महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले का सौदला गांव खुद को जाति-मुक्त घोषित कर चुका है। ग्राम सभा के फैसले से स्कूल, मंदिर और सामाजिक जीवन में समानता की नई पहल शुरू हुई है
प्रो. रविशंकर सिंह
महाराष्ट्र के गाँच सौदाला ने स्वयं को 'जाति मुक्त' घोषित कर अस्पृश्यता जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध स्पष्ट संदेश दिया है। ग्राम सभा का यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना को सुट्ट करता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और समान अधिकार सर्वोपरि है.
महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (पूर्व में अहमदनगर) जिले के नेवासा तालुका में एक गांव है-सौदला। गत दिनों यह गांव स्वयं को 'जाति-मुक्त' घोषित कर एक नई सामाजिक दिशा का प्रतीक बनकर उभरा है। ग्राम सभा में सर्वसम्मति से मेरी जाति मानवत्ता है' (आमची जात मानव) के सिद्धांत को अपनाते हुए उपनाम-आधारित पहचान, छुआछूत और जातिगत भेदभाव को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित किया। यह निर्णय केवल प्रतीकात्मक घोषणा नहीं, बल्कि ठोस प्रशासनिक और सामाजिक कदमों के साथ लागू किया गया एक सामुदायिक संकल्प है. जिसका उद्देश्य जातिगत भेदभाव का उन्मूलन और संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता, समानता के मूल्यों की स्थापना करना है।
औपनिवेशिक शासन ने प्रशासनिक सुविधा के लिए भारतीय समाज में जातिगत वर्गीकरण को व्यवस्थित रूप से दर्ज किया और उसे संस्थागत रूप दिया। जनगणनाओं, सरकारी अभिलेखों और पहचान-पत्रों में समुदायों को वर्गीकृत कर स्थायी पहचान के रूप में स्थापित किया गया। संविधान लागू होने के बाद कानूनी रूप से अस्पृश्यता और भेदभाव पर प्रतिबंध लगा, फिर भी सामाजिक व्यवहार और पहचान के स्तर पर जातिगत विभाजन कई क्षेत्रों में दिखाई देता है। ऐसे परिदृश्य में किसी गांव द्वारा सामुहिक रूप से स्वयं को 'जाति-मुक्त' घोषित करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रयोग है। सौंदना का निर्णय ग्रामीण भारत में सामाजिक सुधार की संभावनाओं को नए सिरे से रेखांकित करता है.
ग्रामसभा के प्रमुख प्रस्ताव-सौदला गांव में कृषि ही जीवन का आधार है। 2011 की जनगणना में यहां की आबादी 1882 थी, जिसमें 973 पुरुष और 909 महिलाएं थी। इसमें अनुसूचित जाति 278 और अनुसूचित जनजाति की संख्या 11 थी। सभी सह-अस्तित्व में रखते है। सरपंच शरद चाबूराच अरगडे के नेतृत्व में यह यांच प्रगतिशील रहा है। पूर्व में यहां बाल विवाह, दहेज और विधवा भेदभाव पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। अब जाति-मुक्ति ने इसे राष्ट्रीय पटल पर ला दिया।
5 फरवरी, 2026 को सरपंच शरद अरगडे की अध्यक्षता में ग्राम सभा की विशेष बैठक हुई। सरपंच ने 'जाति-मुक्त गांव घोषित करने का प्रस्ताव रखा, जो सर्वसम्मति से पारित हो गया। संकाल्प-पत्र मराठी में भारतीय संविधान की प्रस्तावना से शुरू होता है, हम भारत के लोग... नाव, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सुनिश्चित करते हैं। इसमें कहा गया, 'अब से सौंदता में कोई जाति का पालन नहीं करेगा, मानवता ही एकमात्र धर्म होगी। सभी से आग्रह किया गया कि लोग जातिसूचक उपनामों के प्रयोग से बचे और सामाजिक संवाद में समानता का व्यवहार अपनाएं। मंदिर, कुआं, श्मशान और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सभी की समान पहुंच सुनिश्चित की गई। अपने तीन कार्यकउलों में ग्रामीणों से निरंतर संवाद करने वाले सरपंच अरगड़े का कहना है कि सकारात्मक परिवर्तन संभव है। बैठक में सवर्ण, बहुजन, मुस्लिम सभी शामिल हुए, जो एकता का प्रतीक था।
क्या-क्या बदलेगा?
इस निर्णय के बाद गांव के विद्यालयों में प्रवेश के समय बच्चों के नाम के साथ उपनाम दर्ज करने की परंपरा समात की गई है। अब नामांकन में केवल विद्यार्थी का नाम और पिता का नाम दर्ज किया जाएगा। विद्यालय सामाजिक निर्माण का प्रमुख केंद्र होते हैं। ऐसे में बचपन से ही जाति-आधारित पहचान को कमजोर करना दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है। इस निर्णय का उद्देशा प्रारंभिक शिक्षा के स्तर पर किसी भी प्रकार की सामाजिक श्रेणीकरण की मानसिकता को हतोत्साहित करना है। शिक्षा वह क्षेत्र है, जहां से नागरिक चेतना का विकास होता है। यदि बच्चे सम्मान पहचान के साथ विद्यालय में प्रवेश करेंगे, तो उनके चीच बराबरी और आत्मसम्मान की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित होगी
ग्राम सभा का मानना है कि औपनिवेशिक काल में निर्मित और प्रोत्साहित सामाजिक श्रेणियां आधुनिक लोकतांत्रिक समाज की भावना से मेल नहीं खातों। इसलिए गांव ने निर्णय लिया कि उसकी सामुदायिक पहचान किसी वर्ग या उपनाम पर नहीं, बल्कि समान नागरिकता पर आधारित होगी। यह दृष्टिकोण संविधान की उस भावना के अनुरूप है, जिसमें व्यक्ति की गरिमा सर्वोपरि मानी गई है। हम सभा द्वारा पारित प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य है भेदभाव से मुक्त वातावरण का निर्माण और संविधान सम्मत अधिकारों की रक्षा। प्रस्ताव में स्पष्ट कल गया है कि ग्राम स्तर पर किसी भी नागरिक को उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि या सामाजिक पहचान के आधार पर अलग-थलग नहीं किया जाएगा।
भारतीय संविधान की रचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. बीआर अंबेडकर ने समान नागरिकता और सामाजिक न्याय को राष्ट्र-निर्माण का आधार माना था। सौदला का यह निर्णय उसी संवैधानिक दृष्टि की ग्राम स्तर पर लागू करने का प्रयास है, जहां हर व्यक्ति पहाले नागरिक है, चाद में कुछ और। प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया कि जाति के आधार पर किसी भी प्रकार का सामाजिक बहिष्कार, सार्वजनिक स्थलों तक पहुंच में बाधा या पहचान के आधार पर भेदभाव अस्वीकार्य होगा।
सब एक समान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 'एक कुआं, एक श्मशान' का संदेश देता है, जो हिंदू समाज में जातिगत भेदभाव को समार करने और सामाजिक समरसता स्थापित करने का प्रतीक है। इसी तर्ज पर ग्राम सभा ने सुनिश्चित किया है कि मंदिर, कुआं, श्मशान और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सभी ग्रामीणों की समान भागीदारी और यहुंच होगी। किसी को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर रोका नहीं जा सकंय। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेदों में निहित समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों का स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन है। यह सहमति भी बनी कि सामाजिक व्यवहार में उपनामों के माध्यम से पहचान स्थापित करने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाएगा। यद्यपि या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है, फिर भी सामुदायिक सहमति से सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन का प्रयास किया जा रहा है।
सौंदला की पाल सामाजिक सुधार और समानता के उन विचारों से प्रेरित है, जिन्हें बाबा साहब आंबेडकर, जयोतिचा फुले, शाहू महाराज और महत्मा गांधी जैसे चिंतकों ने आगे बढ़ाया। इन सभी ने व्यक्ति की गरिमा, शिक्षा के प्रसार और सामाजिक न्याय को राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य माना। सौंदला ने इन विचारों को केवल स्मरण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें ग्राम प्रश्वसन की नीतियों में रूपांतरित करने का प्रयास किया है। इसके अलावा, ग्राम सभा ने सोशल मीडिया पर विभाजनकारी वा भेदभावपूर्ण सामाग्री प्रसारित करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने का भी प्रस्ताव है। यदि कोई सामुदाधिक निर्णयों की अवहेलना करते हुए भेदभावपूर्ण व्यवहार करता है, तो उस पर दंडात्मक प्रावधान लागू होंगे।