आज बच्चों की सफलता को सिर्फ अंकों से मापा जा रहा है। बढ़ते दबाव, तुलना और मानसिक तनाव से बच्चों में आत्महत्या तक के मामले बढ़ रहे हैं। जानिए जरूरी संदेश।
अपर्णा विष्णु तिवारी
हम ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ बच्चों की सफलता और जीवन की सार्थकता उनकी मेहनत से नहीं, बल्कि मार्कशीट से तय की जाने लगी है। सोशल मीडिया इन दिनों बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों से भरा पड़ा है। एमपी बोर्ड, आईसीएसई और सीबीएसई के नतीजे आते ही बच्चों पर रिश्तेदारों और पड़ोसियों के सवालों का दबाव शुरू हो जाता है। दुख की बात यह है कि जिन लोगों ने कभी बच्चे की मानसिक स्थिति या संघर्ष नहीं पूछा, वे भी अंक जानने के लिए उत्सुक दिखाई देते हैं।
पहले से तनाव में चल रहे बच्चों को यह कहकर और अधिक दबाव में डाला जाता है कि “थोड़ी और मेहनत की होती तो फलां रिश्तेदार के बेटे से ज्यादा अंक आ जाते।” यहीं से बच्चों के मन पर तुलना और असफलता का बोझ डालने की शुरुआत होती है। अपर्णा विष्णु तिवारी दिया जाता है कि ‘थोड़ी और मेहनत की होती तो…’ लेकिन क्या हमने कभी खुद से यह सवाल पूछा है कि क्या केवल ज्यादा अंक लाने वाले ही जीवन में सफल होते हैं? क्या अच्छे पैकेज और विदेश की नौकरी सिर्फ टॉपर्स का इंतजार करती हैं? सच यह है कि अंकों की इस दौड़ में हम बच्चों को धीरे-धीरे उनकी अपनी जिंदगी, संवेदनाओं और रिश्तों से दूर करते जा रहे हैं।
आज कई ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जहाँ बच्चे बड़े पैकेज लेकर विदेश तो पहुंच गए, लेकिन पीछे छूट गए उनके बूढ़े माता-पिता। विडंबना यह है कि जिन माता-पिता ने बच्चों को केवल “अच्छे नंबर” और “अच्छे करियर” का सपना दिखाया, वही बाद में उनके एक फोन कॉल के इंतजार में रह जाते हैं। कई बार तो समय इतना निकल जाता है कि माता-पिता इस दुनिया से चले जाते हैं और बातचीत का वह इंतजार अधूरा ही रह जाता है। अगर हम अपने बच्चों की सफलता को सिर्फ अंकों से आंक रहे हैं, तो हम भी वही गलती दोहरा रहे हैं। बच्चों का मूल्यांकन अंकसूची से नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और संवेदनशीलता से होना चाहिए। बच्चे को इंसान बनाइए, मशीन नहीं ऐसा इंसान, जिसके भीतर परिवार और समाज के प्रति भावनाएं जीवित रहें। अगर प्रतिशत ही मापना है, तो उनकी इंसानियत का प्रतिशत मापिए।
क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि आपका बच्चा घर के बुजुर्गों के साथ कितना समय बिताता है? क्या वह उनकी बातों में रुचि लेता है? दूसरों के दुख-दर्द को समझने की उसकी क्षमता कितनी है? कभी यह भी देखिए कि आपके बीमार होने पर वह कितनी जिम्मेदारी से आपकी सेवा करता है। उससे यह पूछिए कि उसके अपने सपने क्या हैं और उन्हें पूरा करने का आत्मविश्वास उसके भीतर कितना है। साथ ही खुद से भी सवाल कीजिए कि आपने अपने बच्चे के सामाजिक और भावनात्मक जीवन को कितनी गंभीरता से समझा है।
आज स्थिति यह हो गई है कि 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाना एक सामाजिक प्रतिस्पर्धा बन चुका है। हर अभिभावक के मन में यही सवाल घूमता है कि उसका बच्चा रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बच्चों से ज्यादा अंक कैसे लाए। सोशल मीडिया पर बच्चों की अंकसूची के साथ तस्वीरें साझा करने की होड़ भी कम अंक लाने वाले बच्चों को भीतर से तोड़ती है।सफलता का केवल उत्सव मनाना और असफलता को शर्म की तरह देखना बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर बना देता है। यही कारण है कि छोटी-सी असफलता भी कई बार उन्हें भीतर तक तोड़ देती है। जब बच्चा हर समय तुलना और उपलब्धियों के दबाव में पलता है, तो वह जीवन की सामान्य असफलताओं का सामना करना नहीं सीख पाता।
हाल ही में सामने आए कुछ घटनाक्रम इस सामाजिक दबाव की भयावह तस्वीर दिखाते हैं। एक छात्रा ने परीक्षा परिणाम से परेशान होकर घर की पहली मंजिल पर बने कमरे में फांसी लगा ली। परिवार के लोग अपने कामों में व्यस्त थे और किसी को अंदाजा तक नहीं था कि बच्ची भीतर से इतनी टूट चुकी है।इसी तरह सतना जिले में 12वीं के एक छात्र ने परिणाम घोषित होने के कुछ ही समय बाद आत्महत्या कर ली। पुलिस के अनुसार, परिवार को उसके अंकों की जानकारी भी नहीं थी, लेकिन परीक्षा और परिणाम का दबाव इतना अधिक था कि उसने जिंदगी खत्म करना आसान समझ लिया।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। देश में हर साल 13 हजार से अधिक छात्र आत्महत्या करते हैं। इनमें करीब 2200 से 2500 मौतें सीधे परीक्षा में असफलता, कम अंक, माता-पिता की अत्यधिक अपेक्षाओं और पढ़ाई के दबाव से जुड़ी होती हैं। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और राजस्थान जैसे राज्यों में ऐसे मामले अधिक सामने आते हैं।
जरूरत इस बात की है कि कम अंक लाने वाले बच्चों को ताने देने के बजाय उन्हें प्रेरित किया जाए। उन्हें ऐसे लोगों के उदाहरण बताए जाएं जिन्होंने स्कूल की अंकसूची में भले कम नंबर पाए, लेकिन जीवन में बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। बच्चों को उनके सपनों के कैनवस पर अपने रंग भरने दीजिए, उन्हें खुलकर उड़ान भरने दीजिए।