प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी ने कोलकाता की यात्रा की थी। उस दौरे पर उन्होंने तत्कालीन रेल मंत्री के कालीघाट स्थित घर का दौरा किया था। तब उन्होंने मंत्री की मां से उलाहना दिया था “आपकी बेटी मुझे बहुत परेशान करती हैं।” कहना न होगा कि वह शख्सियत पिछले डेढ़ दशक से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। ममता बनर्जी एक लड़ाकू नेता हैं। धूल से उठकर यदि वे राजनीतिक आसमान का सितारा बनी हैं, तो उसकी वजह उनका संघर्षशील व्यक्तित्व ही है। लेकिन कोलकाता के मैदान में इस बार यह योद्धा कुछ फंसा हुआ नजर आ रहा है।
भारतीय जनता पार्टी जिस तरह उनसे दो-दो हाथ कर रही है, उसके पीछे नरेंद्र मोदी की अगुआई में बंगाल की जमीन पर लगातार परिश्रम कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं की भूमिका है। आज अगर बंगाल की सियासी लड़ाई आर-पार के दौर में पहुंच चुकी है, तो इसके पीछे अमित शाह की रणनीति काम कर रही है।
साल 2021 के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कहा गया था कि भाजपा चुनाव जीतते-जीतते हार गई। ममता का संघर्ष भाजपा की रणनीतियों पर भारी पड़ा था। पांच साल बाद कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग पर कब्जे को लेकर फिर सेनाएं सज गई हैं। हालांकि इस बार हालात कुछ बदले हुए नजर आ रहे हैं। इसकी वजह अमित शाह द्वारा चुनाव प्रचार की कमान खुद संभालना है, जिन्होंने 170 सीटें जीतने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है।
पिछले विधानसभा चुनाव में पिछड़ने के बावजूद अमित शाह ने राज्य के दौरे जारी रखे और इससे कार्यकर्ताओं का उत्साह बनाए रखा। इस बार भाजपा यदि सत्ता की प्रबल दावेदार के रूप में उभरी है, तो इसकी बड़ी वजह बूथ प्रबंधन के साथ-साथ घुसपैठ और महिला सुरक्षा को मुद्दा बनाना भी है।
बंगाल के बारे में कहा जाता है कि वह जो आज सोचता है, पूरा देश बाद में उस दिशा में आगे बढ़ता है। शक्ति पूजा की संस्कृति वाले इस राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ममता सरकार के कार्यकाल में कई बार सवाल उठे हैं। कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक रेजिडेंट डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और बर्बर हत्या के बाद भद्रलोक समाज उद्वेलित हो उठा। इसकी आंच अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि कस्बा लॉ कॉलेज की एक छात्रा के साथ बलात्कार की घटना सामने आ गई। इससे पहले संदेशखाली में कथित यौन हिंसा और जमीन हड़पने के मामलों ने भी समाज को झकझोर दिया था।
अमित शाह के लगातार बंगाल दौरों के चलते भाजपा कार्यकर्ताओं ने महिला सुरक्षा के मुद्दे को लगातार जीवित रखा। इन्हीं कारणों से तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे पर सवालों के घेरे में आ गई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (2023) की रिपोर्ट भी राज्य में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा की पुष्टि करती है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34,691 मामले दर्ज किए गए, जिनमें एसिड हमलों का प्रतिशत भी उल्लेखनीय रहा।
भाजपा को महिला सुरक्षा को बड़ा मुद्दा बनाने में ममता बनर्जी के एक बयान से भी बल मिला, जिसमें उन्होंने कहा था कि महिलाओं को शाम सात बजे के बाद बाहर नहीं निकलना चाहिए। भाजपा ने आरजी कर की पीड़िता की मां मंजू देवनाथ को पनिहाटी से उम्मीदवार बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि वह महिलाओं की सुरक्षा के प्रति गंभीर है। इसके साथ ही पार्टी ने दुर्गा सुरक्षा दस्ते बनाने, नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण देने और मध्य प्रदेश, हरियाणा व महाराष्ट्र की तर्ज पर महिलाओं को प्रतिमाह तीन हजार रुपये देने का वादा किया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि ममता सरकार पहले से ही महिलाओं को प्रतिमाह डेढ़ हजार रुपये दे रही है।
साल 2021 में तृणमूल कांग्रेस को 213 सीटें और लगभग 44 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 38 प्रतिशत वोट के साथ 77 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। हालांकि 2016 के मुकाबले भाजपा ने तीन सीटों और लगभग 28 प्रतिशत वोट से बड़ी छलांग लगाई थी। अमित शाह ने इसी आधार को मजबूत करते हुए आगे की रणनीति बनाई।
इसके तहत उन्होंने उन क्षेत्रों को और मजबूत करने पर जोर दिया, जहां पार्टी पहले से मजबूत थी, और उन सीटों पर विशेष ध्यान दिया, जहां 2021 में कम अंतर से हार हुई थी। साथ ही, उन्होंने पार्टी के भीतर की गुटबाजी सुलझाने का प्रयास भी किया। राज्य के पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष की नाराजगी की चर्चाओं के बीच अमित शाह ने उनसे मुलाकात कर शुभेंदु अधिकारी के साथ उनके मतभेद दूर करने की कोशिश की।
ममता बनर्जी ने पिछली बार ‘बांग्ला माटी, बांग्ला मानुष’ का नारा दिया था, जिससे उन्हें लाभ भी मिला। इस बार भी वह भाजपा नेताओं को बाहरी बताकर इसी मुद्दे को उठाने की कोशिश कर रही हैं। इसके जवाब में अमित शाह ने घोषणा की है कि यदि भाजपा सत्ता में आती है, तो मुख्यमंत्री ‘धरती का बेटा’, यानी स्थानीय व्यक्ति ही होगा।
भाजपा ने घुसपैठ को भी बड़ा मुद्दा बनाया है। मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान लाखों नाम हटाने को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। जहां विपक्ष इसे मुद्दा बना रहा है, वहीं अमित शाह ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया का समर्थन किया है। भाजपा ने यह भी वादा किया है कि सत्ता में आने पर अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें बाहर किया जाएगा और सीमा पर बाड़ लगाने के लिए केंद्र को भूमि उपलब्ध कराई जाएगी।
राज्य में भ्रष्टाचार भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभरा है। शिक्षक भर्ती घोटाले में कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा 26 हजार नौकरियां रद्द करने का मामला, राशन घोटाला, मिड-डे मील और मनरेगा से जुड़े विवाद लगातार चर्चा में रहे हैं। भाजपा ने इन मुद्दों को जोर-शोर से उठाया है। इन मामलों में तृणमूल के कई नेताओं की गिरफ्तारी भी हुई है, हालांकि तृणमूल कांग्रेस इसे केंद्र की बदले की कार्रवाई बताती रही है।
इन तमाम मुद्दों के कारण भाजपा, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती देती नजर आ रही है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि तृणमूल ने मैदान छोड़ दिया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी अब भी मजबूती से मुकाबले में डटी हुई है।
इस बार का चुनावी मुकाबला सीधे तौर पर ममता बनाम भाजपा जरूर है, लेकिन वास्तविक रूप से यह ममता बनाम अमित शाह की टक्कर बन चुका है। इस राजनीतिक जंग में कौन बाजी मारेगा, इसका फैसला मतगणना के बाद ही होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं)