Breaking News
  • महाराष्ट्र के अकोला-वर्धा सबसे गर्म पारा 45°C पहुंचा, MP-छत्तीसगढ़ में लू का अलर्ट
  • उत्तर प्रदेश में 44 ASP अफसरों के तबादले, श्रेष्ठा ठाकुर को ATS लखनऊ भेजा
  • MP की 23634 पंचायतों, 444 तहसीलों में लगेंगे विंड सिस्टम, हर 15 मिनट में मौसम और बारिश की जानकारी मिलेगी
  • उत्तर प्रदेश में 40 IAS के ट्रांसफर, 15 जिलों के DM बदले
  • तमिलनाडु में पटाखा फैक्ट्री में धमाका, 23 की मौत, रेसक्यू के दौरान दूसरा ब्लास्ट, बचाव में जुटे 13 लोग घायल
  • अमेरिका का चीन से आ रहे ईरानी जहाज पर कब्जा, ईरान ने कहा- जल्द जवाब देंगे

होम > विशेष

India's 11 Crore DNT/NT/SNT Communities Ignored

असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं? - कैलाश चन्द्र

भारत में 11 करोड़ DNT/NT/SNT समुदाय आज भी मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। वहीं LGBTQ+ विमर्श को व्यापक समर्थन मिल रहा है। असली सामाजिक मुद्दों की उपेक्षा पर गहन विश्लेषण।


असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं  - कैलाश चन्द्र

भारत में लगभग 8 से 11 करोड़ की आबादी वाला घुमन्तु, अर्ध-घुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजाति समुदाय (DNT/NT/SNT) स्वतंत्रता के 77 वर्षों बाद भी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्षरत है। इन्हें अब भी स्थायी पता, पहचान-पत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं की पहुँच जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित माना जाता है। लेकिन इसी बीच, देश में एक अन्य विमर्श LGBTQ+ अधिकार राष्ट्रीय संवाद के केंद्र में स्थापित किया जा रहा है, जबकि भारत में LGBTQ+ आबादी का अनुमान 5–6 लाख के बीच है। यह असमानता सवाल खड़ा करती है कि क्या भारतीय समाज का ध्यान उसके मूलभूत सामाजिक प्रश्नों से हटाया जा रहा है?

 11 करोड़ की आबादी फिर भी अदृश्य

Renke Commission (2008) और Idate Commission (2018) की रिपोर्टों के अनुसार
• DNT/NT/SNT समुदायों की वास्तविक जनसंख्या 8–11 करोड़ के बीच
• राष्ट्रीय जनगणना में कभी अलग श्रेणी में शामिल नहीं
• स्थायी पते/दस्तावेज़ों की कमी
• योजनाओं तक न्यूनतम पहुँच
• सामाजिक अविश्वास और ऐतिहासिक कलंक
स्रोत:
• National Commission for Denotified, Nomadic and Semi-Nomadic Tribes, Renke Report (2008)
• Idate Commission Report (2018), Ministry of Social Justice & Empowerment
इन रिपोर्टों के अनुसार, 1871 के Criminal Tribes Act की ऐतिहासिक छाया आज भी इन समुदायों पर प्रभाव डालती है।

 दूसरी ओर, LGBTQ+ विमर्श को मिल रहा है अभूतपूर्व वैश्विक समर्थन

अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग रिपोर्टों और NGO डेटाबेस विश्लेषण बताते हैं कि
• Ford Foundation
• Open Society Foundations
• Human Rights Campaign International
• UNDP – LGBTQI Inclusion Fund
• Gates–linked social equity initiatives
इन सभी द्वारा लाखों डॉलर के प्रोग्राम भारत में सक्रिय हैं।

इनका फोकस मुख्यत 
• queer studies
• gender identity programmes
• social inclusion campaigns
• pride events
• school/university curriculum intervention
स्रोत:
• OECD Development Assistance Data (LGBTQ+ global funding trends)
• Foundation Center (US) – Global Human Rights Funding Report 2023
• UNDP India – Inclusion & Diversity Initiative Documents

  लिट फेस्ट, फिल्म फेस्ट, सोशल मीडिया कॉन्क्लेव: एजेंडा किसका?

देश के प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों
• Literature Festivals
• Film Festivals
• Book Festivals
• Social Media Conclaves
• Gender Dialogues Conferences
 में पिछले 5 वर्षों में LGBTQ+ थीम आधारित कार्यक्रमों में 200–400% की वृद्धि दर्ज की गई है। इन आयोजनों के वित्तपोषण में भी विदेशी NGO’s और कॉर्पोरेट ब्रांड प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
स्रोत:
• Event Industry Annual Funding Survey, 2021–24
• India Culture & Arts Funding Report, FICCI (2023)
इसके उलट, DNT/NT/SNT समुदायों पर केंद्रित न तो कोई राष्ट्रीय फेस्टिवल, न कोई बड़े मीडिया-हाउस का विमर्श, न ही अकादमिक महाविद्यालयों में कोई प्रभावी पाठ्यक्रम मौजूद है।

 पाठ्यक्रमों में LGBTQ+ अध्ययन, पर घुमन्तु समाज पर लगभग मौन

भारत के 37 विश्वविद्यालयों में
• gender studies
• queer studies
• sexuality studies
जैसे पाठ्यक्रम औपचारिक रूप से जोड़े गए हैं।
लेकिन DNT/NT/SNT समुदायों के इतिहास, संस्कृति और अधिकारों पर आधारित किसी भी व्यापक पाठ्यक्रम का अभाव है।
स्रोत:
• UGC Curriculum Reforms Data (2020–2024)
• CUET Domain Curriculum Mapping 2023

क्या ध्यान भटकाने की वैश्विक रणनीति?

विशेषज्ञ यह मानते हैं कि वैश्विक कॉर्पोरेट–NGO नेटवर्क उन विषयों को प्राथमिकता देता है जो उनकी वैचारिक छवि से मेल खाते हों, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उपयोगी हों, आर्थिक बाजार के नए उपभोक्ता–वर्ग बनाते हों। इस परिप्रेक्ष्य में, घुमन्तु, अर्धघुमन्तु समुदाय जैसे विषय उनके लिए “अदृश्य” रहते हैं।
संदर्भ:
• Philip Altbach, Globalization and the University (World Bank Papers)
• Arundhuti Roy, NGO–ization of Resistance
• Noam Chomsky, Manufacturing Consent (Media–agenda theory)

 राष्ट्रीय विमर्श से गायब 11 करोड़ लोग

भारत में • LGBTQ+ समुदाय का सम्मान और अधिकार आवश्यक हैं पर 11 करोड़ लोगों के मूल अधिकार, पहचान, आवास, शिक्षा और आजीविका राष्ट्रीय विमर्श से लगभग अनुपस्थित हैं। विशेषज्ञ इसका कारण बताते हैं
• विदेशी एजेंडा–सेटिंग
• भारतीय मीडिया की शहरी–उदारवादी प्राथमिकताएँ
• कॉर्पोरेट ब्रांडिंग का प्रभाव
• NGO नेटवर्क की फंडिंग प्राथमिकताएँ
• भारतीय “मूल मुद्दों” के प्रति विमर्श की उपेक्षा

 मुख्य प्रश्न - देश को सोचना होगा 

 भारतीय समाज को असली चुनौतियों से हटाकर कृत्रिम वैश्विक मुद्दों पर कौन और क्यों केंद्रित कर रहा है? 11 करोड़ DNT/NT/SNT लोगों को अधिकार कब? भारत के सामने अब दो ज़िम्मेदारियाँ हैं
• LGBTQ+ समुदाय का सम्मान व कानूनी सुरक्षा
• DNT/NT/SNT समुदायों का ऐतिहासिक पुनर्वास और पहचान
रिपोर्टें बताती हैं कि दूसरा विषय कहीं अधिक बड़ा, गहरा और मानवीय संकट से जुड़ा हुआ है।

इस लेख के लिए मुख्य सन्दर्भ सूची (Reference List)

सरकारी समितियाँ और रिपोर्टें से ली गई हैं इनमें

• Renke Commission Report, Ministry of Social Justice & Empowerment, Government of India (2008)
• Idate Commission Report, MSJE, Government of India (2018)
• Registrar General of India – Census Framework Notes
• UGC Curriculum Reforms Data (2020–2024)

वैश्विक संस्थाएँ और फंडिंग अध्ययन

• OECD – Global Human Rights Funding Database (2022–23)
• Foundation Center (US) – Human Rights Funding Report 2023
• UNDP India – LGBTQI Inclusion Strategy Documents
• FICCI Report on Culture & Art Funding (2023)

शोध और विश्लेषण

• Noam Chomsky – Manufacturing Consent
• Arundhuti Roy – Essays on NGO–ization
• Philip Altbach – Globalization and Higher Education

भारतीय सामाजिक अध्ययन स्रोत

• Indian Social Exclusion Studies Journal (TISS)
• EPW – Articles on Denotified Tribes (2010–2022)

Related to this topic: