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Martyr Chandrashekhar Azad Death Anniversary

पुण्यतिथि आज: वीरता-बलिदान के प्रतीक चन्द्रशेखर आजाद

27 फरवरी को अमर क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद की पुण्यतिथि है। बचपन से लेकर अल्फ्रेड पार्क के बलिदान तक, जानिए उनके संघर्ष और शहादत की कहानी


पुण्यतिथि आज वीरता-बलिदान के प्रतीक चन्द्रशेखर आजाद

अरविंद रावल

देश की आजादी के लिए अपने हाथों से अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर बलिदानी चन्द्रशेखर आजाद की आज 27 फरवरी को 95वीं पुण्यतिथि है। आजाद एक ऐसे दीवाने का नाम है, जिसकी अपने देश के प्रति दीवानगी के किस्से सुनकर ही हर मस्तक अपने आप नतमस्तक हो जाता है। आज के आधुनिक एआई के इस युग में जब पचास बरस के आदमी या नेता को युवा माना जाता है, आप कल्पना करें जब एक दस-बारह साल का अबोध बालक देश की आजादी के लिए सुदूर जनजातीय अंचल अभिजात्य झाबुआ-अलीराजपुर जिले के अपने जन्मस्थली भाबरा गांव की गलियों में बचपन की मौज-मस्ती को छोड़कर भूख-प्यास की परवाह किए बिना अपनी भारत माता की आजादी के लिए निकल पड़ा, तो उसकी उम्र वर्तमान संदर्भमें क्या मानी जाएगी?

देश की आजादी का सिर पर जुनून लिए निकले बालक आजाद ने 1921 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में भाग लिया और अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के दीवानों के साथ अपना सुर बुलंद करते हुए गिरफ्तार किए गए। जब अंग्रेज जज के सामने आजाद को पेश किया गया और जब जज ने नाम पूछा तो निडर होकर रौबदार आवाज में अपना नाम 'आजाद' बताया, पिता का नाम 'स्वतंत्र' बताया और अपना घर 'जेल' बताया, तो जज साहब झल्ला गए और उन्होंने बालक आजाद के देशभक्ति के अदम्य साहस से घबराकर पंद्रह बेंत मारने की सजा सुनाई। अपनी सजा पर बालक आजाद मुस्कुराए और हर बेंत की मार के साथ 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम्' के जय घोष से पूरे वातावरण में ओज भर दिया।

इस घटना के बाद एक अदम्य साहसी क्रांतिकारी के रूप में आजाद का राष्ट्रीय पटल पर उदय हुआ और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के विश्वस्त साथी बनकर भारत की आजादी का अलख जगाने में खुद को झोंक दिया। यहीं पर देश के लिए मर मिटने वाले आजादी के सारे दीवानों का मिलन हुआ। आजाद में स्वाभिमान के गुण बचपन से ही विद्यमान थे। अपने माता-पिता से विरासत में मिले इन्हीं गुणों की वजह से आजाद जो एक बार सोच लेते थे, उसे हर हाल में पूरा करते थे। बिस्मिल द्वारा बनाए गए आजादी के दीवानों के संगठन का नाम हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन था, जिसका उद्देश्य अंग्रेजों से भारत माता को आजादी दिलाना था। 

आजाद स्वयं कहते थे कि दासता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है और इसी प्रेरणा से वे जीवनभर इस अभिशाप से लड़ते रहे। सन् 1920 से 30 का एक पूरा दशक ऐसा था जब देश में अंग्रेजी हुकूमत आजादी के इन जवानों के खौफ से डरी-सहमी हुई थी। उस एक दशक में यदि भारत की आजादी के लिए सारे नेता एकमत हो जाते तो देश पच्चीस बरस पहले ही आजाद हो गया होता। अंग्रेजों से उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए हथियारों और गोला-बारूद हेतु धन के लिए रामप्रसाद बिस्मिल की योजना के तहत सरकारी खजाना लूटने के लिए आजादी के दीवानों ने काकोरी कांड को अंजाम दिया। काकोरी कांड में सरकारी खजाना लूटने से अंग्रेजी हुकूमत बुरी तरह बौखला गई और देशभर में बिस्मिल और उनके साथियों की धरपकड़ तेज कर दी गई। 

इसे विडंबना कहें या फिर देश का दुर्भाग्य कि हजारों देशभक्त दीवानों को अंग्रेजी हुकूमत तो नहीं खोज पाई, लेकिन अपने ही लोगों की दगाबाजी के चलते अंग्रेज उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाने में कामयाब हो गए। रामप्रसाद बिस्मिल की फांसी के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बिखर चुका था, लेकिन आजाद ने हिम्मत नहीं हारी और कमान अपने हाथों में ली तथा अपने साथियों को पुनः एकजुट कर देश की आजादी की फिर से हुंकार भरी। आजादी के दीवानों ने भारत की जेलों में भी आजादी का अलख जगाए रखा। अग्रेजों से छिपते हुए, भेष बदलते आजाद ने भगतसिंह के साथ देशभर में फिर से आंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा पैदा कर दिया था.

अंग्रेजी हुकूमत हर हाल में आजाद और भगतसिंह को गिरफ्तार कर अपने प्रति बढ़ते विद्रोह को दबाना चाहती थी। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की गिरफ्तारी के बाद भी आजाद अपने साथियों के बूते अंग्रेजों के खिलाफ देशभर के लोगों में आक्रोश जगाते रहे। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद, अर्थात वर्तमान प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में भी आजाद अपने साथियों की रिहाई की योजना को लेकर आए थे और एक पेड़ के नीचे खड़े होकर अपने कुछ साथियों का इंतजार कर रहे थे, लेकिन अपने ही एक साथी की दगाबाजी के चलते आजाद अंग्रेज सिपाहियों से घिर चुके थे। चारों ओर से घिरने के बाद भी आजाद आखिरी गोली शेष बचने तक लड़ते रहे और अंतिम गोली कनपटी में स्वयं मारकर आत्मबलिदान कर लिया।