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Datagiri in Electoral Democracy

चुनावी लोकतंत्र में वोटरों से 'डाटागीरी'..!

चुनावी लोकतंत्र में डेटा और डिजिटल रणनीति का बढ़ता असर। पुराने नारों के दौर से लेकर आज के स्मार्टफोन युग तक वोटर और चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव।



चुनावी लोकतंत्र में वोटरों से डाटागीरी

जयराम शुक्ल

अगले तीन महीनों में बंगाल, असम, तामिलनाडु, पुन्डुचेरी और केरल जैसे राज्यों में चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। फर्जी वोटरों को अंतिम तौरपर छांटने के साथ ही तिथियों की घोषणा हो जाएगी। चुनाव मेरे लिए हमेशा से कौतूहल का विषय रहे हैं। मीडिया में आने के बाद तो समझिए किसी जश्न से कम नहीं। बिना मगजमारी के विषयवस्तु मिल जाता है। पन्ने पर पन्ने रेंगते रहिए, सबकुछ अनुमान के आधार पर। चुनाव, हम मीडियावी दुनिया के लोगों को ज्योतिषी बनने का मौका देता है। किसे टिकट मिलेगी, कौन जीतेगा, किसकी सरकार बनेगी, बनेगी तो मुख्यमंत्री कौन होगा। हममें से कई वरिष्ठ साथी ज्योतिषियों से भी सटीक भविष्यवाणी कर लेते हैं।

चुनावी रिपोर्टिंग में जडमति भी सुजान हो जाते हैं। चुनावी रिपोर्टिंग के निष्पक्ष होने की गुंजाइश बहुत कम ही होती है, बजह रिपोर्टर भी एक वोटर होता है, उसकी पसंदगी-नापसंदगी होती है। उसी को वह अपने तकों के साथ बुनकर परोसता है। और अब तो मीडिया मैनेजमेंट का युग है, सबकुछ स्क्रिप्टेड होता है। मसलन हवा किसकी बनानी है पलड़ा किधर झुकाना है। किसके किस्से खन-खोद के उघाड़ने है किसके दफन रहने देने हैं। वैसे यह बिलकुल बाजीगरी होती है। आप जो दबाओगे तो दूसरा उसे उधेड़ देगा। सो इसलिए चुनाव की रिपोर्टिंग भी मजे के लिए करनी चाहिए और पढ़कर उसका मजा लेना चाहिए, ज्यादा सीरियस होना अधकपारी को न्योता देने जैसा है। वोटर यह समझने भी लगा है। समझे भी क्यों न, उसके पास स्मार्टफोन है, सूचनाओं की दुनिया उसकी भी मुटठी में भी समा चुकी है। अब तो जबतक आप विश्लेषण करने का मूड बना रहे होते हैं.. तब तक वह कई सूचनाएं वह आपके सामने विश्लेषणों के साथ पटक चुका होता है।

आजादी के बाद से अबतक में समाज, चुनाव और मीडिया 360 डिग्री घूम चुका है, बदल चुका है। यदि नहीं बदला है तो चुनाव को लेकर आम आदमी का कौतुक। अभी भी वह बड़ी दिलचस्पी के साथ चुनावों के दिन एक-एक करके गिनता है। चुनाव, नेता और राजनीति का पहली बार भान हुआ 67-68 में, तब मैं पाँच छह बरस का था। हम बच्चे लोग सुबह से ही चोंगा वाली गड़ियों के इंतजार में रहते थे। प्रचार करने वाले हम बच्चों से नारे लगवाते थे फिर उसके एवज में टिन के बिल्ले बाँटते थे। फिर पर्चियां लुटाते हुए आगे निकल जाते थे। हर पार्टी की प्रचार गाड़ियां बारी-बारी से आती थीं। गांव में कुछेक लोगों को छोड़ बाकी सब अपने-अपने खेत-खलिहानों में मस्त रहते थे। तबका एक नारा आज भी याद है वोट तुम्हारा कहाँ पड़ेगा.. फलाने (चुनाव चिन्ह) वाली पेटी में।

ईवीएम की टेंपरिंग पर रिपोर्टिंग करने वाली नई पीढ़ी के खबरनवीसों को शायद यह पता नहीं होगा कि तब अलग-अलग दलों के लिए पेटियांभी अलग-अलग होती थी.। एजेंट अपनी-अपनी पेटियां ताकते थे। चुनाव के बाद जब वहीं पेटियां वाहनों पर रखीं जाती तो पार्टी के समर्थक और एजेंट होने वाले के मनोभावों को ऑकतें कि कौन वाली पेटी ज्यादा वजनी है.गांवों में प्रधान के घर अखबार आते थे वह भी डाक से, छपने के दो-चार दिन बाद। शाम को लोग प्रधान की दहलान पर रेडियो की खबर सुनने जाते। खबर में सत्ताधारी दलों के नेताओं का ही ज्यादा बखान होता। आमतौर पर प्रधान पहले किसी भी दल का रहा हो चुनाव जीतने के बाद वह सरकार का आदमी मान लिया जाता है और उसी हिसाब से उसके विश्वसनीयता। कहे की लेकिन एक बात जो सबसे ज्यादा असर करती थी वे थे पार्टियों के नारे। एक लाइन के नारे में कमाल का संदेश होता था। नारे वैसे ही उड़कर गाँवों तक पहुँचते थे जैसे की अफवाहें। पर गांव के वोटर में नारों और अफवाहों में के बीच का भेद समझने का विवेक था। आज तो स्मार्टफोन और इंटरनेट युग में अफवाहें, झूठी खबरे और टेंपर्ड तस्वीरे सच को घेरे और दबाए रखती हैं..। इस लिहाज से तब का वोटर ज्यादा समझदार था।

डाक्टर लोहिया से सरकारी मीडिया परहेज ही रखता था, अखबार भी आज की भाँति ज्यादातर सरकार के चारण होते थे। लोहिया जी का हमारे विंध्य में नेहरू-इंदिरा से ज्यादा बोलबाला था। उनके नारे आग लगाने का काम करते थे। मुझे उस दौर के कई नारे आज भी याद है-

भूखी जनता चुप न रहेगी, धन और धरती बंट के रहेगी।

रोजी-रोटी दे न सके जो वो सरकार निकम्मी है,

जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है।

लोहिया ने इलाकेदारों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया तो गाँव-गाँव से नारे निकलकर आए-कितनी ऊँची जेल तुम्हारी देख लिया और देखेंगे। ये दीवाने कहाँ चले..! इंदिरा तेरी जेलों में। जेल के फाटक टूटेंगे, हमारे साथी छूटेंगे। ये नारे स्वस्फूर्त जन में प्रभावशाली संवाद कायम करते थे। ऐसे ही आंदोलनों से राजनीतिक कार्यकर्ता दीक्षित और शिक्षित होते थे। चुनाव के समय कई नारे पब्लिक के बीच से निकलकर आते थे मसलन.. कांग्रेस के सड़ियल बैल, खा गए गल्ला पी गए तेल।

कांग्रेस को जब गाय-बछड़े का चुनाव चिन्ह मिला तो उकताई पब्लिक ने इसे इंदिरा के साथ संजय के साथ जोड़ दिया। ये सत्तर के दशक की बात है.. जनसंघ का चुनाव चिन्ह जलता हुआ दिया था-कांग्रेसी हम गाँव के बच्चों से नारा लगवाते थे-गैव्या मूतिस दिया बुझान, सब जनसंधी परे उतान। नारों और चुनाव चिन्ह से दीवारें रंग जाती थीं। चुनाव में जनसंचार का सबसे बड़ा यही मीडिया था।समाज में जब गरीबी थी तब नैतिक मूल्य उच्चस्तर पर थे। अमीरों और अपराधियों से सांठगांठ किसी नेता के खिलाफ गंभीर आरोप हुआ करता था। नारे उछलते थे.. ये सरकार वो सरकार, टाटा-बिडला की सरकार।