबर 1975 में भोपाल में समन्वय भवन के उद्घाटन के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के आगमन की तैयारी चल रही थी। इसी बीच पुलिस ने शर्मा की गिरफ्तारी के लिए हर संभव प्रयास शुरू कर दिए।
जब वे पुलिस के हाथ नहीं आए, तो दबाव बनाने के लिए उनके परिजनों को उठा लिया गया। यह खबर मिलते ही सत्यनारायण शर्मा अपने साथियों प्रभाकर केलकर, प्रदीप खंडेकर और ओमप्रकाश शर्मा के साथ स्वयं थाने पहुंच गए और गिरफ्तारी दे दी।
जब उन्होंने अपना अपराध पूछा, तो पुलिस ने जो आरोप लगाया, वह चौंकाने वाला था-उन पर राष्ट्रपति को बम से उड़ाने की साजिश रचने का आरोप था। दो दिन तक उन्हें धारा 151 के तहत थाने में रखा गया, इसके बाद मीसा लगाकर जेल भेज दिया गया। इस तरह वे करीब 18 महीने तक जेल में रहे। उस समय उनकी उम्र केवल 28 वर्ष थी और वे संघ में तात्याटोपे मंडल कार्यवाह का दायित्व निभा रहे थे। प्रांत प्रचारक बाबा साहब नातू के मार्गदर्शन में वे आपातकाल विरोधी गतिविधियों में सक्रिय थे। आपातकाल के दौरान काम करने का तरीका पूरी तरह गुप्त था। संदेशों का आदान प्रदान बेहद सावधानी से किया जाता था। पत्रों पर नाम और पता लिखने के बजाय उन्हें याद रखा जाता था, ताकि पकड़े जाने पर किसी का भेद न खुले। हर व्यक्ति का एक कोड होता था, जिसे बताए बिना घर वाले भी मिलने नहीं देते थे। यह व्यवस्था संगठन की सुरक्षा के लिए आवश्यक थी।
शर्मा बताते हैं कि वे कई महीनों तक अंडरग्राउंड रहकर पर्चे बांटते, संदेश पहुंचाते और गिरफ्तार साथियों के परिवारों की मदद करते रहे। पुलिस और सीआईडी लगातार उनकी तलाश में लगी थी। जब वे पकड़ में नहीं आए, तो पुलिस ने उनके पिता स्व. रामचंद्र शर्मा और दोनों भाइयों को उठा लिया। घर में भारी तनाव की स्थिति बन गई।अंततः उन्होंने स्वयं जाकर गिरफ्तारी दी। इसके बाद पिता और बड़े भाई को तो छोड़ दिया गया, लेकिन छोटे भाई पर भी मीसा लगाकर उसे जेल में ही रखा गया।
जेल में उनके छोटे भाई की तबीयत बिगड़ गई और वे मानसिक तनाव से गुजरने लगे। ऐसे समय में स्व. कुशाभाऊ ठाकरे ने मानवीय संवेदनशीलता का परिचय दिया। वे उनके भाई को समझाते, सांत्वना देते और जरूरत पड़ने पर उनके हाथ पैर तक दबाते थे।जेल से छूटने के बाद भी सत्यनारायण शर्मा का जीवन संघर्ष और सेवा के रास्ते पर ही आगे बढ़ा। उन्होंने केन्द्रीय
विद्यालय की सरकारी नौकरी छोड़कर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का निर्णय लिया। लक्ष्मीकांत मुकादम 'अन्नाजी' के प्रेरक शब्दों ने उन्हें यह रास्ता चुनने के लिए प्रेरित किया। वे विद्याभारती में प्रांतीय निरीक्षक और प्रधानाचार्य बने तथा दीनानाथ बत्रा के साथ शिक्षा बचाओ आंदोलन से जुड़े।आपातकाल समाप्त होने के बाद उन्होंने शिशु मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए पूरे प्रदेश में अभियान चलाया। अधिकारियों से मिलकर उन्होंने इस कार्य को सफल बनाया। बाद में विश्व हिन्दू परिषद और अन्य संगठनों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण दायित्व निभाए।
उनके व्यक्तिगत जीवन में भी संघर्ष कम नहीं था। कम वेतन के कारण उनकी सास विवाह के लिए तैयार नहीं थीं, लेकिन स्व. कैलाश नारायण सारंग के आश्वासन के बाद 1980 में उनका विवाह हुआ।सत्यनारायण शर्मा का पूरा जीवन इस बात का उदाहरण है कि विपरीत परिस्थितियों में भी यदि संकल्प मजबूत हो, तो व्यक्ति अपने सिद्धांतों से डिगता नहीं। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि साहस और त्याग से होती है।
परिवार पर संघ संस्कारों की अमिट छाप: श्री शर्मा के परिवार में राष्ट्र प्रेम और देशभक्ति के संघ प्रेरित संस्कारों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके बेटे अभिषेक शर्मा, जो विदेश ( चेक गणराज्य) में नौकरी करते हैं, भारत में होने वाले चुनाव के दौरान वे मतदान के लिए और संघ के वार्षिक पथ संचलन में शामिल होने जरूर आते हैं।
आपातकाल के दिनों में सत्ता का भय इतना गहरा था कि निर्दोष लोगों पर भी गंभीर आरोप गढ़कर उन्हें जेल भेज दिया जाता था। भोपाल के सत्यनारायण शर्मा की कहानी इसी सच को उजागर करती है, जहां गिरफ्तारी के लिए राष्ट्रपति पर हमले की साजिश जैसा झूठा आरोप तक गढ़ लिया गया, लेकिन उन्होंने अपने विचारों और साहस से कभी समझौता नहीं किया।