स्व. डॉ. राधेश्याम द्विवेदी की जयंती पर विशेष लेख। स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार, इतिहासकार और विधि विशेषज्ञ के प्रेरक जीवन की झलक।
माधवशरण द्विवेदी
शिवपुरी की माटी के सच्चे सपूत, गौरवनिधि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, विधि वेत्ता, इतिहासज्ञ, भाशाविद, कवि, सम्पादक, पत्रकार, बहुआयामी व्यक्तित्व डॉ. राधेश्याम द्विवेदी क्रियाशील व्यक्तित्व के धनी थे। वह जल में कमलगत रहकर निरन्तर अपने लेखन कार्य में निरत रहे, संकीर्णता और स्वार्थपरता की आंधी उनके व्यक्तित्व को छू तक नहीं पायी, मानवीय संवेदना, सरलता, सौम्यता, सद्व्यवहार, साधना के लिए समर्पण भाव जैसे उच्च कोटी के गुण उनमें थे। वह बुन्देलखण्ड क्षेत्र की एक ऐसी विभूति के रूप में रहे जिन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफलता हासिल की थी। वह दीर्घकाल से साहित्य साधना में संलग्न रहे हैं। इस कालखण्ड में उन्होंने अनेक कृतियाँ देकर हिन्दी साहित्य की समृद्धि में असाधारण योगदान किया है। एक कवि के रूप में उनकी अनेक रचनायें प्रकाश में आयी हैं। आज 26 फरवरी डॉ राधेश्याम द्विवेदी जी के जन्मदिन पर श्री उनके ललित साहित्य अन्तर्गत सम्पूर्ण सृजन निम्नानुसार है -
काव्य :-
कल्याणी कैकेयी (प्रबंध काव्य) उच्च कोटी का काव्य है जिसमें उन्होंने कैकेयी के उदात्त चरित्र को उद्घाटित कर उसकी चारित्रिक कालिमा को पूरी तरह धो दिया है, उसे नये दृश्टिकोण से प्रस्तुत कर कल्याणी निरूपित करने में सफलता पायी है। यह जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर के स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम में रही है। इस काव्य को रामकथा विशयक शोध ग्रन्थों में अनेक बार रेखांकित किया गया है। यह साकेत की परम्परा का चर्चित काव्य ग्रंथ रहा है, इसमें नारी की गरिमा को प्रतिश्ठित किया है। इसकी भूमिका महाकाव्य साकेत के सर्जक राश्ट्रकवि स्व. श्री मैथिलीशरण गुप्त ने लिखते हुए स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया था। भारत के अनेक प्राध्यापकों, हिन्दी विभागाध्यक्षों एवं विश्विद्यालयों की अनुशंसा पर विभिन्न प्रांतों व मध्यप्रदेश के अनेक छात्रों ने इस पर अपने शोध कार्य किये।
युगप्रवर्तक गांधी, रावी के तट पर, गुन-गुन की कवितायें न केवल पठनीय हैं वरन सत्य अंहिसा, इतिहास, आदर्श और स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करने वाली हैं, देश के गौरव को प्रकाशित करती हैं।
नाटक :-
अशिक्षा का अभिशाप, सामाजिक विशमता, मैं भारतीय हूँ, अर्दली का चपरासी।
निबंध :-
शांतिसुधा, अपने गाँव, नवदुर्गा, विशाल भारत के अमूल्य रत्न।
उपन्यास :-
बेतवा के बुन्देले इतिहास का जीवन्त शोध है इसमें अनेक स्थल ऐसे हैं जिनमें उनकी कवित्व शक्ति के दर्शन होते हैं। ओरछा के शासक रामशाह का भाई वीर सिंह देव व इन्द्रजीत थे। इन्द्रजीत और प्रवीण राय का गन्धर्व विवाह हुआ था अकबर के पुत्र सलीम को बुन्देला राजा वीर सिंह देव ने दिल्ली की गद्दी प्राप्त करने में सहायता की थी इसलिये सलीम ने वीर सिंह देव को ओरछा का राजा घोशित कर दिया था। ओरछा की रक्षा के लिए प्रवीण राय ने स्वयं को मुगल बादशाह अकबर के दरबार में कलाकार के रूप में प्रस्तुत कर ओरछा के मान की, सम्मान की किस प्रकार रक्षा की, रोचक एवं पठनीय वृतांत उपन्यास में है। अकबर से लेकर औरंगजेब तक के मुगल साम्राज्य के इतिहास का विस्तृत विवरण इस उपन्यास में उपलब्ध होता है।
इतिहास :-
विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से ‘‘हिन्दी भाशा एवं साहित्य में ग्वालियर क्षेत्र का योगदान‘‘ विशय पर उन्होनें पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की, आपके इस विद्वतापूर्ण शोध प्रबंध में ग्वालियरी भाशा के स्वरूप और उत्कर्श तथा मध्ययुग के विभिन्न राजवंशों के तत्कालीन सन्दर्भ तथा इतिहास का बहुमुखी विवरण है। इसमें डॉ. द्विवेदी ने यह सिद्धी करने का प्रयास किया है कि मध्ययुग ग्वालियर साहित्य एवं संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था। जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर ने आपके शोध प्रबंध ‘‘मध्ययुगीन लौकिक काव्य और छिताई चरित‘‘ पर आपको डी.लिट की उपाधि प्रदान की छिताई चरित एक मनोहर प्रेमाख्यान है जिसमें सौरसी और छिताई की प्रेमकथा वर्णित है। हिन्दी भाशा एवं साहित्य का यह अत्याधिक शोधपरक बहुमूल्य ग्रन्थ है।
उनके व्यक्तित्व का प्रमुख पक्ष है कानून की विशेशज्ञता, कानून के साहित्य का गहन अध्ययन कर उन्होंने कानून की दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का हिन्दी में सृजन कर विधि के क्षेत्र में हिन्दी भाशा में सामर्थ एवं सक्षमता सिद्ध कर दी। विधि के ग्रन्थों का हिन्दी में सृजन कर साहित्य के व्यावहारिक पक्ष को समाजोपयोगी बनाया, जिससे प्रदेश ही नहीं अन्य प्रदेश के लोग भी लाभान्वित हो रहे हैं। आपको हिन्दी में लिखी पुस्तक म.प्र. सम्पत्ति कर अधिनियम पर भाशा पुरस्कार से 28 अगस्त 1986 को सम्मानित किया गया था।
पराधीन भारत में अंग्रेजों के विरूद्ध हुये स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर उन्होनें अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम और राश्ट्रभक्ति का परिचय दिया है। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भूमिगत रहकर सहयोग दिया और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्त किया, जब स्वतंत्रता सेनानियों को स्वतंत्र भारत में धन, साधन और सुविधायें दी जाने लगीं तो श्री द्विवेदी उस लौलुपता में नहीं डूबे एवं अपनी पुरानी स्वभावगत सादगी में जीवन यापन करते रहे। अनेक सामाजिक तथा अर्द्धशासकीय प्रसिद्ध संस्थाओं में कार्यरत रहते हुए भी उन्होंने कभी अपने सादगी, ईमानदारी, कर्तव्य परायणता, उद्यामिता, स्वच्छता, निश्पक्षता के वृत्ति का त्याग नहीं किया, उन पर सरस्वती की कृपा थी, ऐसा कोई विशय नहीं होगा जिस पर उनकी सार्थक और प्रेरक कलम न चली हो। समय की पाबन्दी उनकी सबसे बड़ी अनुकरणीय और प्रेरक विशेशता थी।
उनका जन्म 26 फरवरी 1921 को म.प्र. के शिवपुरी जिले की करैरा तहसील मुख्यालय पं. केशव प्रसाद दुबे और श्रीमती सरयू देवी के घर हुआ था। उनके पिता अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी, उर्दू में आलिम फाजिल थे एवं दाण्डिक मामलों के विशेशज्ञ थे। अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र होने के कारण एवं उनके पिता के आर्थिक स्थिति दयनीय होने से उन्हें बाहर अध्ययन के लिये नहीं भेजा जा सकता था। इसलिये उन्होंने हाईस्कूल, इन्टरमीडियेट, बी.ए., एवं एम.ए. (हिन्दी) परीक्षायें घर पर ही अध्ययन कर प्राईवेट रूप से अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की थी।
सन् 1955 में जब वह नगर पालिका करैरा के अध्यक्ष पद पर कार्य कर रहे थे तब उन्होंने 1857 के प्रथम अमर शहीद सैनानी मंगल पाण्डे की मूर्ति उन्होंने पूर्व न्यायालय भवन करैरा के बाहर प्रांगण में उसे जयपुर से तैयार करवाकर स्थापित कराई थी। राश्ट्रीय सेवा एवं स्वतंत्रता को समर्पित सैनिक के राश्ट्रीय नागरिक सम्मान का प्रतीक वह प्रांगण आज भी एक श्रद्धापीठ है। उस समय उन्होंने जनता की सुविधा हेतु करैरा मुख्यालय की कॉलोनियों में सड़कों का निर्माण कराया था एवं शासकीय कन्या हायर सैकेण्डरी स्कूल करैरा के शाला भवन का निर्माण उनके मित्रों से शाला हेतु भूमि दान में दिलवाकर कराया था।
1973 से 1981 तक बोर्ड ऑफ रेवेन्यू में वकालात की थी। सन् 1980 में ऑनरेडी कोडी फिकेशन ऑफीसर नगर निगम ग्वालियर में रहे। आज आवश्यकता है उनसे प्रेरणा ग्रहण करके उन जैसा साधक बनने का प्रयास करने की एवं उनका जीवन सब लोगों को श्रेश्ठ आदर्शों के मानदण्डों को बनाये रखने की प्रेरणा करता है।
(लेखक - माधवशरण द्विवेदी पूर्व उप प्राचार्य रहे हैं)