बंगाल चुनाव 2026 में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत फिर चर्चा में। क्या यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन है या बड़ा वैचारिक बदलाव?
विवेक शुक्ला
भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भारी जीत हासिल की है। 4 मई 2026 को घोषित परिणामों के अनुसार, भाजपा ने 294 सीटों में से 206 सीटें जीतीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस 81 सीटों पर सिमट गई। 15 साल बाद सत्ता परिवर्तन हुआ है और अब बंगाल में भाजपा की सरकार बनने जा रही है। कहा जा सकता है कि बंगाल में 84 साल बाद हिंदुत्ववादी सरकार बनने जा रही है। इससे पहले 1941-42 में हिंदू महासभा की सक्रिय भागीदारी वाली ‘श्यामा-हक सरकार’ बनी थी। उस सरकार में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्त मंत्री थे। कई दशकों बाद अब बंगाल में फिर हिंदुत्ववादी विचारधारा सत्ता में आई है। यह महज राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि डॉ. मुखर्जी के सपनों की पूर्ति का प्रतीक माना जा रहा है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1939 में हिंदू महासभा में शामिल हुए और जल्द ही बंगाल हिंदू महासभा के प्रमुख नेता बन गए। 1941 में बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। मुस्लिम लीग की सरकार गिर गई और ए.के. फजलुल हक की अगुवाई में प्रोग्रेसिव कोएलिशन सरकार बनी। 12 दिसंबर 1941 को बनी इस सरकार में डॉ. मुखर्जी वित्त मंत्री बने। यह सरकार दिसंबर 1941 से 1943 तक चली, हालांकि डॉ. मुखर्जी ने 20 नवंबर 1942 को इस्तीफा दे दिया।
उस दौरान उन्होंने हिंदू हितों की रक्षा की और ब्रिटिश नीतियों का खुलकर विरोध किया। उस समय बंगाल में सांप्रदायिक तनाव चरम पर था। मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग कर रही थी। डॉ. मुखर्जी ने हिंदू महासभा के जरिए हिंदुओं को एकजुट किया और बंगाल विभाजन का समर्थन किया, ताकि हिंदू-बहुल क्षेत्र भारत में रह सकें।इस सरकार को अक्सर ‘श्यामा-हक सरकार’ कहा जाता है। यह हिंदू-मुस्लिम एकता की कोशिश भी थी, लेकिन मुख्य रूप से हिंदू महासभा के प्रभाव वाली सरकार थी। डॉ. मुखर्जी सिर्फ मंत्री नहीं, बल्कि गहरे विचारक भी थे। उन्होंने अवेक हिंदुस्थान जैसी किताब लिखी, जिसमें राष्ट्रवाद और हिंदू संस्कृति पर जोर दिया गया।
बलराज माधोक ने अपनी किताब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: ए बायोग्राफी में लिखा है कि मुखर्जी ने हिंदू महासभा को राजनीतिक ताकत दी और देश की एकता के लिए संघर्ष किया। तथागत रॉय की किताब द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी में भी बंगाल में हिंदू हितों की रक्षा और ब्रिटिश विरोध का विस्तार से उल्लेख मिलता है।1947 के बाद डॉ. मुखर्जी ने नेहरू सरकार में मंत्री पद संभाला, लेकिन 1950 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसका कारण नेहरू-लियाकत समझौता था, जो पूर्वी बंगाल के हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सका। 1951 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से भारतीय जनसंघ की स्थापना की।
दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास राजा बाजार स्थित रघुमल कन्या विद्यालय में 21 अक्टूबर 1951 को जनसंघ की स्थापना बैठक हुई। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बलराज माधोक ने इस दौरान प्रभावी भाषण दिए। डॉ. मुखर्जी ने जनसंघ का संविधान तैयार किया और वे इसके पहले अध्यक्ष बने, जबकि बलराज माधोक सचिव बने। आज की भाजपा की पूर्वज पार्टी यही जनसंघ है।डॉ. मुखर्जी का प्रसिद्ध नारा था—“एक देश, एक राष्ट्र, एक संस्कृति।” 1953 में कश्मीर में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विचारधारा आज भी जीवित है। भाजपा के शीर्ष नेता, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह शामिल हैं, उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं।
अब बंगाल में भाजपा की सरकार बनने जा रही है। यह 1941-42 की श्यामा-हक सरकार के बाद पहला मौका माना जा रहा है, जब हिंदू महासभा की विरासत वाली विचारधारा सत्ता में आई है। इस जीत को सिर्फ राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि वैचारिक बदलाव के रूप में भी देखा जा रहा है।भाजपा विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों पर जोर दे रही है। अवैध घुसपैठ, हिंसा और भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर जनता ने भाजपा को समर्थन दिया है। बलराज माधोक के अनुसार, डॉ. मुखर्जी ने हिंदू समाज में राजनीतिक जागरूकता पैदा की थी।
तथागत रॉय की किताब में भी उल्लेख है कि डॉ. मुखर्जी बंगाल के हिंदुओं के लिए प्रेरणा थे। 1941 में हिंदू महासभा ने बंगाल में अपनी छाप छोड़ी थी और 2026 में भाजपा ने उस विरासत को आगे बढ़ाया है। नई सरकार से उम्मीद है कि वह सद्भाव, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में काम करेगी। कई दशकों बाद बंगाल में इस विचारधारा की वापसी को डॉ. मुखर्जी के योगदान और बलिदान से जोड़कर देखा जा रहा है।